गुरुवार, 28 जुलाई 2016

लोकसभा टीवी की 10वीं सालगिरह

आज मेरे एक मित्र अनुराग का संदेश मिला।  लोकसभा टीवी ने अपने 10 साल पूरे कर लिए हैं।  इससे पहले मैं कुछ भी लिखूं मैं दो शख्सियतों का साधुवाद करना चाहूंगा। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और  भाष्कर घोष। लोकसभा टीवी की कल्पना सोमनाथ चटर्जी ने की तो उसे धरातल में उतारा भाष्कर घोष ने । सही मायने में ये दोनों शख़्सियत ही इसके असली शिल्पकार हैं। अब बात अपने सफरनामे की।  कैसे भूल सकता हूं  28 मार्च 2006 का वो दिन जब मैंने इस संस्थान में कदम रखा। सबकुछ नया था। नए लोग, नई सोच। मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे । क्या करना होगा, कैसे करना होगा । वहां मैं नया था... अकेला था... ना मेरा कोई मित्र न कोई शुभचिंतक... मेरे साथ सिर्फ मेरा आत्मविश्वास था। मुझे मालूम था कि सामने चुनौतियों का पहाड़ है लेकिन मैं ये भी जानता था कि अवसर की गंगा यही से निकलेगी।  प्रशिक्षण के दौरान लोकसभा की कार्यवाही कैसे चलती है ये जानने का मौका मिला। 24 जुलाई 2006 को लोकसभा में 24 घंटे के प्रसारण की शुरूआत हुई। जो  सदन की कार्यवाही लोगों को बोझिल लगती थी उसमें मानो हमारा आनंद छुपा था। सुबह प्रश्नकाल, उसके बाद  शून्यकाल , ज्वलंत विषय पर बहस... समेत विधेयकों पर चर्चा से बहुत कुछ सीखने को मिलता था। कई सांसद ऐसे थे जिसे सुनने के लिए पैर मानो अपने आप ठिठक जाते थे। महंगाई में सुषमा स्वराज का भाषण भूले नही भूलता। वो जब भी बोलने के लिए उठतीं सत्ता पक्ष के चक्रव्यूह को तहस नहस कर देतीं। ऐसा लगता कि उनके तर्क ही सम्पूर्ण हैं लेकिन जैसे ही तत्कालिन  वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी जवाब देने उठते तो चर्चा की तस्वीर फिर बदल जाती। प्रणब दा अपने सधे हुए जुबानी तीर से सुषमा के हर वार को नाकाम करने की कोशिश करते। यही खूबसूरती है सदन में होने वाली चर्चा की। जो आज भी मेरे लिए जानकारी का सबसे बड़ा स्रोत है। इसका फायदा शाम को होने वाले कार्यकम लोकमंच में मिलता था। विषय की तैयारी मैं शुरू से ही करता था। मगर जानकारी कैसे और कहां से जुटाई जाती है ये सिखाया लोकसभा टीवी ने।  आज भी मैं जिन विषयों पर धाराप्रवाह होकर बोल पाता हूं उसका श्रेय भी इस संस्थान को जाता है। यहां जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वो है लोकसभा टीवी की निष्पक्षता। यहां जितने कठिन सवाल मैंने लोकसभी टीवी में किए होंगे उतने निजी चैनल में लोग नहीं पूछ सकते। ये था निष्पक्षता का मानदंड।  2008 का एक वाकया आपसे साझा करता हूं। लोकमंच का कार्यक्रम चल रहा था। पैनल में सुषमा स्वराज, बासुदेव आचार्य , मोहन सिंह जैसे लोग शिरकत कह रहे थे। दर्शकों में से सवाल आया। आप जैसे नेताओं को चौराहे पर खड़ा कर गोली मार देनी चाहिए? इस सवाल ने मुझे हिला दिया। मैं कुछ बोलता उससे पहले सुषमा स्वराज ने जवाब दिया कि क्या ये जनता से सरोकार वाले मुद्दे उठाने की सज़ा है। हम आपकी आवाज़ ही संसद मे उठाते हैं। कहने का तात्पर्य है उनकी परिपक्वता ने उस मुश्किल पल को सामान्य सा बना  दिया।  एक दूसरा वाकया भी बेहद रोचक है। 2009 में  लोकमंच कार्यक्रम  में तेल की बढ़ी कीमतों पर चर्चा चल रही थी। अचानक सीपीआईएम के सांसद ने मुझसे पूछ लिया कि एक बैरल में कितने लीटर तेल होता है। मैने पलट के जवाब दिया 160 लीटर के आसपास। कहने का तात्पर्य है लोकसभा टीवी में तैयारी का ये स्तर था। संसदीय समिति की रिपोर्ट कितने लोग पढ़ते हैं मैं नही जानता मगर हमारे लिए वो रिपोर्ट जानकारी का भंडार थी। आज जो कुछ भी हूं उसमें इस संस्थान का बहुत बड़ा योगदान है। मैं अपने सभी सहयोगियों को धन्यवाद देता हूं। मैं नाम भी लिखना चाहता था मगर किसी का नाम गलती से छूट जाता तो जाने अनजाने में बड़ी गलती हो जाती और उससे उस शख्स को पीड़ा पहुंचती। मेरे कामयाब सफर में तमाम साथियों का अहम योगदान है। लिहाजा मैंने नाम नहीं लेना ही बेहतर समझा। मैं इस संस्थान को नमन करता हूं जिसने मुझे जीवन में एक नई दिशा दिखाई। साथ ही शुभकामनाएं ये भी हैं कि ये नित नए आयाम स्थापित करता रहे। साथ ही परमात्मा की ऐसी कृपा रही कि आज जिस संस्थान न्यूज नेशन के साथ हूं  उसने पत्रकारिता के जगत में एक आदर्श मानदंड स्थापित किया है।   मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह दिन दूर नही जब यह संस्थान पत्रकारिता के मूल सिद्धान्त पर हमेशा खरा  उतरेगा।
यह सिद्घान्त है
लोकतंत्र हिर्तारथाय, विवेकालोकवर्धनी
उदबोधनाय लोकस्य , लोकसत्ता प्रतिष्ठता

