सिब्सडी सुधार
सिब्सडी सुधार पर माथापच्ची जोरों पर है।। सरकार इस पर आगे बड़ना चाहती है मगर इस बेदर्द राजनीति का क्या करे हमेशा आडे आ जाती है। बजट में तेल के दाम बडाने का ऐलान क्या किया विपक्षी दलों के साथ साथ सहयोगी भी हाथ धोकर पीछे पड गये। अब लगता है प्रणव मुखर्जी को ना चाहते हुए भी इस पर कुछ बीच का रास्ता निकालना पडेगा। मगर अहम सवाल यह की सुधार होना चाहिए या नही। अर्थशास्त्र के धुरंधरों का तो यही कहना है की इस मसले पर सरकार को ठोस कदम लेना होगा। इस समय सरकार खाघ, फर्टीलाइजर और तेल पर सिब्सडी दे रही है। 2010 -11 के लिए सरकार ने इन मदों में मसलन फर्टीलाइजर के लिए 49981करोड़ का, खाघ सिब्सडी 55578 करोड़ का प्रावधान किया है। सिब्सडी सुधार पर कई समितियां सरकार को सिफारिशें दे चुकी है। इनमें प्रमुख है
लहरी समिति 2004
रंगराजन समिति 2006
बीके चतुZवेदी समिति 2008
और किरीट पारीख समिति 2009
इसके अलावा योजना आयोग ने एकीकृत उर्जा नीति नीर्धारण के लिए एक विशेशज्ञ समिति बनाई । प्रधानमन्त्री की आर्थिक सलाहाकार परीशद ने भी समय समय पर सरकार को सुधार की राह में आगे बडने की सलाह दी। मगर राजनीतिक मजबूरियों के चलते सरकार कोई भी कदम उठाने से बचती रही। मगर बजटवाणी में सुधार को लेकर संकेत दिये गये है। जहां 2009-10 में सरकार का सिब्सडी बिल 123936 करोड़ पहुंच गया वही इस वशZ के लिए इसे घटाकर 108667 करोड़ कर दिया गया है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 1.6 फीसदी के आसपास है। आगे चलकर इस खर्च को 2011-12 में जीडीपी के 1.5फीसदी करने और 2012-13 में 1.3 फीसदी करने का अनुमान है।
इस पर अमल करने की दिशा में भी सरकार ने कदम बडा लिया है। बजट पेश होते ही देश भर में तेल की कीमतें बड़ चुकी है। मगर विचार इस बात में किया जाना चाहिए की क्या सिर्फ इन्ही सिब्सडी के चलते सरकार का घाटा बड़ रहा है। सिब्सडी सुधार के पीछे सबसे बडी वजह यह है कि यह मकसद को पाने से कोसों दूर है। मतलब साफ है जरूरतमन्दों तक यह नही पहुंच पाती । मसलन सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन 52 फीसदी बाजार में कालाबजारी के लिए चला जाता है। पर्वोत्तर राज्यों में तो और अंधेर नगरी है। यहां 90 प्रतिशत तक सरकारी राशन खुले बाजार में बिक जाता है। ऐसा ही कुछ हाल यूरिया, एमओपी और डीऐपी का है। किसान की समस्या यह है कि उसे न तो यह समय से मिलता है और न ही पर्याप्त मात्रा में। मगर नेपाल और बंग्लादेश में इसकी तस्करी जोरों पर है। हाल ही में कैबिनेट ने यूरिया के दाम 10 फीसदी बड़ाने और एमओपी और डीऐपी के दाम बाजार भाव में तय करने को हरी झण्डी दे दी है। हमारे देश में फर्टीलाइजर की औसत खपत 117.07 किलो प्रति हेक्टेयर है जो चीन 289.10, ईजीप्ट 555.10 और बंग्लादेश 197.6 