रविवार, 6 अक्टूबर 2013

देवालय बनाम शौचालय का सच

आजकल बहस देवालय बनाम शौचालय पर चल रही है। कोई कहता है आस्था को ठेस पहुंची कोई कहता है किसी धर्म का अपमान है। मगर आजादी के इतने सालो के बाद भी 50 फीसदी से ज्यादा आबादी खुले में शौच जाने को मजबूर है। सरकारों ने कार्यक्रम का नाम तो बदल दिया मसलन 1986 राष्टीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम, 2002 में संपूर्ण स्वच्छता अभियान और 2012 में इसे नाम दिया निर्मल भारत अभियान। मगर भारत को निर्मल करने में न जाने कितने साल और लग जाऐंगे। आजादी के 67 सालों के बाद अगर हम केवल 37.2 फीसदी घरों तक शौचालय पहुंचा पाऐं है तो इतनी विशाल आबादी तक पहुंचने में एक लंबा वक्त लगेगा। एक देश जो अपने को विकसित राष्ट बनाने की ओर अग्रसर है। अपनी विकास दर पर इतराता है। राज्यों के मुख्यमंत्री विकास का ढंगा पीटते है अगर वहां शौचालय तक का प्रबंध नही है तो उनके विकास के दावों को पोल अपने आप खुल जाती है। मसलन गुजरात में यह कवरेज  केवल 34.24 फीसदी है, बिहार में 18.61, झारखंड में 8.33 फीसदी, मध्यप्रदेश 13.58 फीसदी, महाराष्ट 44.20 फीसदी, ओडिशा 15.32 फीसदी, राजस्थान 20.13 फीसदी तमीलनाडू 26.73 फीसदी, उत्तरप्रदेश 22.87 फीसदी पश्चिम बंगाल 48.70 फीसदी और छत्तीसगढ़ 14.85 फीसदी घरों में शौचालय का प्रबंध है। इनमें से ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों के विकास का तारीफ करते नही अघाते।  जिन राज्यों ने अच्छा काम किया है उसमें सिक्किम सहित उत्तरपूर्व के ज्यादातर राज्य के साथ साथ गोवा और पंजाब शामिल हैं । दिल्ली और चंडीगढ़ में भी यह समस्या का समाधान काफी हर तक निकाला जा चुका है। आज सच्चाई यह है कि विश्व में खुले में शौच करने वाले लोगों में 60 फीसदी भारतीय हैं। इस सबसे पूरे विश्व मे भारत की गंदी तस्वीर उभरती है। यह अब सिद्ध हो चुका है कि गंदे शौचालयों के कारण स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान होता है। भारत में हर साल 5 साल से छोटे 4-5 लाख बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं और इसका प्रमुख कारण है गंदगी के कारण फैलने वाला हैजा तथा अन्य संक्रामक रोग। नये साक्ष्य सामने आये हैं कि साफ-सफाई न होने के कारण भारतीय बच्चों की लम्बाई कम होती जा रही है और उनकी आर्थिक उत्पादकता में कमी आ रही है। चिकित्सा अनुसंधानों से साफ हो गया है कि कुपोषण, जिसे प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय शर्म कहा है, का सीधा संबंध साफ-सफाई की खराब व्यवस्था और गंदे वातावरण से है। खुले में मल त्याग महिलाओं का अपमान है और उनके स्वाभिमान पर खुली चोट है। इससे पता चलता है कि साफ-सफाई केवल स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा ही नहीं है, बल्कि यह जीवन, जीविकोपार्जन और इन सबसे ऊपर मानवीय गरिमा को भी प्रभावित करता है।

इस समस्या के समाधान के लिए सरकार सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान चला रही है। इसके तहत घरों, स्कूलों आदि में शौचालयों का निर्माण कराया जाता है साथ ही गावों में मल व्ययन एवं कचरा प्रबंधन भी किया जाता है इस कार्यक्रम को आंशिक सफलता ही मिली है। अब भी भारत में अस्वच्छता, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में, गंभीर चुनौती बनी हुई है। भारत की कुल ढाई लाख ग्राम पंचायतों में से महज 28,000 ही निर्मल ग्राम बन पाई है। निर्मल ग्राम से आशय ऐसे गांव से है जहां खुले में शौच पूरी तरह से बंद हो गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार, केवल 32.7 फीसदी घरों में ही शौचालयों की सुविधा उपलब्ध है। अगर हमें इस दिशा में सफलता हासिल करनी है तो अधिक तेजी से अधिक काम करना होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, निर्मल भारत अभियान (एनबीए) शुरू किया गया है। स्वच्छता की दिशा में एनबीए एक नया अध्याय है जो 2022 तक भारत में खुले में शौच पर पूरी तरह रोक लगाने में सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान में मददगार साबित होगा। इस दिशा में कुछ राज्यों ने तेजी से प्रगति की है। सिक्किम भारत का सबसे पहला खुले में शौच मुक्त प्रदेश बन गया है और नवम्बर, 2012 तक केरल भी इस लक्ष्य को हासिल कर लेने की बात कही गई थी।  संभवतः 2014 तक हिमाचल प्रदेश भी यह चमत्कार कर दिखाएगा। हरियाणा में करीब 25 फीसदी तथा महाराष्ट्र में एक तिहाई ग्राम पंचायतें निर्मल ग्राम पंचायतों का दर्जा हासिल कर चुकी हैं। निर्मल ग्राम अभियान में नया क्या है? सर्वप्रथम इस साल साफ-सफाई के लिए, बजट प्रावधान करीब दो गुना कर दिया गया है। इस साल इस मद के लिए 3500 करोड़ रु. का प्रावधान रखा गया है। 12वीं योजना (2012-17) में इसे चार गुना करने का प्रस्ताव है। नए वित्तीय प्रावधानों से इस चुनौती से निपटने के लिए नए संकल्प का संकेत मिलता है। अच्छी किस्म के शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए घरेलू शौचालयों के निर्माण में अनुदान की राशि 3200 रु. से बढ़ाकर 10,000 रु. कर दी गई है। इसमें 4500 रु. तक की वह अतिरिक्त राशि भी शामिल है जो मनरेगा के तहत प्रदान की जाती है। दूसरे, निर्मल भारत अभियान से पुरानी नीति की खामी दूर कर दी गई है जिसमें किसी पंचायत में कुछ चुनिंदा घरों को ही अनुदान दिया जाता था। निर्मल भारत अभियान में पूरी पंचायत को ही स्वच्छता की राह पर मोड़ दिया गया है। यानी चुनी हुई पंचायत में समस्त घरों में शौचालय सुनिश्चित किए जाएंगे और इनकी निगरानी का काम पंचायतों को सौंप दिया जाएगा। 