गुरुवार, 2 जून 2016

गांधी नाम केवलम!

डूबते को तिनके का सहारा...तो क्या कांग्रेस के लिए वो तिनका बस राहुल हैं...अटकलों का बाज़ार गर्म है कि सोनिया गांधी जल्द ही राहुल को कांग्रेस की विरासत सौंपने वाली हैं...तो क्या यही वो सर्जरी है जिसकी मांग दिग्विजय सिंह कर रहे थे...कांग्रेस के अंदर क्या मंथन चल रहा है ये तो कांग्रेस जाने लेकिन फिलहाल राहुल को अध्यक्ष बनाने को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस संगठन में व्यापक फेरबदल करने की तैयारी में है।  क्या  राहुल की टीम में संतुलन देखने को मिलेगा? या युवा और अनुभव का संयुक्त संगम होगा? मगर असली सवाल यह नही कि कौन होगा, कौन नही। सवाल यह है कि कांग्रेस इतनी कमजोर क्यों हो गई। क्यों जनमानस का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। सबसे बड़ा सवाल है कांग्रेस के सामने चुनौतियां क्या हैं?

राहुल कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौति हैं!
हार दर हार की ज़िम्मेदारी लेकर राहुल ने दिलेरी चाहे कितनी भी दिखाई हो लेकिन रणनीति के तौर राहुल अब तक एक कमजोर सेनापति साबित हुए हैं बावजूद इसके उनको कमान क्यों। क्या कांग्रेस में गांधी परिवार से अलग कुछ भी नहीं....इसका जवाब इतिहास में छिपा है. कांग्रेस को केवल गांधी परिवार ही एकजुट रख सकती है। वरना कांग्रेस टुकड़ों में बंट जाएगी। हर नेता अपने नाम से एक कांग्रेस बना लेगा। लेकिन गांधी परिबार क्विकफिक्स का काम करता है। इसलिए पार्टी नेताओं को एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौति है।

हार का सिलसिला कब थमेगा!
कांग्रेस के हार का सिलसिला बदस्तूर जारी है। लोकसभा से शुरू हुआ यह सिलसिला असम और केरल तक आ पहुंचा है। नतीजा कभी देश भर में छाई रहने वाली पार्टी अपने अस्तित्व को बचाये रखने की कोशिश में जुटी है। एक एक कर वो अपने सारे राज्य बीजेपी के हाथों गंवाती जा रही है। कहने के लिए आज उसके पास कर्नाटक, उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्रर के 2 राज्य बजे हैं। मगर सच्चाई यह है कि कांग्रेस मुल्क के कई बड़े भूभाग से गायब हो चुकी है।