किलों प्रति हेक्टेयर है। यानि हमारी प्रति हेक्टेयर खपत बंग्लादे‘ा से भी कम है। एक अनुमान के मुताबिक 2001-02 से लेकर 2007-08 के बीच हमारा फसलों का उत्पादन 8.37 फीसदी बड़ा, उत्पादकता 6.92 फीसदी मगर सिब्सडी का बिल 214 फीसदी तक बड़ गया । इसके पीछे सबसे बडा कारण विदेशी बाजार में तेल के आसमान चडते दाम है जो जुलाई 2008 में 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए। अब बची तेल की बात तो यहां भी सरकार पसोपेश में है। सवाल उठ रहा है कि लाखों कमाने वाले और महंगी कार में घूमने वालों को रियायत क्यों। बात में दम तो है। इसीलिए पारिख समिति ने तेल और डीजल के दाम को बाजार को तय किये जाने का अधिकार देने , केरोसीन के दाम 6 रूपये प्रति लीटर बडा़ने और घरेलू गैस के दाम 100 रूपये तक बड़ाने की सिफारिश की है। मगर लगता नही सरकार इन सिफारिशों को जमीन में उतार पायेगी।
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
बजटवाणी भाग 2
बजटवाणी भाग 1
बजट 2010- 2011 आपके सामने है। साल भर का लेखा जोखे का हिसाब किताब सरकार ने आपके सामने रख दिया है। साथ ही अगले एक साल का विकास यात्रा की दशा दिशा भी रेखांकित कर दी है। किसी ने सराहा, किसी ने नकाफी बताया, किसी ने सन्तुलित बजट की संज्ञा दी तो किसी ने कहा बजट असन्तुलित है और दूरदर्शिता का अभाव स्पश्ट दिखाई दे रहा है। ऐसा नही कह सकते की जितने मुंह उतनी बातें। सबने अपने बयान के पीछे कई तरह के तर्क दिये है जिसपर बहस की गुंजाइश है और बहस होनी चाहिए।
कुल मिलाकार इस बजटनामें को चार पहलू से समझा जा सकता है। पहला यह बजट ऐसे समय पर आया है जब अर्थव्यवस्था वैिश्वक आर्थिक संकट से बाहर निकलकर वापस पटरी पर आने का संकेत दे रही है। आईआईपी के आंकडे यह जतलाने के लिए काफी है। केवल दिसम्बर माह में मैनूफक्कचरिंग क्षेत्र में 18 प्रतिशत तेजी देखी गई। जों पिछले तीन दशकों में सबसे ज्यादा है। यही कारण है कि सीएसओ यानि केन्द्रीय सांिख्यकी संगठन ने जो इस वशZ के लिए विकास दर का अनुमान लगाया है वह 7.2 फीसदी है। जो कि पिछले वशZ 6.7 फीसदी रही। इस पर भी बहस हो सकती है कि यह जीडीपी किस चिड़िया का नाम है। और क्या गांधीजी के दरिद्र नरायाण इस भाशा को समझते है। बहस की गुंजाइश यहां भी है की वाकई इसके बडने से खुशहाली आती है और अगर यह घटती है तो मुिश्कल पैदा होती है। कुछ तो एक कदम आगे बडकर कहते है कि कब तक जीडीपी के आंकडों को छाती से चीपकाकर गरीबों के साथ खिलवाड करते रहोगे। बात में दम तो है। जिस देश में 77 फीसदी आबादी प्रतिदिन 20रूपये कम आमदनी में जीने को मजबूर है वहां ग्रोथ ग्रोथ चिल्लाने से किसका भला होगा। ऐसी ग्रोथ जिसका सबसे बडा दुर्भाग्य यह है कि कृिश विकास दर नाकारात्मक है। 