निर्मल भारत अभियान की चौथी खूबी यह है कि इसमें प्रोत्साहन आधारित उपायों पर जोर दिया गया है, जो पंचायतें निर्मल ग्राम पंचायत का दर्जा हासिल कर लेती हैं, उन्हें ग्राम पुरस्कार के रूप में नकद राशि दी जाती है। अभियान की सफलता में इस पहलू की अहम भूमिका रही है। जो पंचायतें कम से कम 6 माह तक निर्मल ग्राम पंचायत का दर्जा बनाए रखती हैं, उन्हें पुरस्कार की दूसरी किस्त का भुगतान किया जाता है। यह प्रावधान भी रखा गया है कि लक्ष्य में चूकने वाली पंचायतों से पुरस्कार वापस ले लिया जाएगा। एनबीए में पांचवी नवीनता यह है कि इसमें जल, शौच, स्वच्छता की एकीकृत योजना बनी गई है। बेहतर परिणामों के लिए इन तीनों को आपस में जोड़ना बेहद जरूरी था। निर्मल ग्राम के रूप में चिन्हित पंचायतों को राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत जलापूर्ति में वरीयता दी जाएगी। इसके अतिरिक्त, जिन पंचायतों में तमाम लोगों के लिए जल की उपलब्धता है उन्हें निर्मल ग्राम के रूप में चुनने में वरीयता मिलेगी। एनबीए में सतत निगरानी और मूल्यांकन की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। इसके आधार पर जमीनी हालात की सही सूचना हासिल की जा सकती है। हर दूसरे वर्ष स्वतंत्र मूल्यांकन अनिवार्य बनाया गया है। राष्ट्रीय स्तर के निगरानीकर्ताओं द्वारा वास्तविक मूल्यांकन और इसके परिणामों को ऑनलाइन जारी करने का भी प्रस्ताव है। इसका यह मतलब नहीं है कि हम जीत की घोषणा कर रहे हैं। सफलता के लिए बहुत सी परम्पराओं और कुरीतियों को तोड़ना होगा। विभिन्न समुदायों की भागीदारी बढ़ानी होगी और सरकार को हर स्तर पर गंभीर प्रयास करने होंगे। महात्मा गांधी ने कहा था, जन सुविधाएं स्वतंत्रता से भी महत्वपूर्ण हैं। यह महात्मा गांधी के स्वप्न को साकार करने का समय है। तभी हम खुले में शौच करने की शर्मिंदगी से मुक्त होकर भारत को सही अर्थ में स्वतंत्रता की ओर ले जाएंगे। इसका यह मतलब नहीं है कि हम जीत की घोषणा कर रहे हैं। सफलता के लिए बहुत सी परम्पराओं और कुरीतियों को तोड़ना होगा। विभिन्न समुदायों की भागीदारी बढ़ानी होगी और सरकार को हर स्तर पर गंभीर प्रयास करने होंगे। महात्मा गांधी ने कहा था, जन सुविधाएं स्वतंत्रता से भी महत्वपूर्ण हैं। यह महात्मा गांधी के स्वप्न को साकार करने का समय है। तभी हम खुले में शौच करने की शर्मिंदगी से मुक्त होकर भारत को सही अर्थ में स्वतंत्रता की ओर ले जाएंगे। 




सोमवार, 16 सितंबर 2013

मिशन मोदी

2003 में एनडीए शासनकाल में गुजरात दंगों के बाद 'राजधर्म' नहीं निभा पाने के कारण वाजपेयी मोदी से इस्तीफा मांगने के पक्ष में थे। लेकिन उस वक्त उनके सबसे बड़े समर्थक लालकृष्ण आडवाणी ने उनसे कहा था- ऐसा मत कीजिए, बवाल हो जाएगा।

दस साल बाद 2013 में वही लालकृष्ण आडवाणी अब बीजेपी और आरएसएस से मिन्नत कर रहे थे कि वे अभी मोदी को पीएम कैंडिडेट नहीं बनवाएं। उन्हें जवाब मिला कि अब और देरी की, तो बवाल हो जाएगा।

सवाल उठता है कि आखिर इन दस बरसों में ऐसा क्या हुआ कि पूरा चक्र पलट गया और और बीजेपी के भीष्म पितामह अपने शिष्य से ही नाराज हो गए। आडवाणी की मोदी से नाराजगी के ये पांच अहम कारण हो सकते हैं:
[ जारी है ]

1. गुजरात कनेक्शन
लालकृष्ण आडवाणी इस बात से आहत रहे कि हाल में गुजरात में बीजेपी की मजबूती का सारा क्रेडिट सिर्फ नरेंद्र मोदी को दिया गया, जबकि वहां उन्होंने पार्टी को जड़ से सींचा था। दरअसल आडवाणी मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले 1991 से ही गुजरात से लोकसभा सीट जीतते रहे हैं। गुजरात में पहली बार आडवाणी ने मोदी को प्रोजेक्ट किया था। ऐसे में उन्हें इस बात पर मोदी से दु:ख रहा कि मोदी ने बाद में इस बात को स्वीकार नहीं किया और सारा क्रेडिट खुद लेते रहे।

2. आडवाणी-सुषमा-मोदी
आडवाणी हाल के वर्षों में सुषमा स्वराज को अधिक तरजीह देते रहे। आडवाणी ने कई मौकों पर सुषमा को अपना उत्तराधिकारी भी संकेतों में बताया। उनके पक्ष में एक गुट भी था। लेकिन मोदी न सिर्फ सुषमा से आगे बढ़ते गए, बल्कि आडवाणी के गुट में सेंध लगाते रहे। यह आडवाणी को नागवार गुजरा।

3. रथयात्रा, गुजरात और बिहार
2011 में आडवाणी ने पूरे देश में करप्शन के खिलाफ यात्रा निकाली थी। उस वक्त आई खबरों के मुताबिक, मोदी इस आयोजन के खिलाफ थे। साथ ही, इसके बिहार से शुरू करने के फैसले पर भी विवाद हुआ कि यह गुजरात से शुरू होना चाहिए था। इन विवादों के बीच आडवाणी की यह यात्रा सफल नहीं रही।

4. पीएम न बनने का दुख
लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की हसरत कभी छिपी नहीं रही। उन्होंने इस बात से कभी इनकार नहीं किया कि वह 2014 के चुनाव में अपनी दावेदारी को वापस ले रहे हैं। इसके अलावा जेडीयू और दूसरे सहयोगी दल भी उनके पक्ष में रहे। इन सबके बीच उनको नजरअंदाज कर मोदी ने जिस तेजी से इस पद के लिए लॉबी की, आडवाणी की उनसे नाराजगी बढ़ती गई।