कांग्रेस को मोदी चाहिए!
राहुल की सबसे बड़ी दिक्कत है कि उनका मुकाबला मोदी से है। मोदी के सामने वो बौने लगते हैं. मोदी न सिर्फ वाकपटु है बल्कि उनकी छवि एक ईमानदार और सख्त नेता की है। वो भीड़ को अपने अंदाज़ से आकर्षित करना जानते हैं। कोई माने या ना माने मोदी आज ब्रैंड बन चुके हैं। जो कार्यकर्ताओं में जोश का संचार करना जानते हैं। जनता से सीधे जुड़ने का उनका अंदाज दूसरे नेताओं से जुदा है। इसलिए राहुल को मोदी को उन्ही की शैली में जवाब देने का अंदाज़ सीखना होगा।

कार्यकर्ता टूट चुका है!
हार बड़े बड़े को तोड़ देती है। खासकर वो सैनिक जिनका युद्ध में जय बोलने का बड़ा महत्व होता है कांग्रेस में वो हताश और निराश है।
कोई उम्मीद की किरण भी उसे दूर दूर तक नजर नही आ रही है। राज्यों की हार से वो कमजोर हुआ है। उसमें उत्साह का संचार करना जरूरी है। मगर सवाल ये कि करेगा कौन?
राहुल उस भूमिका में दूर दूर तक नजर नही आते। राज्यों के स्तर में युवा नेता और बुजुर्ग नेताओं की बनती नही। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह औऱ सिंधया। राजस्थान में सचिन पायलट। वैसे में यह कहावत मशहूर है कि कांग्रेस की पहली लड़ाई हमेशा कांग्रेस के साथ होती है।

गठबंधन वक्त की मांग है!
कांग्रेस एक दौर में गठबंधन को लेकर असमंजस में रहती थी। लेकिम शिमला सम्मेलन के बाद कांग्रेस ने रणनीति बदली और इस सच्चाई को समझा। नतीजा 2004 में सरकार बनाई।  2009 की जीत से उत्साहित कांग्रेस ने फिर एकला चलो का नारा दिया मगर कामयाबी नही मिली। और आज हालात कांग्रेस के खिलाफ है। यहां तक की गठबंधन की स्थिति में उसे छोटे दलों की दया पर निर्भर रहना पड़ रहा है। मगर जब हवा का रूख विपरीत हो तो उसके सामने अपनी ताकत का ढोल पीटना नासमझी ही कही जाएगी। इसलिए जहां जरूरी हो समझदारी से गठबंधन का रिश्ता निभाया जाए। इसका फायदा काग्रेस को बिहार और बंगाल में मिल चुका है।

आगे की डगर ज्यादा कठिन है!
2017 में देश को सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस की हालत यहां भी खराब है। लोकसभा में केवल गांधी परिवार ही अपनी सीट बचा पाया। ऐसे में यहां भी झटका लगना तय है। रही बात पंजाब की तो वहां वापसी के आसार पर आम आदमी पार्टी पानी फेर सकती है। उत्तराखंड और हिमाचल की जनता हर पांच साल में सत्ता बदल देती है। इसलिए उम्मीद यहां भी धूमिल हैं।

गुजरात से शुरू करें विजय अभियान!
कांग्रेस अगर गुजरात में वापसी कर ले तो  एक ही झटके में मोदी के ब्रांड वैल्यू की हवा निकल देगी... बीजेपी राज्य में फैले असंतोष को भली भांति जानती है इसलिए निज़ाम बदलने की तैयारी में जुट गई है। ऊपर से पटेलों में उपजा असंतोष गुजरात के चुनावों की तस्वीर बदल सकता है। बशर्तें कांग्रेंस अपने घर को दुरूस्त करे। गुजरात में विकल्प बनने की हिम्मत दिखाए। अगर यहां भी वह हालात अपने पक्ष में नही कर पाई तो कांग्रेस मुक्त भारत का बीजेपी का सपना पूरा होते देर नही लगेगी।

मंगलवार, 17 मई 2016

मेक इन इंडिया

मेक इन इंडिया केन्द्र सरकार की एक महत्वकाक्षी योजना है। सरकार इसके जरिए न सिर्फ निवेश लाना चाहती है बल्कि 10 करोड़ लोगों को रोजगार देना चाहती है। साथ ही जीडीपी में इस से्क्टर की भागीदारी मौजूदा 15 से 25 प्रतिशत करना चाहती है। बहरहाल इसके तहत 25 सेक्टरों को शामिल किया गया है।