58.1 फीसदी आबादी जिसपर निर्भर करती है और जीडीपी में इसका योगदान 17.1 फीसदी है। यानि ग्रोथ ही हवा यही से निकलने लगी है। अच्छी बात यह है कि देश के वित्त मन्त्री इस बात को कहते है ही ऐसी विकास दर कोई फायदा नही जिसका फायदा हर किसी को नही पहुंचे। सुनने में अच्छा वकतव्य है मगर अमल में आयेगा इस पर संशय है। ऐसा में इसिलिए भी कह रहा हूं कि 62 साल बाद भी आज देश गरीबी के आंकडों में उलझा हुआ है और कमिटि कमिटि का खेल जोरों पर है। दूसरा पहलू यह है कि महंगाई बेलगाम है। गरीब की थाली का भार कितना होगा आप सबको इसका आभास है। सरकार ने अपने तरकश में रखे हर तीर को चलाकर आजमा लिया है मगर महंगाई है कि कम होने का नाम ही नही ले रही है। खैर मरने दो गरीब को जडीपी ग्रोथ तो अच्छी है न। तीसरा राजकोशीय प्रबंधन जिसके चरमराने से अर्थव्यवस्था को कई तरह के रोग लग सकते है उसका इलाज जरूरी था। जैसे ब्याज़ दर का बड़ना आदि। लिहाजा सरकार राजकोशीय प्रबंधन की तरफ लौटने की तैयारी कर चुकी है। इसमें परामशZदाता की भूमिका में है 13 वित्त आयोग जिसने भारत सरकार को यह परामशZ दिया है कि इस बार राजकोशीय प्रबंधन की ओर लौटने का आधार राजस्व की प्राप्तियां नही बल्कि खर्च सुधार पर खास ध्यान दिया जाए। चौथा पहलू यह था कि अर्थव्यवस्था को वैिश्वक संकट से अभारने के लिए सरकार ने तीन राहत पैकेज दिसम्बर जनवरी और फरवरी में दिये थे क्या वो वापस होंगे। ‘ाुरूआती अनुमान के मुताबिक यहां भी हो गई और सरकार ने केन्द्रीय उत्पाद कर 2 फीसदी बडा दिया। जबकि सेवा कर में कोई बदलाव नही किया गया बस 16 नई सेवाओं को इसके दायरे में ले आया गया। दूसरी बात निर्यात से जुडे हुए जो क्षेत्र अभी भी जूझ रहे है उन्हे राहत जारी रहेगी।
गुरुवार, 7 जनवरी 2010
न्यायिक सुधार
न्यायिक सुधार की बहस बरसों पुरानी है मगर अभी तक हस ओर कुछ नही हुआ। लंबित मामलों का अंबार। इंसाफ पाने के लिए टकटकी लगाए सालों तक इंतजार करना पडता है। रूचिका जैसे मामले व्यवस्था को बदलने की कितनी जरूरत इस ओर साफ इशारा करते है। मगर काम तो सरकारों को करना है। अहम सवाल यह कि लम्बी बहस और माथापच्ची के बाद क्या वाकई हम सुधारों की ओर आगे बड़ पायेंगे। इस संदर्भ में विधि और कानून मंत्री विरप्पा मोईली का बयान थोडी राहत पहुंचाने वाला है। न्यायाधीश मानक और जवाबदेही विधेयक का खाका तैयार हो चुका है। माना जा रहा है कि कैबीनेट की हरी झंडी मिलने के बाद बजट सत्र में पेश किया जाएगा। यह विधयेक 1968 के न्यायाधीश जांच विधेयक के जगह लेगा। इस विधेयक के मुताबिक आयोग्य व्यक्ति जज नही बन पायेगा, जवाबदेही सुनििश्चत की जायेगी। खास बात यह है कि इसमें हटाने या सजा देने का बंदोबस्त भी किया गया है। आप सभी जानते है कि इस देश में जजों को हटाने की कार्यवाही बडी जटील है जिसे हम महाभियोग नाम से जानते है । 