5. नहीं मिली एहसान की कीमत
लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी को जरूरत के वक्त लाइफलाइन दी। लेकिन उन्हें इस बात का अफसोस रहा कि जब उन्हें मोदी के समर्थन के जरूरत पड़ी, तो वह चुप रहे। जिन्ना प्रकरण में जब आडवाणी पूरे अलग-थलग पड़े तब भी मोदी ने एक शब्द भी नहीं बोले। वहीं मोदी को जब आरएसएस की नजदीकी और आडवाणी के साथ में कोई एक विकल्प चुनने का मौका आया, तो उन्होंने आरएसएस का साथ चुना।

आडवाणीः उत्थान और पतन

1986: पहली बार आडवाणी बीजेपी के अध्यक्ष बने। लगभग इसी वक्त देश में कुशासन और भ्रष्टाचार के चलते सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के प्रति जन असंतोष बढ़ता नजर आ रहा था। मौके को भांपकर आडवाणी ने देश में एक नई आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत की।

1989: कट्टर हिंदुत्व का अजेंडा आगे बढ़ाते हुए आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन खड़ा किया। पार्टी ने बाबरी मस्जिद की विवादास्पद जगह पर राम मंदिर के निर्माण की मांग उठाकर सियासत को सुलगा दिया। इसी सिलसिले में आडवाणी ने देशभर में अपनी बहुचर्चित रथयात्रा शुरू की, लेकिन बिहार में लालू यादव सरकार द्वारा उन्हें बीच में ही गिरफ्तार कर लिए जाने से यात्रा अधूरी रह गई।

1991: आडवाणी की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का फायदा बीजेपी को उत्तर भारत में हुआ और आम चुनाव में बीजेपी कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।

1992: आडवाणी की रथ यात्रा के दो बरस बाद कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद ढहा दी। कई दूसरे लोगों के साथ आडवाणी मुख्य अभियुक्तों में शामिल किए गए।

1996: पहली बार बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए की सरकार बनने के बाद आडवाणी देश के गृह मंत्री बनाए गए, लेकिन प्रधानमंत्री वाजपेयी की यह सरकार महज 13 दिन चल पाई।

1998-99: दोबारा एनडीए की सरकार बनने पर आडवाणी को फिर से गृह मंत्री बनाया गया और बाद में उन्हें उपप्रधानमंत्री का पद दिया गया। बीजेपी में यह अटल-आडवाणी का दौर था। हालांकि गृह मंत्री के तौर पर आडवाणी का कार्यकाल मुश्किल भरा रहा और उन्हें बाहरी आतंकी हमलों के साथ-साथ ढेरों आंतरिक उपद्रव से भी जूझना पड़ा। एनडीए ने 1999 से 2004 तक अपना कार्यकाल पूर्ण किया।

2004: बीजेपी समेत एनडीए अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नजर आ रहा था। आडवाणी ने पार्टी की ओर से आक्रामक प्रचार अभियान चलाया और यहां तक दावा किया कि कांग्रेस को सौ सीटें भी नहीं आएंगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। बीजेपी की हार हुई और उसे एक बार फिर विपक्ष में बैठने को मजबूर होना पड़ा। हार के बाद बीजेपी के 'पुरोधा' अटल बिहारी वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। इसी के साथ आडवाणी के हाथों में बीजेपी की कमान आ गई। आडवाणी लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। उन्हें पार्टी के अंदर से ही कई बगावत का सामना करना पड़ा। उनके दो करीबी- उमा भारती और मदन लाल खुराना और लंबे वक्त से प्रतिद्वंद्वी रहे मुरली मनोहर जोशी ने खुलकर उनके खिलाफ बयान दिए।

2005: आडवाणी उस वक्त बीजेपी के कई टॉप नेताओं के निशाने पर आए गए, जब उन्होंने अपनी चर्चित पाकिस्तान यात्रा के दौरान कराची में मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जिन्ना को 'सेक्युलर' नेता बताया। आरएसएस को भी यह नागवार गुजरा। दबाव इतना बढ़ा कि आडवाणी को बीजेपी अध्यक्ष का पद छोडऩा पड़ा। हालांकि कुछ दिनों बाद उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया। दिसंबर में मुंबई में बीजेपी के रजत जयंती समारोह में आरएसएस प्रमुख केएस सुदर्शन ने कहा कि आडवाणी और वाजपेयी को अब नए नेताओं के हक में रास्ता छोड़ देना चाहिए। इससे आडवाणी के आरएसएस से रिश्तों में और खटास आ गई।

2007: बीजेपी संसदीय बोर्ड ने औपचारिक तौर पर ऐलान किया कि अगले आम चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे।

2009: आम चुनाव बीजेपी ने आडवाणी के नेतृत्व में ही लड़ा और आडवाणी को 'पीएम इन वेटिंग' कहा गया, लेकिन एक बार फिर बाजी कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए ने ही मारी। आडवाणी ने सुषमा स्वराज के हक में लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद छोड़ दिया।

2013: नरेंद्र मोदी को बीजेपी की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज होकर आडवाणी ने 10 जून को पार्टी के सभी अहम पदों से इस्तीफा दे दिया। आडवाणी ने कहा कि बीजेपी अब वैसी आदर्शवादी पार्टी नहीं रही, जिसकी बुनियाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने तैयार की थी। पार्टी ने हालांकि उनका इस्तीफा अस्वीकार कर दिया और आडवाणी ने भी पार्टी की बात मानकर अपना फैसला वापस ले लिया। इस महीने बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को औपचारिक तौर पर अपने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। नाराज आडवाणी संसदीय बोर्ड की मीटिंग में नहीं पहुंचे और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर अपनी 'व्यथा' व्यक्त की।

मोदी मैजिक : टी स्टॉल से पीएम कैंडिडेट तक

1950: गुजरात के मेहसाणा जिले में जन्मे नरेंद्र मोदी अपने छह भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थे। मोदी ने अपने जीवन की शुरुआत अपने भाई के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान चलाने से की।

मोदी के राजनीतिक करियर की शुरुआत आरएसएस के प्रचारक के तौर पर हुई। नागपुर में शुरुआती प्रशिक्षण के बाद मोदी को संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की गुजरात यूनिट की कमान सौंपी गई।

1987: नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर लिया। एक प्रभावशाली संगठनकर्ता के रूप में उन्होंने वह रणनीति बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई जो गुजरात में बीजेपी की जीत में निर्णायक साबित हुईं। इस वक्त तक गुजरात बीजेपी में शंकर सिंघ वाघेला और केशुभाई पटेल स्थापित नेताओं में शुमार थे।