आॅटोमोबाइल कंपोनेंट
आईटी और बीपीएम
सड़क और राजमार्ग
  • एविएशन
  • चमड़ा
  • अंतरिक्ष
  • जैव प्रौद्योगिकी
  • मीडिया और मनोरंजन
  • कपड़ा और वस्त्र
  • केमिकल
  • खनन
  • थर्मल पावर
  • निर्माण
  • तेल और गैस
  • पर्यटन और हाॅस्पिटेलिटी
  • रक्षा विनिर्माण
  • फार्मास्यूटिकल्स
  • कल्याण
  • इलेक्ट्रिकल मशीनरी
  • बंदरगाह
  • इलेक्ट्राॅनिक प्रणाली
  • रेलवे
सरकार की कोशिश है कि इन सेक्टरों में ज्यादा से ज्यादा  निवेश आये।

सब्सिडी में सुधार

मोदी सरकार ने सब्सिडी को टारगेट करना शुरू किया तो नतीजे सामने आने लगे। हालांकि उसने योजनाओं को जरूरतमंदों तक पहुचाने के लिए उसी आधार को सामने रखा जिसका की वो कभी विरोध करते थे।मोदी सरकार का जैम मंत्र यानि जनधन आधार और मोबाईल योजना  कामयाब होती दिख रही थी। योजनाओं का  फायदा जरूरतमंदों को मिलना चाहिए मगर  विचौलियों बीत में ही 

हाथ साफ कर लेते थे। नतीजा हजारों करोड़ो खर्च करने के बाद नतीजा ढाक के तीन पात। 
मसलन पीडीएस के तहत मिलने वाला 58 फीसदी राशन काले बाजार में बीक जाता था। गरीब को दिए जाने वाला कोरोसिन उस तक पहुंचने के बजाय डीजल में मिला जाता था। 

यूरिया एमओपी और डीओपी की कालाबाजारी जगजाहिर थी। मगर सरकार से सुधारों पर ध्यान देकर काफी हद तक इस स्थिति को संभाला। सरकार ने पहल योजना के तहत 14.672 करोड़ रूपये बचाये। अकेले हरियाणा में 6 लाख फर्जी राशन कार्ड निरस्त किए गए। सरकार ने देश भर में 1.62 करोड़ बोगस राशन कार्ड निरस्त किए जिससे सरकार को 10 हजार करोड़ की बचत हुई।इसी तरह सरकार ने मनरेगा में 3000 करोड़,तो पेंशन फंड में 1.5 लाख डुप्लीकेट लाभार्थियों को बाहर किया। असर प्रधानमंत्री की अपील का भी हुआ। 1 करोड़ लोगों ने एलपीजी सब्सिडी को छोड़ दिया। जवाब में सरकार ने प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के तहत 5 करोड गरीब परिवारों को 
एलपीजी कनेक्शन देने का टारगेट रखा है। इसके तहत सरकार एलपीजी कनेक्शन के साथ 1600 रूपये भी दे रही है।
यूरिया की कालाबाजारी रोकने के लिए नीम कोटिग का फार्मूला इजाद किया। आजादी के बाद गरीबी हटाओं योजना में लाख करोड़ पानी की तरह बहाये गए। समय समय परयोजनाओं के नाम तक बदल दिए गए। मगर भ्रष्टाचार के चलते यह योजना बीच में ही दम तोड़ देती थी। अब जैम के सहारे इसपर लगाम लगाने की कोशिश की गई है। यहां ये जानना भी जरूरी है कि की केन्द्र गरीब तक एक रूपया पहुंचाने के लिए 3.50 रूपये खर्च करती है।

जन धन योजना

जन धन योजना.....पीएम मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट
गरीब गुरबा को बैंकों से जोड़ने की मुहिम
मोदी सरकार दो साल पूरा करने जा रही है......जन धन योजना का क्या हाल है....हम यही पड़ताल करने की कोशिश कर रहे हैं ।

28 अगस्त 2014 को इस महत्वकांक्षी योजना की शुरूआत हुई। लक्ष्य बड़ा है और चुनौतियां तमाम। वैसे जनता को बैंकों से जोड़ने की ये पहली कोशिश नहीं है...मनमोहन  सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने भी ऐसी कोशिश की थी, लेकिन  टारगेट के करीब वो कभी नहीं पहुंच सके.... लिहाज़ा सबका साथ सबका विकास का नारा देकर आई बीजेपी के लिए इस योजना का क्रियान्वयन इतना आसान नही था।

