सोमवार, 2 जुलाई 2012

गंगा पर बांध


गंगा की धारा को अविरल बनाने की कमान और नियंत्रण देानो ही अब केन्द्र के जिम्मे हेागा। भारत सरकार ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया है। इसके लिए एक गंगा बेसिन प्राधीकरण का गठन हुआ है जिसकी अघ्यक्षता खुद प्रधानमंत्री करते हैं। जिन राज्यों से गंगा बहती है यानि उतराखण्ड, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली बिहार उसके मुख्यमंत्री इसके सदस्य होंगे। गंगा का मैदान दुनिया का सबसे बडा जैव विविधता का क्षेत्र है। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की सिंचित भूमि का 40 प्रतिषत भाग इसी के पानी पर निर्भर करता है। मतलब साफ है कि मामला आस्था के साथ साथ आजीविका से भी जुडा है।
मगर इन दिनों बहस गंगा की अविरलता और निर्मलता को लेकर चल रही है। संत समाज गंगा और उसकीसहयोगी नदी भागीरथी और अलकनंदा में बांध बनाने के खिलाफ विरोध कर रहें है जबकि राज्य सरकार इन बांधों के कामों की जल्द से जल्द शुरू करना चाहती है। इन सबके बीच उत्तराखंड की उर्जा सुरक्षा भी मुश्किलो में है। जिन तीन परियोजनाओं के काम पर सरकार ने रोक लगाई है वह हैं


लोहारीनागपाल   600 मेगावाट
पाला मनेरी      480 मेगावाट
भैरोंखाटी       381 मेगावाट

इन परियोजनाओं का ज्यादातर काम कर लिया गया है। साथ ही इन्हें उत्तराखंड की उर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है। बहरहाल सरकार ने एक अंतरमंत्रालय समूह का गठन किया है जिसकी अध्यक्षता योजना आयोग के सदस्य बीके चतुर्वेदी करेंगे।  यह समिति प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं पर विचार कर तीन महिने में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौपेगी। यानी जो निर्माणाधीन हैं
 या बनाए जा चुके है उस पर सरकार विचार नही करेगी। आज उत्तराखंड राज्य के सामने बहुत बड़ी चुनौति है। भूगौलिक स्थिति की बात की जाए तो 86 फीसदी क्षेत्र पहाड़ी है, 65 फीसदी फारेस्ट से ढका है। और पूरा राज्य 4 और सिस्मिक जोन की श्रेणी में आता है। पूरा राज्य 4 और 5 सिस्मिक जोन में है।

आइये उत्तराखंड में हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की स्थिति पर एक नजर डालते हैं।
कुल क्षमता                   27664 मेगावाट
मौजूदा उत्पादन               4000 मेगावाट
देश को रोशन करने का ख्वाब देखने राज्य की हकीकत यह है कि हर साल अपनी जरूरत पूरी करने को 700 मेगावाट बिजली का जुगाड़ करना मुश्किल पड़ रहा है। हालात यह है कि जलविद्युत में हम बाकी पहाड़ी राज्यों से खासा पिछ़ड़ रहे हैं।अगर तीन पहाड़ी राज्यों मसलन उत्तराखंड हिमाचंल और जम्मू और कश्मीर की बात की जाए तो 
उत्तराखंड में कुल क्षमता        27664.13 मेगावाट 
हिमांचल   मे कुल क्षमता       19980.62  मेगावाट
जम्मू और कश्मीर              11082.36 मेगावाट
इनमें वो प्रोजेक्ट शामिल है जो स्थापित है, निर्माणाधीन और जिनकी डीपीआर तैयारी की जा चुकी है।
आकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि हिमांचल की तुलना में उत्तराखंड की हाइडल पावर क्षमता 7683.51 मेगावाट से ज्यादा है। जहां उत्तराखंड केवल 14 फीसदी अपनी क्षमता का दोहन कर पाता है जिसे हम ग्रीन क्लीन एनर्जी कहते हैं। वहीं हिमांचल  32 फीसदी और जम्मू और कश्मीर 22 फीसदी अपनी कुल क्षमता का दोहन करने में कामयाब हुए हैं। मगर 10 साल पूरा होने के बाद भी उत्तराखंड कुल क्षमता में से 3164 मेगावाट का ही उत्पादन कर पा रहा है। बहरहाल उत्तराखंड में 70 हाइडल प्रोजेक्ट जिसकी इन्सटाल्ड कैपसीटी 9563 मेगावाट है। इसमें 17 प्रोजेक्ट कमीसन्ड है 14 अन्डर कन्सट्रक्सन  है और 39 प्रस्तावित परियोजना है।

सरकार द्धारा गठित ग्रीन पैनल मतलब वाइल्ड लाइफ इंस्टीटयूट आफ इंडिया के मुताबिक जो 39 प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं उनमें 24 परियोजनाओं बायोडाइवर्सिटी पर बुरा असर डाल सकती है। गंगा और उसकी सहायक नदी अलकनंदा और भागीरथी पर  हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट का भारी विरोध हो रहा है। उत्तराखंड में जहां 2000-01 1112 मेगावाट पावर जनरेशन होती थी वह बढ़कर क्षमता 2010-11  3168मेगावाट हो चुकी है। मगर उत्तराखंड में बढ़ती मांग और आपूर्ति के बीच की खाई पांटने के लिए सरकार के पास इन जल विद्युत परियोजनाओं के अलावा कोई और विकल्प नही है।

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