मित्रों भारतीय राजनीति के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी का आज जन्म दिन है। अपने जीवन में उन्होंने कई महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किए। सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष हर कोई उनका लोहा मानता था। भाषा बेहद सधी हुई। उनकी ज्यादातर कविताओं को मैने संजो के रखा हुआ है। दर्जन भर ऐसी है जो मुझे कंठस्त है। लोकसभा में जब वह विपक्ष के सवाल का जवाब देने के लिए खड़े होते थे माहौल एक दम शांत हो जाता। क्योंकि हर सांसद उन्हें सुनना चाहता था। वह एक अच्छे वक्ता तो थे ही अच्छे श्रोता भी थे। केन्द्र में गठबंधन की राजनीति का धर्म कैसे चलाया जाता है यह भी देश को अटल ने सिखाया। 22 दलों का गठबंधन चलाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। उनके कार्यकाल में किए गए कुछ महत्वपूर्ण कार्यो ने भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मसलन प्राथमिक शिक्षा को सुधारने के लिए सर्व शिक्षा अभियान की शुरूआत, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जिसने किसान के उत्पाद को गांव से लेकर मंडी तक ले जाने में बड़ी मदद की।स्वर्णीम चतुर्भज योजना के तहत बनाए गए नेशनल हाइवे। अमेरिका के दबाव को दरकिनार करने हुए उन्होने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। गरीबों के लिए अन्तोदय अन्न योजना की शुरूआत की। भारत की सरकारों के इतिहास में एनडीए सरकार के कार्यकाल में सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा किए गए। इतना ही नही अपने कार्यकाल में उन्होंने महंगाई को भी नियंत्रण में रखा। मुझे याद है संयुक्त राष्ट में उन्होने कहा था, हमने काल के कपाल पर वह अमिट रेखाऐं खिंची हैं जिन्हें मिटाना संभव नही है। उनके जन्म दिवस के मौकेपर उनकी प्रेरणा स्रोत अविस्मरणीय कविता हम सबको एक नई राह दिखाती है।
भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज परछाई से हारा
अंतर तम का नेह निचोड़, बुझी हुई बाती सुलगाऐं
आओं फिर से दिया जलाऐं
हम पड़ाव को समझे न मंजिल, लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वर्तमान के मोह जाल में आने वाला कल न भुलाऐं
आओं फिर से दिया जलाऐं - 2
आहुति बाकी यज्ञ अधूरा, अपनो के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियां गलाऐं
आओं फिर से दिया जलाऐं - 2
भरी दुपहरी में अंधियारा, सूरज परछाई से हारा
आओं फिर से दिया जलाऐं
हम पड़ाव को समझे न मंजिल, लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वर्तमान के मोह जाल में आने वाला कल न भुलाऐं
आओं फिर से दिया जलाऐं - 2
आहुति बाकी यज्ञ अधूरा, अपनो के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने, नव दधीचि हड्डियां गलाऐं
आओं फिर से दिया जलाऐं - 2
(प्रिय पाठको! इस रचना का उद्वेष्य किसी के हृदय को ठेस पह!ुचाने का मेरा तात्पर्य नही है,अपितु,अपनी प्राचीन स!स्कृति जो लुप्त प्रायःहो रही है ,उसके प्रति जागरूक होने के लिये हेै)
जवाब देंहटाएंस्!ास्कृति का स!हार
दुर्भाग्य है इस देष का जो अब भी सो रहा है
अपनेा को भूल बैठा दुसरो! को रो रहा है
स!स्कृति पुरानी अपनी अनजाने खो रहा है
मुर्दा गुलामियत का यह देष ढो रहा है
साहित्य स!स्कृति के विद्वान हो रहे हैं
हर वर्श नवोदय फनकार हो रहे हैं
भारतीयता को मल - मल के धो रहे हैं
प्रारम्भ जनवरी से नव वर्श हो रहे हैं
स्वतंत्रता के बाद नव वर्श आ गया है अनजान थे जो इससे उनको भी भा गया है
रोता है वतन आज अपनी ही भूल से
वि!ध गया मेरा चमन अपने ही षूल से
स!स्कार विदेषी है!,ये व्यभिचार बोलते है
तोते भी स!स्कृति के पि!जरे मे! डोलते है!