2001: केशुभाई पटेल की जगह नरेंद्र मोदी को गुजरात का सीएम नियुक्त कर दिया गया, क्योंकि केशुभाई सरकार का प्रशासन नाकाम साबित हो रहा था। उस वक्त कई नेता मोदी की काबिलियत और नेतृत्व को लेकर बहुत ज्यादा आश्वस्त नजर नहीं आए थे।

2002: यह ऐसा साल था जिसने भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी नाम के राजनेता के व्यक्तित्व को परिभाषित करने का कार्य किया। फरवरी 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़के भीषण साम्प्रदायिक दंगों में मुस्लिम समुदाय के हजारों लोगों की नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी गई। मोदी सरकार पर आरोप लगा कि उनका प्रशासन मूकदर्शक बना रहा और दंगों की आग पर काबू पाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए। यहां तक कि प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी मोदी को 'राजधर्म' का पालन करने की नसीहत दी। पीएम वाजपेयी ने मोदी को बर्खास्त करने का भी मन बना लिया था, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी ही वह व्यक्ति थे, जिनके वीटो से मोदी बच गए।

बढ़ते विरोध के बाद नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन उसके बाद हुए असेंबली चुनाव में मोदी ने स्पष्ट बहुमत के साथ जीत दर्ज की। मोदी ने न केवल सीएम के रूप में अपना टर्म पूरा किया बल्कि उसके बाद लगातार दो असेंबली चुनावों में भी बहुमत हासिल कर जीत की हैट ट्रिक लगा दी। मोदी की कट्टर हिंदुत्ववादी छवि और जीत हासिल करने की क्षमता का ही असर था कि बीजेपी में उनका कद बढ़ता ही चला गया। यही नहीं अपने राजनीतिक विरोधियों को भी मोदी ने बारी-बारी से हाशिए पर पहुंचाने में कामयाबी पाई।

गुजरात में मोदी का 'विकास मॉडल' देश ही नहीं, दुनियाभर में चर्चा का विषय बन गया। कॉरपोरेट जगत और इंडस्ट्री द्वारा मोदी सरकार का गुणगान, गुजरात में लाखों करोड़ रुपये का निवेश होने और प्रशासन को कुशल मैनेजर की तरह चलाने की मोदी की काबिलियत का बीजेपी ने जमकर बखान किया, वहीं कांग्रेस समेत तमाम विपक्ष ने मोदी के 'साम्प्रदायिक' चेहरे के लिए उन पर तीखे हमले किए।


2013: जुलाई में बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को बीजेपी की चुनाव प्रचार समिति का चेयरमैन नियुक्त किया, जिसके साथ ही उनका अगले चुनाव के लिए पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ हो गया।

वरिष्ठ पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी के कड़े विरोध को दरकिनार करते हुए 13 सितंबर 2013 को बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को आखिरकार 2014 के आम चुनाव के लिए अपना प्रधानमंत्री पद का कैंडिडेट घोषित कर दिया। इसी के साथ यह पार्टी में मोदी के उदय और आडवाणी के राजनीतिक अवसान की उद्घोषणा बन गई।

कैसे पूरा होगा मोदी का मिशन 272

नरेंद्र मोदी अब निकलेंगे मिशन 272 प्लस के सफर पर। अगले आम चुनाव में मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए 272 का जादुई आंकड़ा पाने के लिए कुछ अहम राज्यों पर अधिक जोर लगाना होगा। अगर उन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचना है, तो उन राज्यों में खुद या अपने गठबंधन सहयोगियों की बदौलत 272 का फासला तय करना होगा। मोदी को देश के शीर्ष पद पर पहुंचने के लिए इन राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन निर्णायक साबित होगा।

उत्तर प्रदेश
लोकसभा सीटें- 80
बीजेपी की मौजूदा सीटें - 10

अगले आम चुनाव में मोदी ने सबसे अधिक उम्मीद और दांव उत्तर प्रदेश पर ही लगाया है। अगर 272 के जादुई आंकड़े को छूना है तो वहां 80 सीटों में बड़ा हिस्सा लेना होगा। अपने सबसे करीबी अमित शाह को वहां भेजकर मोदी ने संकेत दे दिए हैं कि उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन के लिए वह कितने गंभीर हैं। मोदी को वहां नए सिरे से वोटों के धुव्रीकरण से फायदे की उम्मीद होगी। लेकिन मोदी को अपने खिलाफ वोटों के धु्रवीकरण का घाटा भी हो सकता है।

बिहार
लोकसभा सीटें- 40
बीजेपी की मौजूदा सीटें- 12

बिहार में 2009 के आम चुनाव बीजेपी ने नीतीश कुमार के साथ मिलकर लड़े थे और एनडीए गठबंधन को 31 सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार मोदी को 2009 के ठीक उलट सबसे अधिक विरोध नीतीश कुमार से ही झेलना होगा। बिहार में मोदी को सियासत का साथी शायद ही मिले। इसके अलावा लालू प्रसाद के नेतृत्व में आरजेडी भी मोदी की राह में रोड़ा होंगे। कांग्रेस नीतीश या लालू के साथ मिलकर मोदी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। ऐसे में मोदी को बिहार में पार्टी को बढ़त दिलाना कम चुनौतीपूर्ण नहीं है

पश्चिम बंगाल
लोकसभा सीटें- 42
बीजेपी की मौजूदा सीटें- 1

पश्चिम बंगाल में राजनीति अब तक तृणमूल और लेफ्ट के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वहां बीजेपी एक शक्ति के रूप में उभर कर अब तक सामने नहीं आ पाई है। मोदी को वहां दो पारंपरिक ताकतों के बीच अपने लिए मिशन 272 में कुछ सीटें लेना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

तमिलनाडु
कुल सीटें- 39
मौजूदा सीट- 0

नरेंद्र मोदी तमिलनाडु में भले बीजेपी को अपने बूते अधिक सीटें नहीं दिलवा सकें लेकिन जयललिता की एआईडीएमके के साथ गठबंधन कर वह बीजेपी को थोड़ी-बहुत बढ़त जरूर दिलवा सकते हैं।

गुजरात
कुल सीटें- 26
बीजेपी की मौजूदा सीटें- 15

नरेन्द्र मोदी अपने गृह राज्य में जरूर बीजेपी को क्लीन स्वीप दिलाने की कोशिश करेंगे। पिछले चुनाव में उन्हें कांग्रेसी ने कड़ी चुनौती दी थी और लगभग आधी सीटें मिली थीं।

कर्नाटक
कुल सीटें- 28
बीजेपी की मौजूदा सीटें- 19

पिछले चुनाव में बीजेपी ने कर्नाटक में बेहतरीन प्रदर्शन किया था। लेकिन तब से पार्टी का वहां तेजी से पतन ही हुआ है। ऐसे में मोदी को 2009 का जादू वापस लाना मौजूदा समीकरण में कतई आसान नहीं है। हालांकि मोदी समर्थक येदियुरप्पा बीजेपी के करीब आकर वापसी करने में मोदी की मदद कर सकते हैं।