2011 के आंकड़े के मुताबिक कुल 24.67 करोड़ परिवारों में से 14.48 करोड़ की पहुंच बैंकिग सेवाओं तक थी। गांव में 54 फीसदी तो शहरों में 67.68 फीसदी परिवारों की पहुंच 
बैंकिंग सेवाओं तक थी। ऐसे में देश के 42 फीसदी परिवारों का बैंकों से कोई नाता नहीं था। 
42 फीसदी आबादी को बैंकों से जोड़़ने की चुनौती बहुत बड़ी है.....2014 से सरकार आरबीआई और बैंक इस काम पर जुट गए
जन धन योजना के तहत 
जीरो बैलेंस पर खाता खोला गया
जमा राशि पर  ब्याज का प्रावधान दिया गया
पैसा निकालने के लिए रुपे नाम का डेबिट कार्ड जारी किया गया
न्यूनतम राशि रखने के प्रावधना को खत्म किया गया 
एकाऊंट खोलने के साथ ही 30 हजार का जीवन बीमा दिया गया 
साथ ही 1 लाख का दुर्घटना बीमा इस एकाऊंट के साथ कवर किया गया
सामाजिक योजना मसलन सब्सिडी और पेंशन योजना का फायदा सीधे जरूरतमंदों पहुंचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है

प्रधानमंत्री के इस ड्रीम प्रोजेक्ट के उद्घाटन के दिन ही 1.5 करोड़ बैंक खाते खोले गए
 
प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत अब तक 
21 करोड़ 81 लाख खाते खोले गए हैं
इन खातों में 37616.58 करोड़ जमा हैं
1-26 लाख बैंक मित्रों की तैनाती की गई है। 


आबादी की पहुंच बैंकिंग सेक्टर तक पहुचाने के लिए यह योजना की तारीफ हर कोई कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या इससे समाज में बड़ी तब्दीली आएगी...... जानकार इसे सबका साथ सबका विकास के रास्ते पर महज एक कदम मानते हैं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

किससे मुक्ति चाहिए भारत को।

प्रधानमंत्री मोदी को कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए। अब नीतिश को आरएसएस मु्क्त भारत चाहिए। देश की जनता को क्या चाहिए इसकी फिक्र किसी को नही। हमें चाहिए----
गरीबी मुक्त भारत
अशिक्षा मुक्त भारत
कुपोषण मुक्त भारत
भ्रष्टाचार मुक्त भारत
अपराध मु्क्त भारत
क्षेत्रवाद मुक्त भारत
नक्सलवाद मुक्त भारत
एक महान देश बनाने के लिए यह बुनियादी जरूरत है। मगर माननीयों को आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने से फुर्सत ही नही है। बात करते है देश की। जेब भरते है सखे संबंधियों की। गरीब मर रहा है। किसान आत्महत्या कर रहा है। बेरोजगार युवा गलत रास्ते पर जा रहा है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इतिहास गवाह कि जब भी राष्ट्र से बढ़कर नीजि हितों पर ज्यादा ध्यान दिया गया, देश का नुकसान हुआ।

ये घूस जान ले लेगी।

देश में मेडिकल कालेज की हकीकत। मेडिकल कालेज खोलने के लिए घूस दो।दाखिले देने में घूस लो। सोचिए जो डाक्टर पैसे के दम पर डिग्री लेगा वह सेवा करेगा या मरीजों को लूटेगा। मेडिकल एजुकेशन पर निगरानी के लिए देश में एमसीआई है यानि मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया, जिसके बारे में कहा जाती है कि यहां भ्रष्टाचार ही शिष्टचार है। हमारी सरकारों बीतते समय के साथ मेडिकल एजुकेशन को निजि संस्थानों के पास गिरवी रख दिया। जो एमबीएस में दाखिले के लिए 50 लाख या उससे ज्यादा औऱ पीजी में दाखिले के लिए 1 से 2 करोड़ लेते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार और एमसीआई को यह पता है। आप सोच रहे होंगे की सरकार कोे पता है तो कारवाई क्यों नही होती। जवाब सीधा और सरल है। संय्या भये कोतवाल को डर काहे का। भारत में सरकारी प्राइवेट मिलाकर कुल 422 मेडिकल काँलेज हैं। 200 सरकारी और 222 प्राइवेट। एमबीबीएस की सीटें 55000 और पीजी में 25000 सीटें हैं। मांग औऱ आपूर्ति का यह अंतर भ्रष्टाचार के बढ़वा देता है। अब नीट यानि कामन एलिजीबिलिटी और इंट्रेन्स टेस्ट के तहत परीक्षा होंगी। कुल मिलाकर सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य का जिम्मा सरकार के खुद उठाना चाहिए।