हिन्दी की गुत्थियो! को इसाई खोलते है!
हम भारतीयता को उसमे! टटोलते है!
मूक हो के जीना अब हो गया है धर्म
किस मूंह से कहे!,हिन्द अब आ रही है षर्म
जान कर भी बोला जाता नहीं है मर्म
आग लग रही है और हंस रहा है धर्म
राश्ट्र भाशा हिन्दी अब वो भी खो रही है
वतन की आत्मा भि!च-भि!च के रो रही है
अभिव्यक्त भाव भाशा हिन्दी ही बोलती है
परीधी में वृत्त की हिन्दी क्यों डोलती है
आदेष हो रहे हैं हिन्दी में काम कर
साहित्य का तो हो गया ये आखिरी सफर
मुर्दों से क्रान्ती की उम्मीद कर रहे हैं
कवि लेखकों को देखेा बे -मौत मर रहे हैं
क्या चैत्र मास का कभी नव वर्श आयेगा
क्या स!स्कृति का कोइ निश्कर्श आयेगा
क्या जन की आत्मा से संघर्श आयेगा
क्या देष प्रेम का कभी स्पर्ष आयेगा
कर में कलम को कस लो जगा दो देष को
पाष्चात्य स!स्कृति के मिटा दो भेश को
बाहर निकालो धर्म के छिपे अखिलेष को
ऋशि महर्शि पार्णिनि के खोजो अवषेश को !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
ऋशिकेष
मो09897399815
(प्रिय पाठको! इस रचना का उद्वेष्य किसी के हृदय को ठेस पह!ुचाने का मेरा तात्पर्य नही है,अपितु,अपनी प्राचीन स!स्कृति जो लुप्त प्रायःहो रही है ,उसके प्रति जागरूक होने के लिये हेै)
जवाब देंहटाएंस्!ास्कृति का स!हार
दुर्भाग्य है इस देष का जो अब भी सो रहा है
अपनेा को भूल बैठा दुसरो! को रो रहा है
स!स्कृति पुरानी अपनी अनजाने खो रहा है
मुर्दा गुलामियत का यह देष ढो रहा है
साहित्य स!स्कृति के विद्वान हो रहे हैं
हर वर्श नवोदय फनकार हो रहे हैं
भारतीयता को मल - मल के धो रहे हैं
प्रारम्भ जनवरी से नव वर्श हो रहे हैं
स्वतंत्रता के बाद नव वर्श आ गया है अनजान थे जो इससे उनको भी भा गया है
रोता है वतन आज अपनी ही भूल से
वि!ध गया मेरा चमन अपने ही षूल से
स!स्कार विदेषी है!,ये व्यभिचार बोलते है
तोते भी स!स्कृति के पि!जरे मे! डोलते है!
हिन्दी की गुत्थियो! को इसाई खोलते है!
हम भारतीयता को उसमे! टटोलते है!
मूक हो के जीना अब हो गया है धर्म
किस मूंह से कहे!,हिन्द अब आ रही है षर्म
जान कर भी बोला जाता नहीं है मर्म
आग लग रही है और हंस रहा है धर्म
राश्ट्र भाशा हिन्दी अब वो भी खो रही है
वतन की आत्मा भि!च-भि!च के रो रही है
अभिव्यक्त भाव भाशा हिन्दी ही बोलती है
परीधी में वृत्त की हिन्दी क्यों डोलती है
आदेष हो रहे हैं हिन्दी में काम कर
साहित्य का तो हो गया ये आखिरी सफर
मुर्दों से क्रान्ती की उम्मीद कर रहे हैं
कवि लेखकों को देखेा बे -मौत मर रहे हैं
क्या चैत्र मास का कभी नव वर्श आयेगा
क्या स!स्कृति का कोइ निश्कर्श आयेगा
क्या जन की आत्मा से संघर्श आयेगा
क्या देष प्रेम का कभी स्पर्ष आयेगा
कर में कलम को कस लो जगा दो देष को
पाष्चात्य स!स्कृति के मिटा दो भेश को
बाहर निकालो धर्म के छिपे अखिलेष को
ऋशि महर्शि पार्णिनि के खोजो अवषेश को !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
ऋशिकेष
मो09897399815