राजस्थान
कुल सीटें- 25
बीजेपी की मौजूदा सीटें- 4

पिछले चुनाव में बीजेपी का राजस्थान में बेहद खराब प्रदर्शन रहा था। वहां महज 4 सीट पार्टी को मिली थी। इस बार वसुंधरा राजे के साथ मिलकर राजस्थान में कांग्रेस के दुर्ग को भेदने निकलेंगे। लेकिन आम चुनाव से पहले होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम का असर होगा।

महाराष्ट्र
कुल सीटें- 48
बीजेपी की मौजूदा सीटें- 9

महाराष्ट्र की राजनीति में मोदी का जादू चलेगा? जानकारों के अनुसार वहां हर तरह के चुनाव में अब तक स्थानीय नेता अहम निर्णायक फैक्टर बनते रहे हैं। बड़ा सवाल है कि क्या मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी उसमें अपनी जगह बना पाएगी।

ओडिशा
कुल सीटें- 21
बीजेपी की मौजूदा सीट- 0

ओडिशा में बीजेपी पिछले चुनाव में खाता तक नहीं खोल नहीं पाई थी। आगामी चुनाव तक भी पार्टी ने अपना खास जनाधार नहीं पाया है। हालांकि कैडर वहां मौजूद है। वहीं कांग्रेस वहां सक्रिय है। ऐसे में कैडर में जान फूंकना और नवीन पटनायक और कांग्रेस के बीच अपनी पार्टी के लिए 272 में कुछ हिस्सा यहां लेना मोदी के लिए बड़ा टास्क होगा।

मध्य प्रदेश
कुल सीटें- 29
बीजेपी की सीटें- 16

मध्य प्रदेश में बीजेपी के पास शिवराज सिंह चौहान के रूप में बड़े कद का नेता पहले से ही मौजूद है। ऐसे में मोदी को चौहान के राजनीतिक अस्तित्व और अभिमान को चुनौती दिए बिना वहां संतुलन बनाकर आगे बढऩे की चुनौती होगी। पिछली बार वहां पार्टी का मिश्रित प्रदर्शन रहा था।

कुल सीटें -378
इनमें बीजेपी की मौजूदा सीटें-83
(इनमें उन राज्यों को लिया गया है जहां से लोकसभा की कम से कम 20 सीटें है)

मोदी की सफलता के मंत्र
नरेंद्र मोदी आगामी लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी के पीएम उम्मीदवार बन गए हैं। एक समय था जब गोधरा कांड के बाद मोदी का राजनीतिक कॅरियर दांव पर लग गया था, लेकिन तब लाल कृष्ण आडवाणी का उन्हें सहारा मिला। उसके बाद मोदी ने अपनी सोच, कार्य शैली और राजनीतिक रणनीति में बदलाव किया। ये बदलाव कि स तरह के रहे, आकलन कर रहे हैं जोसफ बर्नाड :

बिजली-पानी पहली जरूरतः मोदी अपने इंटरव्यू में एक घटना बार-बार सुनाते हैं। मुख्यमंत्री के रूप में लोगों से जुडऩे के लिए उन्होंने जन दरबार का आयोजन शुरू किया। उन्हें लगा कि लोग मकान, नौकरी या अन्य समस्याओं को उनके सामने रखेंगे। मगर अधिकतर लोगों की मांग थी कि उन्हें पीने के लिए पानी और रात में आराम से सोने के लिए बिजली चाहिए। बकौल मोदी, यह मांग उनकी सोच में बदलाव का कारण बनी। भारतीय लोग की चाहत, अमेरिकी और ब्रिटिश लोगों से अलग है। वे उनकी तरह नहीं चाहते कि बच्चे के जन्म लेते ही सारी जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी जाए। भारतीय मेहनत करना चाहते हैं। उन्हेें तो बस सरकार का सपोर्ट चाहिए बुनियादी सुविधाएं पाने के लिए। मोदी ने तुरंत राज्य के लोगों को पानी और बिजली मुहैया कराने के लिए काम शुरू किया।i

अनिवासी गुजराती का विश्वासः मोदी, चीन के विकास में चीनी अनिवासियों के योगदान से काफी प्रभावित हैं। उन्होंने राज्य के विकास के लिए गुजरात के उद्योगपतियों का विश्वास हासिल किया। गुजराती उद्यमी चाहे, वे विदेश में हों या फिर किसी अन्य राज्य में, मोदी ने उनसे संपर्क साधा। उसका सुखद परिणाम सामने आया। गुजरात की विकास गाथा का आगाज शुरू हुआ।

भारतीय कॉर्पोरेट का साथः गुजराती उद्यमियों का सहयोग पाने के बाद मोदी ने इसका विस्तार किया। उन्होंने देेश के कॉरपोरेट जगत का विश्वास और सहयोग पाने का प्रयास किया। इनवेस्टर मीट कराया। गुजरात में निवेश बढ़ाने पर पूरा जोर दिया। गुजरात में कारोबार की शुरुआत करने या फिर मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए उन्होंने उदार नीति अपनाई। टाटा को जब पश्चिम बंगाल में नैनो कार निर्माण के लिए सिंगुर प्लांट में विवाद का सामना करना पड़ा तो उन्हें मोदी का ही सहारा मिला। आईसीआईसीआई बैंक के चेयरमैन के. वी. कामत का कहना है कि मोदी का गुजरात विकास मॉडल तर्कसंगत है। मोदी ने राजनीति और आर्थिक क्षेत्र में जो अंतर रखा है, उससे गुजरात और कॉरपोरेट जगत को फायदा हुआ है।

रिस्क लेने की क्षमताः नरेंद्र मोदी ने जल्द आर्थिक फैसले लेने के साथ रिस्क का सामने करने की जो क्षमता दिखाई, वह देश के साथ विश्व के कॉरपोरेट जगत को पसंद आई। मोदी ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ रिटेल, रीयल्टी और अन्य सेक्टरों में प्रोजेक्टों को पारित करने के लिए त्वरित फैसले लिए। मोदी ने कॉरपोरेट के लिए रेड कारपेट भी बिछाया, जिसको लेकर मोदी को कई तरह के विरोधों का सामना करना पड़ा। मगर मोदी ने इसकी परवाह नहीं की। डीएसई के पूर्व प्रेजिडेंट बी.बी. साहनी के अनुसार, मोदी ने इस बात को जान लिया था कि अब आर्थिक विकास के बूते ही वह राज्य और देश में अपना नाम रोशन कर सकते हैं।

एंग्री यंग लीडरः सलीम-जावेद ने जिस तरह से अमिताभ बच्चन को एंग्री यंग लीडर के तौर पर फिल्मों में पेश किया, उसी तरह से मोदी ने खुद को एंग्री यंग लीडर के तौर पर देश के राजनीतिक मंच पर पेश किया और स्थापित किया। उन्होंने बोलने की आक्रामक शैली विकसित की। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, बढ़ती महंगाई, बढ़ते अपराध के साथ राजनीतिक उदासी पर मोदी के तल्ख तेवरों को खूब पसंद किया गया। राजनीतिक विश्लेषक एस. वेंकटेश का कहना है कि मोदी इस बात को समझ चुके थे कि देश का युवा भ्रष्टाचार और महंगाई से परेशान है। अपने तल्ख अंदाज में मोदी ने युवाओं की भावनाओं को व्यक्त किया।

कौन राहुल? मोदी कौन?