1991 में वी रामास्वामी के खिलाफ पहली बार इसका इस्तेमाल किया गया, मगर जरूरी समर्थन के अभाव में यह अंजाम तक नही पहुंच पाया। हाल फिलहाल में सौमित्र सेन और पीडी दिनाकरन मामले ने इस सुधार को और आवश्यक बना दिया है। भारत में नायाब चीज यह है कि यहां जज का चुनाव कोलिजियम प्रणाजी के तहज जज ही करते है। जिसे अब बदलने की बात कही जा रही है। लंबित पडे मुकदमों को भी सरकार जल्द निपटाना चाहती है। सरकार की माने तो 2014 तक एक साल से पुराने मामलों सिर्फ 1 प्रतिशत रह जाऐंगे। इसके लिए सरकार 15 हजार जजों को ठेका पद्धति के तहत नियुक्त करेगी। इन्हे 2 साल में तीन शिफटों में काम करना होगा। साथ ही सालाना तौर पर इन्हे 2500 मुकदमों का निपटारा करना होगा। आज निचली अदालतों 27203185 मुकदमे, हाई कोर्ट में 4045177 मामले और सुप्रीम कोर्ट में 53680 मामले लंबित पडे है। देश में 1 सुप्रीम कोर्ट, 21 हाइकोर्ट और 3150 जिला अदालतें है। इसके अलावा फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या 1237 है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कह चुके है कि देश में 35000 निचली अदालतों की जरूरत है जबकि अभी 16000 है जिनमें से 14000 सिर्फ काम कर रही है। यानि 21000 अभी और बनानी है। आज ग्राम न्यायालय कानून 2008 अस्तित्व में आ चुका है। जिसके तहत 5067 ग्राम न्यायालय स्थापित किये जाऐंगी। सरकार इस पर 1400 करोड़ रूपये खर्च करेगी। लंबीत मुकदमो की करोडों की संख्या की एक वजह सरकारी उदासीनता भी रही है। 10वीं पंचवशीZय योजना में 700 करोड़ आवंटित किये थे। जिसे ग्यारवीं पंचवशीZय योजना में बढाकर 1470 करोड़ रूपये कर दिया गया है। यानि 9वीं पंचवशीZय योजना में बजट का .071 प्रतिशत, 10वीं में .078 प्रतिशत और ग्यारवीं में थोड़ बड़ा दिया गया। मगर यह राशि सस्ता सुलफ और जल्द न्याय देने के सिद्धान्त पर एक तमाचा था। आप इसे ऐसे भी समझ सकते है। लोकसभा और राज्य विधानसभाऐं कानून पर कानून बनाते गए। मगर इसका न्यायपालिका के मौजूदा ढांचे पर क्या असर पडेगा, इसकों जानने की कोशिश कभी नही की गई। आज जेलों के हाल भी बेहाल है। क्षमता से ज्यादा कैदियों को रखा जा रहा है। महज 30 फीसदी लोग ऐसे है जिन्हें सजा सुनाई गई है। भारत में जज जनसंख्या अनुपात दुनिया में सबसे ज्यादा कम है। भारत में 10 लाख में 1 जज है जबकि अमेरीका और ब्रिटेन में यह संख्या 150 के करीब है। विधि आयोग अपनी 120वीं रिपोर्ट में इस संख्या को 10 से बढकार 50 करने की सिफारिश कर चुका है। मगर जहां, मौजूदा रिक्त पडे पद ही नही भरे गए हों वहां नयी नियुक्तियों की उम्मीद बेमानी सी लगती है। बस हम आशा कर सकते है कि 2010 में न्यायिक सुधारों केा अमलीजामा पहनाया जाए।
मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
इस देश में कितने गरीब है?