भारतीय राजनीति के आज यह दो ध्रुव है। दोनों नेता महत्वकांक्षी है। दो बड़े राजनीति दलों में इनकी तूती बोलती है। एक गुजराती अस्मिता की बात करता है, आपने विकास माडल का डंका पीटता है, तो दूसरा 100 करोड़ को काबिल बनाने की बात करता है। एक महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दलितों को साथ लेकर चलने की मंशा सार्वजनिक करता है। वर्तमान राजनीति के ढांचे की खिल्ली उड़ाता है, उसमें प्रधान की कमजोरी भूमिका पर विधवा अलाप करता है। दूसरा आउटले बनाम आउटकम पर ईमानदार बहस चाहता है। कल्याणकारी योजनाओं का लोगो के जीवन पर क्या असर पड़ा है उसके मूल्यांकन की बात कहता है। राज्यों के बीच विकास दर को लेकर छिडी प्रतियोगिता को बेहतर मानता है। एक शिक्षा प्रणाली को बाजारोन्मुख बनाने की पैरवी करता है उसमें उद्योगों की पहल चाहता है दूसरा पी 2 और जी 2 की बात करता है। यानि प्रो पीपुल और गुड गर्वेनेंस। दोनों धर्मनिरपेक्षता का राग अलापते हैं। एक की नजर में धर्मनिरपेक्षता बीजेपी को सत्ता से दूर रखने का मंत्र है तो दूसरा कहता है  इसका मतलब है इंडिया फस्र्ट। दोनों योद्धाओं के पीछे जय बोलने वालों की लंबी कतार खड़ी है। एक की काबिलियत है की वह गांधी परिवार का  चिराग है दूसरा मशहूर है कि वह  एक अच्छा प्रशासक और फैसले लेने वाला व्यक्ति है। एक भारत मां के कर्ज को उतारने की बात करता है तो  दूसरा किसी एक के सहारे सबकुछ बदल जाएगा इस थ्योरी को रिजेक्ट कर रहा है। सच्चाई यह है की दोनों का रणक्षेत्र सज रहा है 2014 के लिए। दोनों का घमासान बढ़ेगा। दोनों आने वाले दिनों में कई मंचों से विचारों की तीर चलाते नजर आऐंगे। मगर यह तीर जनता की वोट को भेद पाऐंगे। यही दोनो का साध्य है।
इतिश्री राहुल मोदी पुराणों प्रथमों अध्याय संपन्नः

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

भारत में अल्पसंख्यक

2001 की जनगणना के मुताबिक
कुल अल्पसंख्यक  18.4 फीसदी
मुस्लिम    13.4 फीसदी
ईसाई     2.3 फीसदी
सिख     1.9 फीसदी
बोैद्ध      0.8 फीसदी
फारसी   .007 फीसदी

अल्पसंख्यकों की तालीम और तरक्की की बातें कोई नई नहीं हैं। सरकार देना चाहती है रहने के लिए आशियाना, पीने के पानी, तालीम के
लिए स्कूल, सेहत के लिए बेहतर इंतजाम मगर क्या नतीजे कुछ और कहानी बयंा करते हैं।
क्वाटरनी पीएमओ मानीटर करता है।
90 अल्पसंख्यक जिलों के कायाकल्प ही बात कितनी सही

                                   लक्ष्य       पूर्ति                अब तक 30.12.2011
इंदिरा आवास योजना               2,97,162       175008
हैंडपंप                           14000         1500
स्वास्थ्य उप केन्द्र प्राथमिक प्रसव
उपचार केन््रद खुलने थे             2498          खुले 1623
आंगनबाड़ी                       18970          20 खुले
स्कूल भवन                       689            334 खुले

बजट 2012-12

केन््रदीय योजनाओं का क्या है हाल
प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम
समान अवसर आयोग जोओएम इसमें फैसला नही ले पाया।

सवाल जो महत्वपूर्ण हैं।
मुसलमानों की शैक्षिक सामाजिक और आार्थक स्थिति के बारे में आप क्या कहेंगे।
अल्पसंख्यकों को ओबीसी में शामिल कर मिले आरक्षण
केरल कर्नाटक और तमिलनाडू में यह व्यवस्था 15 साल से लागू है।
तमिलनाडू का ओबीसी कोटा 50 फीसदी
केरल का 40 फीसदी
कर्नाटक 32 फीसदी
पश्चिम बंगाल का 7 फीसदी दलित ओबीसी आदिवासी को 35 फीसदी आरक्षण
     
अल्पसंख्यकों क विकास जरूरी
क्या ओबीसी कोटे में से 4.5 फीसदी आरक्षण मुसमानेां को मिलना चहिए।
अल्पसंख्यक मंत्रालय 29 जनवरी 2009 को अस्तित्व में आया।
5 धर्म के लोग आते हैं। मुस्लिम इसाई सिख बौद्ध और फारसी
राष्टीय अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 के तहत नोटीफाइट किया गया है।
मंत्रालय का काम इस वर्ग को शिक्षा रोजगार और उनके रहन सहन को अच्छा करना है।

मार्च 2008 में मल्टी सेक्टोरल डेवलेपमेंट प्रोग्राम माइनोरिटी कान्सटरेशन जिलों में शुरू किया गया। फिलहाल इसमें 90 जिले शामिल हैं।
2001 की जनगणना के अनुसार जो जिले सामाजिक आर्थिक और बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं वह राष्टीय औसत से भी नीचे हैं।

नेशनल माइनोरिटी डेवलेपमेंट एण्ड फाइनेंस कारपोरेशन
सवाल क्यों मुसलमानों को सिर्फ एक वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है।
स्टेट माइनोरीटी कमीशन क्या कर रहे है। इन्हे इस वर्ग के विकास के लिए कए विस्तृत योजना तैयार करनी चाहिए।
कई राज्येां में माइनोरीटी कमीशन का गठन नही हुआ है। जहां हुआ है वहंा लौजिस्टिक सपोर्ट नही मिला पाता। क्यों इनका रोल बहुत अहम है।
संवधिान के अनुच्छेद 25 में शामिल

अल्पसंख्यकों के लिए योजनाऐं
प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम
मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन को सहायता
नेशनल माइनोरीटी डेवलेपमेंट एण्ड फाइनेंस कारपोरेशन
फ्री कोचिंग एण्ड एलाइड स्कीम
मेरीट कम मीन्स
प्री मैटिक
पोस्ट मैटक स्कालरशिप स्कीम
मल्ट सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम 90 जिलों में लागू
अल्पसंख्यक महिलओं में नेतृव्त क्षमता विकसित करने के लिए योजना
राज्यों के वक्फ बोर्ड के रिकार्ड का कम्पयूटराइजेशन
नेशनल फैलोशिप
यह सारे कार्यक्रम अल्पसंख्यकों कि विकास के लिए चलाए जाते है।

देश में 6 राज्य ऐसे है जहां मुस्लिमों की आबादी मुस्लिमों के राष्टीय औसत से ज्यादा है।
असम    30.9 फीसदी
पश्चिम बंगाल   25.2 फीसदी
केरल   24.6 फीसदी
झारखंड 13.8 फीसदी
यूपी में 3 करोड़ 70 लाख, पश्चिम बंगाल में 2 करोड़ 20 लाख बिहार 1 करोड़ 37 लाख।

ईसाई समुदाय की राज्यों में स्थिति
नागालेण्ड में 90 फीसदी
मीजोरम में 87 फीसदी
मेगालय  70.3 फीसदी

बौद्ध समुदाय की राज्यों में स्थिति
लददाक सिक्कम पूर्वोत्तर राज्यों में इन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

पिछले पांच सालों में अल्पसंख्यकों के सामाजिक और आर्थिक तौर पर मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री 15 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत मानव
संसाधन विकास मंत्रालय, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय आवास एंव गरीबी उपशमन, महिला एवं बाल विकास, ग्रामीण विकास मंत्रालयों ने अपनी
योजनाओं में अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़ी येाजना के लिए अलग से आवंटन किया है।

संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 के पैरा चार में अनूसूचित जाति को हिन्दुओं तक सीमित रखा गया था। बाद में उसे सिखों और बौद्ध के
लिए खोल दिया गया। मुस्लिम जैन फारसी इसाई उससे अलग है। इस आदेश को खारिज करने की मांग लंबे समय से चल रही है।
1950 के प्रसिडेंशियल आदेश में संशोधन किया जाए।

मल्टी सेक्टोरल डेवलेपमेंट प्रोग्राम
25 फीसदी मुस्लिम आबादी की सीमा को घटाया जाए। अकेल 90 में से 21 जिले यूपी में हैं।
क्या मापदंड अपनाए गए
शैक्षिक दर
महिला शैक्षिक दर
वर्क पार्टीशिपेशन रेट
फीमेल वर्क पार्टीशिपेशन रेट
बुनियादी सुविधओं
कितने प्रतिशत घरों की पक्की दिवारें हैं।
कितने प्रतिशन घरों में पीने का साफ पानी है।
कितने प्रतिशत घरों में बिजली है।
कितने प्रतिशत घरों में शौचालय है।
एमएसडीपी के तहम डिस्टीक्ट प्लान एप्रूव कराना पड़ता है। तीन साल के बाद 28 जिले इसे अप्रूव नही करा पाऐं हैं। अगर कराया है तो पारश्यैली।
स्टेट लेवल मानीटरींग समिति
2 एमपी लोकसभा के
1 एमपी राज्य सभा का
2 एमएलऐ  राज्यों से
हर तीसरे महिने में मीटिंग होनी चाहिए। साल में भी नही हुई यहां तक की मिजोरम और मघ्यप्रदेश में पिछले 4 साल में एक भी नही हुई।
जहां हुई वहां एमपी साहब नही पहुंचे।

अल्पसंख्यक आयोग को कानूनी दर्जा मिले यह महज सिफारिशी संस्थान बनकर न रहे जाऐं।
फातमी समिति रिपोर्ट
देश का संविधान धर्म आधारित आरक्षण की इजाज़त नही देता।
सच्चर समिति की रिपोट सदन में पेश नही हुई क्योकिं इसे इसका गठन कमीशन आफ इंक्वारी एक्ट के तहत नही हुआ था। इन्हें देश की
सैन्य शक्ति में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की इज़ाजत नही मिली।

सच्चर समिति
समान अवसर आयोग बने
पश्चिम बंगाल     जनसंख्या 25 फीसदी          सरकारी नौकरी में हिस्सेदारी        1.2 फीसदी
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है की 33 साल में कामरेडों का राज इन हालातों को क्यों नही सुधार पाया।
केरल
गुजरात   की आबादी में हिस्सा  9.1 फीसदी       सरकारी नौकरी में 5.4 फीसदी

24 फीसदी मुसलमानों के बैंक खाते
प्रोओरिटी सेक्टर लेंडिंग
डाप आउट रेट ज्यादा
निजि उद्यम शुरू करने के लिए बैंक से कर्ज नही मिल पाता।
रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट
मुस्लिम  10 फीसदी
दूसरे अल्पसंख्यकों को 5 फीसदी आरक्षण
दलित मुस्लिम और इसाइयों को अनुसूचित जाति मानने की सलाह

1980 में डाॅ गोपल सिंह की अध्यक्षता में 1 हाई लेवल समिति बनाई गई।
इसी समिति के सिफारिशों के आधार पर प्रधानमंत्री 15 सूत्रीय कार्यक्रमों की शुरूआत की गई।

केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं के वित्तिय और फीजिकल अचिवमेंट कोई गुलाबी तस्वीर पेश नही करती।
इफैक्टिव इंस्टीटयूसेंनिल्जम मैकेरिज्म
स्टाफ की कमी।
योजनओं को लेकर जागरूकता
पंचायतों का कोई निश्चित रोल नही है।
धर्मातरित दलितों के मुस्लिम आरक्षण का दर्जा दिया जाए।

मेरिट कम मिन्स स्कालर्शिप येाजना
बजट 140 करोड बीई स्टेज में
खर्च 115.71 करोड़
टारगेट छात्रृवृत्ति का 55000 मिले 41621।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