गरीबी हटाओं का नारा इस देश में नया नही है। बहस इस बात पर हो सकती है कि राजनीति में इस मुददे की वैलीडीटि रह गयी है या नही। इतना ही नही गरीबी हटाओं योजनाओं का तो अंबार है। मगर इतने सालों में न तो गरीबी हटी न ही गरीब कम हुए। हां एक वर्ग की कमाई में खास इजाफा हुआ। आजादी के 62 सालों बाद इस सवाल का ही जवाब नही ढूंढ पाये। कि सही मायने में इस देश में कितने गरीब है। कभी कभी तो मेरा भी माथा ठनक जाता है। । दरअसल दिन रात हमारा पाला इन्ही योजनाओं से पड़ता है। कितना पैसा मिला, कितना खर्च हुआ। क्या कमियां है। इन सब के अंकगणित में हमारा ज्यादा समय बितता है। मगर यह समझ से परे है कि इतनी योजनाओ के बाद भी आज बडी आबादी दो जून की रोटी के लिए संघशZ क्यों करती नजर आ रही है। अर्जुन सेना गुप्ता की रिपोर्ट कहती है कि 77 फीसदी आबादी की हैसियत प्रतिदिन 20 रूपये से ज्यादा खर्च करने की नही है। एन सी सक्सेना कमिटि कहती है 50 फीसदी लोग गरीबी के दायरे के नीचे आते है। एनएसएसओ का सर्वे कहता है कि 27 करोड 50 लाख लोग ही गरीब है। तेंदुलकर कमिटि का अध्यन है कि 38 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रही है। सबसे विचित्र बात यह है कि यह सारी कमेटियां सरकार की ही है। मगर सबके सुर अलग अलग है। मगर इतनी तो समझ आप हम भी रखते है कि गरीबों की तादाद 27 करोड़ से उपर है। इतना ही नही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट भाशण के दौरान जोर शोर से ऐलान कर दिया कि 2014 तक हमारे देश में गरीबों का संख्या मौजूदा संख्या से आधी यानी 14 करोड से भी नीचे आ जायेगी। मगर गप्रणव बाबू को क्या मालूम था कि यह कमेटिया उनकी सरकार के इनक्लूसिव ग्रोथ की हवा निकाल देंगी। अब हो यह रहा है हर कोई सरकार से एक ही सवाल पूछ रहा है कि श्रीमान यह तो बताइये कि इस देश में गरीब कितने है। यह सब भी तब हो रहा है, जब सरकार घर बनाने से लेकर पीने का पानी मुहैया कराने, बिजली पहुंचाने से लेकर सस्ता राशन उपलब्ध कराने के लिए, पैस पानी की तरह बहा रही है। योजना आयोग के मुताबिक एक रूपया गरीब तक पहुंचाने के लिए सरकार को 3 रूपये 65 पैसे खर्च करने पड़ते है। इन सब के बावजूद हालात इस तरह है क्यों है तो जवाब केन्द्र के पास रटा रटाया ही रहता है। हमारा काम है योजना बनाकर राज्यों को आार्थक सहायता उपलब्ध कराना। राज्य कामयाब नही तो हम क्या करें। दुर्भाग्य देखिए की 62 साल बात बहस इस बात पर चल रही है कि गरीब कौन है कौन नही । दरअसल गरीबी तय करने का फार्मूला योजना आयेगा ने बनाया था। जो 1993 94 को अधार पर तय किया गया थ। इसका आज के हालात से लेना देना नही है। अब कहा जा रहा है कि इस पर विचार चल रहा है की नया फार्मूला क्या हो। इधर राज्य सरकारों की बेचैनी का क्या हो। उनके मुताबिक केन्द्र सरकार हमारे गरीब को गरीब नही मान रही है। उदाहरण के तौर पर बिहार सरकार कहती है कि उनके राज्य में गरीब 1.5 करोड़ है, मगर केन्द्र सरकार महज 65 लाख का गरीब मानती है। तमिलनाडू सरकार ने तो सबको बीपीएल कार्ड जारी कर रखे है। इससे उन्हें कोई मतलब नही की केन्द्र किनको गरीब मानता है। ऐसा ही कहना ता कुछ और राज्य सरकारों का भी है। मगर इस बहस में कोई नही पड़ता चाहता कि इस देश में जो गरीब नही है उन्हे गरीबी रेखा के नीचे दिखाने के अपराध के लिए कौन जिम्मेदार है। 