किसकी संसद

संसद सत्र का दूसरा दिन। रक्षा मंत्री उत्तराखंड में आई महाप्रलय और उसके बाद भारत सरकार के बचाव और पुनर्वास से जुड़े कार्यो से जुड़ा एक वकतव्य सदन में देंगे। भोजन के अधिकार विधेयक पर चर्चा की संभावना है। देखिए कितना दिलचस्प है कि 70 के दशक से हमने गरीबी हटाओं योजना का सिंहनाथ किया। आज 4 दशक बात भी हम दो तिहाई आबादी को खाद्य सुरक्षा सस्ता चावल, गेंहू और मोटा अनाज क्रमशः 3, 2 और 1 रूपये में दे रहे हैं। गरीबी का जब गांव में 27.20 पैसे और शहर में 32.30 पैसे के आधार पर आंकलन किया जा रहा है तब यह हाल है। वाधवा समिति की सिफारिश यानि की 100 रूपये प्रतिदिन को अगर मान लिया जाए तो क्या होगा? इससे भी ज्यादा जरूरी भारत सरकार बिना तैयारी के यह आर्डिनेंस लाई है। मौजूदा सावर्जनिक वितरण प्रणाली के सहारे इसे लागू करना जनता की गाड़ी कमाई को बर्बाद करना होगा। क्या सरकार के पास इन पांचसवालों का कोई जवाब है? पहला कौन गरीब और कितने गरीब? दूसरा अनाज उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जा रहा हैं? तीसरा अनाज के रखरखाव की तैयारियां क्या है? चैथा भ्रष्ट वितरण प्रणाली में क्या आमूलचूल परिवर्तन क्या कर लिया गया है? पांचवा और आखिरी अर्थव्यवस्था एक ऐसे मुहाने में खड़ी है की बीते 10 सालों में सबसे कम विकास दर 5 फीसदी के आसपास हम हासिल कर पाऐंगे? ऐसे स्थिति में 1 लाख करोड़ से सालाना ज्यादा का प्रावधान कहां से होगा? अब आप तय करिये, यह फूड सिक्यूरीटी बिल है या वोट सिक्यूरीटी बिल?

शर्म करें सांसद

संसद में सांसदों का रवैया अत्यंत शर्मनाक है। चंद सांसद अपने मुददों को लेकर पूरे संसद को हंगामें का मैदान बना देते हैं। किसी को तेलांगाना चाहिए, कोई बोडोलेंड के लिए बेताब है तो कोई गोरखालैंड का दिवाना है। क्या वाकई मुददों को लेकर सांसद गंभीर है या सिर्फ मीडिया में सूर्खिया बटोरने का यह सबसे आसान तरीका है। क्योंकि खबरों के अकाल में मीडिया के लिए यह भी बे्रकिंग न्यूज है। मगर बड़े मुददे हमेशा इस आवाज़ में दब जाते है। कई बार तो हंगामा सरकार प्रायोजित होता है। कभी संबंधित मंत्री के कहने पर सांसद प्रश्नकाल में पहुंचते नही हैं। क्योकिं मंत्रीजी जवाब के साथ तैयार नही हैं। हर साल बैठकों में संसद 100 दिन चलाने के लिए खूब चर्चा होती है। सत्र से पहले आल पार्टी मीटिंग इसी कड़ी का हिस्सा है। संसद चले या न चले माननीयों का वेतन भत्ता उनके खातों में जरूर पहुंच जाता है। फिर कहते है की सुप्रीम कोर्ट संसद की सर्वोच्चता को कमजोर कर रहा है। मेरा सवाल यह है की राजनीतिक दल सूचना के अधिकार दायरे के बाहर रहने पर एकमत हो सकते है। राजनीति में अपराधीकरण रोकने के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए तैयार हैं। इन सबसे ज्यादा अपना वेतन और भत्तें बढ़ाने के लिए इनके बीच में मधुर संबंध बन जाते हैं। मगर संसद चलाने को लेकर इनके बीच में आमराय नही बन पाती। इनके हाथ में देश की बागडौर कितनी सुरक्षित है फैसला आप कर लीजिए।

रविवार, 4 अगस्त 2013

मानसून सत्र

संसद का सत्र आज से शुरू हो रहा हैं। 5 आर्डिनेंस को संसद में चर्चा के बाद पारित होना है। जिसमें महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा कानून। साथ ही अर्थव्यवस्था की स्थिति खासकर रूपये का अवमूल्यन, उत्तराखंड में आई त्रासदी, आंतरिक सुरक्षा जैसे मुददे अहम होंगे। प्रश्नकाल चले यह भाषण हर कोई देता है मगर हंगामें की भेंट हमेशा प्रश्नकाल ही चढ़ता है। इससे सबसे ज्यादा खुश वह मंत्री होते हैं जिनको सवालों से जूझना नही पड़ता। निराश वो सांसद जिन्हें सवाल पूछने का मौका नही मिलता। इस बार राजनीतिक दल दो बातों के लेकर एकमत है। सूचना के अधिकार कानून में संशोधन करने ताकि राष्ट्रीय दल आरटीआई के दायरे से बाहर रहें और जनप्रतिनिधित्व कानून 1951में संशोधन ताकि आपराधियों के लिए संसद और विधानसभा खैरख्वाह बनी रहे। दुर्भाग्य देखिए इसका विरोध करने की हिम्मत आज किसी दल में नही। इन राजनीतिक दलों से हम अपने देश के उज्जवल भविष्य की उम्मीद लगाऐं बैठे हैं। जमीन अधिग्रहण कानून जल्द पारित हो क्योंकि हमारे देश में कानून 1894 का है। इन सबसे ज्यादा जरूरी आज नजर इस बात पर भी होगी की निलंबित ईमानदार आइएस दुर्गा शक्ति नागपाल पर सोनिया गांधी, मीरा कुमार और सुषमा स्वाराज क्या बोलतीहै। अगर स्पीकर चाहें तो इस पर अपनी टिप्पणी जरूर दे सकती है। स्पीकर की टिपप्णी बहुत मायने रखती है। यह बात दीगर है कि वह कुछ कहने का साहस जुटा पाऐंगी ? क्योंकि महिला प्रेम दर्शाने का इससे बड़ा मौका फिर नही मिलने वाला। बाकि की बात करें तो यूपी को लेकर बसपा हल्ला करेगी। सपा हंगामा करंेगी। आंध्र के सांसद अलग ड्रामा करेंगे। जसवंत सिंह भी मजबूरीवश अलग गोरखालैंड की मांग करेंगे? अंततः राजनीतिक दलों के स्वार्थ की भेंट संसद सत्रा का पहला दिन चढ़ जाएगा। आखिर में बस एक सवाल। जब संसद को चलाना नही है तो जनता के गाड़ी कमाई की यह बबादी क्यों। क्योंकि संसद चलाने की कार्यवाही में प्रतिमिनट खर्चा 2.5 लाख रूपये है।