1.5 करोड़ फर्जी बीपीएल कार्ड निरस्त किये गए उसके लिए कौन जिम्मेदार है। दिल्ली में अकेली एक महिला के नाम पर 900 से ज्यादा राशन कार्ड जारी किये गए थे इसका जिम्मेदार कौन है। कब वो दिन आयेगा जब हमारे देश में जिम्मेदारी तय होगी। क्या इन दोशियों को कानून के तहत सजा नही मिलनी थी। इतना ही नही अभी तो हमें यह भी नही मालूम कि कितने और करोड़ की तादाद में फर्जी राशन कार्ड इस व्यवस्था में मौजूद है। उनकी तो बात करना छोडिये जो जरूरत मंद है मगर उनके पास यह साबित करने का सर्टीफिकेट नही है कि वो गरीब है। अगर अब भी आंख नही खुली यह सिलसिला निरन्तर चलते रहेगा और हम संसद से सड़क तक एक ऐसी बहस पर पडे होगे जिसमें तकोZ का तो अंबार होगा मगर बीमारी की सही इलाज नही। बीमारी भी ऐसा जिसका का कारण और निवारण दोनो से हम भली भांति परिचित है। मगर इस ओर कोई ध्यान नही दे रहा है। शायद कोई इस व्यवस्था में मौजूद कैंसर का इलाज करना नही चाहता। अखिर बदलेंगे कैसे। हमाम में सभी जो नंगे है। विदेशी बैंको में हमारा खरबों का धन रखा पडा है। मगर उसे लाने को लेकर जुबानी बहस के अलावा क्या हुआ। प्रधानमंत्री बडी मछलीयों को पकडने की बात कहते है। मगर जब उनके अपने मंत्री पर भ्रश्टाचार के आरोप लगते है तो वह उसे तथ्यहीन कह देते है। आज मधु कोडा का चर्चा हर आमो खास में है। मगर यह कोई नही सोच रहा है कि इस कोडा के पीछे कितने राजनीतिक कोडाओं का हाथ होगा, क्या इसपर से पर्दा उठ पायेगा। दरअसल इस देश में इतने कोड़ा है जिन्हे पकडने की फिक्र आज किसी को नही है। राजनेताओं में पोलिटिकल विल की कमी इसका सबसे बडा कारण है। कोई बदलना नही चाहता। वरना ऐसा नही कि यहां बदला नही जा सकता। सब कुछ संभव है, मगर राजनीतिक लोक कुछ करना चाहते ही नही। डरते है, कही किसी मोड पर आकर उनका भी पर्दाफाश न हो जाये।
शनिवार, 14 नवंबर 2009
झारखंड। ए पेनफुल जर्नी
झारखंड राज्य 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। लम्बे समय के संघर्ष के बाद लोगों ने चैन की संास ली। लेकिन 9 साल की उम्र में इस राज्य का हाल ऐसा होगा किसी को नही मालूम था। नेताओं और अफसरों की मिलीभगत ने राज्य को ऐसे दोराहे पर लाकर खडा कर दिया है जहां से सिर्फ अंधेरा ही नजर आता है। राज्य की सकल घरेलू उत्पाद में जंगल और कृषि का 24 फीसदी, उघोग का 42 फीसदी और 34 फीसदी सेवा क्षेत्र का योगदान है। मगर इसकी पहुंच एक सीमित वर्ग तक है। जहां देश का 40 फीसदी खनिज मौजूद ह,ै वह गरीबी सबसे ज्यादा है। जहां 52 फीसदी जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। वहां नेताओं की संपत्ती चंद सालों में करोडो तक पहुंच चुकी है। मुख्यमंत्री से लेकर चपरासी और अफसर से लेकर ठेकदार, वहां सब मालामाल है। 59 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार है जबकि 80 के दशक से हम इसका उपचार कर रहे है। आज इसे आप एकीकृत बाल विकास योजना के रूप में जानते है। 64 फीसदी गांवों में अब भी मौसमी सडकें नही है। जबकि प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना को आज 9 साल पूरे होने को है। 89 फीसदी ग्रामीण घरों में बिजली की कोई व्यवस्था नही है जबकि केन्द्र सरकार का नारा है ´बिजली टू आल ´ 2012 तक। मुझे मालूम है कि इस चुनाव में नेता एक दूसरे के कपडे उतारने में कोई कोर कसर बाकी नही छोडेंगे । हर राजनीतिक दल में, हम अच्छ,े तुम गंदे का खेल होगा। मगर फैसला तो जनता को देना है। बस इतना जान लेना जरूरी है कि यह राज्य अब एक ओर मधु कोडा या उसके जैसों का भार नही सहन कर सकता। पहले ही काफी देर हो चुकी है। इस बार जनता के पास एक मौका है एक स्थिर सरकार देने का। निर्दलियो और भ्रष्ट नेताओं की भ्रष्टाचार की फिल्म का ´दि एण्ड´ करने का। इससे बडा दुर्भाग्य और क्या होगा कि अपने 9 साल की उम्र में यह राज्य 6 मख्यमंत्री देख चुका है। बाबू लाल मरांडी, शिबू सोरेन, अर्जुन मुंडा और मधु कोड़ा सब मुख्यमंत्री बने, मगर 2 साल से ज्यादा कोई नही टिक पाया। क्योंकि राजनीति के इस बाजार में डील परमानेन्ट नही हो पाई। मतलब साफ है नोट कमाने में नो रूकावट। क्या आप समझे नही। महत्वकांक्षाओं की आंधी में गुरूजी यानि शिबू सोरेन ने क्या कुछ नही किया, पूरे तीन एटम्ट। आखिरकार जनता को ही उनकी हवा निकालनी पडी। तमाड़ में ऐसा तमाचा पडा कि राश्ट्रपति शासन के अलावा और कोई चारा ही नही बचा। अच्छा ही हुआ वरना आगे और कितनी बबाZदी होती इसका एस्टीमेट लगा लिजिए। वैसे भी राजनीति में अगेन ट्राई के नैतिक सिद्धान्त की पूजा हर नेता करता है। भ्रष्टाचार का जो गंदा खेल इस राज्य ने देखा वो कोई और न देखे। मगर राजनीति का वो घिनौना खेल जनता के सामने आ गया जिसकी चर्चा अक्सर होती है। आज नेता फिर जनता के दरबार में हैं। झारखंड राज्य एक सबक है राजनीति के उस बदनाम चरीत्र का जिसको सुधारने की चर्चा होने लगे तो नेता चीख चीख कर अपना गला फाड लेंगे। मगर वो कितने पाक साफ है यह तो उनकी आत्मा ही जाने। भ्रष्टाचार इस देश के सामने सबसे बडी चुनौती है। जब तक समाज के इन दुश्मनों को सजा नही मिलेगी, तब तक भारत नही बदल सकता। फिर चाहे आप मनरेगा का रोना पीटे या इन्क्लूसिव ग्रोथ का। सवाल मधु कोडा या उसके सहयोगियों का नही है। सच्चाई तो यह है इस देश में कई मधुकोड़ा है जो अपने रसूक के चलते भारत के संविधान और उसके दण्ड विधान का बार बार बलात्कार करते है मगर उनको सजा देना तो दूर हम उन्हे अपने पलको मे बैठाये रखते है। हमें जागना होगा। इस देश के नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वो इसके खिलाफ एक जुट हो। तभी इस देश के शक्ति बोध और सौन्दर्य बोध को बचाया जा सकेगा। आज यह लेख लिखते हुए मुझे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की वह पंक्तियां याद आ रही है।
कौन कौरव, पांडव कौन, टूटा सवाल है,
क्योंकि दोनो ओर शकुनि का कूट जाल है।
धर्मराज ने छोडी नही जुए की लत,
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है।
आज बिना श्रीकृष्ण के महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना ह,ै रंक को तो रोना है।
कौन कौरव, पांडव कौन, टूटा सवाल है,
क्योंकि दोनो ओर शकुनि का कूट जाल है।
धर्मराज ने छोडी नही जुए की लत,
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है।
आज बिना श्रीकृष्ण के महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना ह,ै रंक को तो रोना है।
गुरुवार, 12 नवंबर 2009
मिशन यूपी
कांग्रेस के लिए मिशन यूपी मुंगेरी लाल के हसीन सपने से कम नही। पहले लोकसभा में जबरदस्त कामयाबी और फिर फिरोजाबाद का उपचुनाव 85000 से ज्यादा वोटों से जीतना इस बात की गारंटी नही कि यह कांग्रेस की वापसी की शुरूआत है। यूपी के संगठन के स्तर में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। फिरोजाबाद सीट तो मुलायम के गलत फैसले के चलते सपा ने गवांई। जनता ने उनके परिवार से पांच लोगों को तो झेल लिया मगर जब 6वें यानि उनकी बहू की बात आई तो जनता ने उन्हें दरवाजा दिखाना ही था। यह उन नेताओं के लिए भी एक सबक है जो राजनीति में परिवारवाद को जमकर बड़वा दे रहे है। कांग्रेस के राजबब्बर के मुकाबले डिंपल यादव कही नही टिकती थी। बस यही बात कांग्रेस के पक्ष में गई। फिर कैसे पूरी तरह इसे राहुल का करिश्मा कह सकते है। दरअसल मुलायम सिंह इस मुगालते में थे कि जनता उनके नाम पर वोट डालती है। इससे कोई फर्क नही पडता कि चुनाव में उम्मीदवार कौन है। बस यह निर्णय आत्मघाती हुआ। कांग्रेसी चाटुकारों को तो बस मौका चाहिए राहुल गांधी या फिर सोनिया गांधी की तारीफ करने का। मौका मिल गया सो हो गई चाटुकारिता शुरू। अच्छी बात यह है राहुल गांधी राजनीति के इस रंग को बखूबी पहचानते है।
शुक्रवार, 14 अगस्त 2009
आजादी के 63 साल

जलाओं दिये पर रहे ध्यान इतना,
अन्धेरा घना कही रह नही जाए।
गर्व हो रहा है। मै खुशी से फूला नही समा रहा हूं। आज 15 अगस्त की पावन बेला पर देशवासियों को शुभकामनाऐं देना चाहता हूं। मगर कुछ सवाल मन में बिजली की तरह कौंध रहे है। जिसका जवाब कही मिलता नजर नही आ रहा है। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश को सम्बोधित करते सुना। देशवासियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखकर अच्छा लगा। उन्होने कुछ सपने दिखाये। आने वाले पॉच सालों में जनता के वोट का हिसाब किताब जो करना है। बस एक सवाल नीति निर्माताओं से । आजादी के 63 सालों में क्यों आबादी का एक बडा हिस्सा आज भी गरीब है। भूखा है, मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, सडक और आवास से क्यों वंचित है। जवाब है उनके पास। फिर कैसा आजादी का जश्न। ये क्या उन महान देशभक्त सेनानियों का अपमान नही। क्या इसी दिन के लिए उन्होने कुबाZनी दी थी। आजाद भारत की परिकल्पना थी उनकी। जहां 30 करोड जनता आज भी गरीब है । 40 करोड लोग असंगठित क्षेत्र से आते है। 77 फीसदी आबादी की औकात एक दिन में 20 रूपये से अधिक खर्च करने की नही है। 40 फीसदी किसान विकल्प मिलने पर किसानी छोडना चाहते है। लाखों की तादाद में किसान हालात से हार मानकर आत्महत्या कर चुके है। महिलाऐं और बच्चे कुपोश्ण का शिकार है। 1 करोड 12 लाख बाल मजदूर है। बेरोजगारी चरम पर है। आधी से ज्याद आबादी खुले में शौच जाती है। आबादी के बडे हिस्से के पास पीने का साफ पानी नही है। भ्रश्टाचार ने पूरे देश को अपनी गिरफत में ले रखा है। महंगाई आम आदमी के हाथ वे निवाला झीन रहे है। आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद ने हमें डरा के रखा है।फिर भी जश्ने आजादी। झूठे आश्वासन। देश की तकदीर और तस्वीर बदलने का सब्जबाग। विकास का फायदा हर व्यक्ति तक पहुचाने की झूठा वायदा। मगर हालत खशियां मनाने वाले नही। सोचने को विवश करने वाले है। सोचिए आप भी । क्यों आप नही चाहते।
खुद जियें सबको जीना सिखाऐं
अपनी खुशियां चलों बांट आये।
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