शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

कर्ज माफी से किसान के दिन बदलेंगे!

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योगी सरकार ने छोटे और मझोले किसानों का 1 लाख तक का कर्ज माफ कर दिया है। सरकार के मुताबिक 2 लाख 15 हजार किसानों को इससे राहत मिलेगी।  मगर क्या कर्ज माफी किसानों की समस्या का समाधान है। आज देश में प्रति किसान 50 हजार का कर्ज है। वहीं यूपी में ये रकम 34000, पंजाब में 90 हजार तो महाराष्ट्र में 94000 है।  सवाल यह की कर्जा माफी कब तक।  इससे पहले भी कई राज्य किसानों का कर्ज माफ कर चुके हैं। 2008 में केन्द्र सरकार ने 72 हजार करोड़ का कर्जा माफ किया था और आज देश भर से फिर कर्ज माफ करने की आवाज उठने लगी है। इससे साफ है कि कर्ज माफी समस्या का समाधान नही है। किसानों की आर्थिक हालत सुधारने के लिए कुछ ठोस उपाय करने होंगे। पहला किसानों को अच्छी  गुणवत्ता का बीज, सिंचाई के लिए पानी, उत्पादकता के लिए उर्वरक, बैंक से सस्ते ब्याज पर कर्ज और आखिर में और सबसे जरूरी उत्पाद का सही और समय से दाम। मगर दुर्भाग्य से ऐसा होता नही है। कभी बाढ़, कभी सूखा , तो बेमौसम ओले गिरने से फसलों को भारी नुकसान पहुंचता है। किसान के सपने एक पल में जमींदोज हो जाते हैं। समय से राहत ना मिलने के चलते वो निराश और हताश होकर आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। सोचिए भारत की रीढ़ की हडडी कहे जाना वाला किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। हालांकि सरकार 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने की बात कह रही है। स्वाइल हेल्थ कार्ड, किसान क्रेडिट कार्ड, प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना और फसल बीमा योजना के साथ समय पर कर्ज चुकाने पर ब्याज माफी जैसे कदमों ने राहत दी है। मगर ये रास्ता लंबा है। खेती में निवेश बढ़ाना होगा। खासकर राज्य सरकारों को इस मामले में गंभीर होना पड़ेगा। खेती राज्यों का विषय है मगर राज्य इसके प्रति ज्यादा गंभीर नही। उपर से आबादी बढ़ने के चलते  खेती योग्य भूमि कम होने लगी है। नतीजा 85 फीसदी किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। नई आबादी खेती से तौबा कर रही है। 1981 से अब तक एक करोड़ से ज्यादा किसान खेती छोड़ चुके हैं। लाखों आत्महत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद इस साल खाद्यान्न उत्पादन 270 मिलियन टन होने की उम्मीद जताई जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी के नीम कोटिंग यूरिया के फैसले ने किसानों की फायदा पहुंचाया है। मगर अभी बहुत काम करना बाकी है। 

रविवार, 26 मार्च 2017

क्या बदलेगा उत्तराखंड!

देवभूमि ने इस बार बीजेपी को  प्रचंड बहुमत दिया है । 46.5 फीसदी वोट के साथ 70 में से 57 सीटें बीजेपी की छोली में डाल दी। जब जनता इतना बड़ा जनादेश देती है तो कल्पना करिए उसकी अपेक्षाओं का ज्वार कितना बड़ा होगा। राज्य की तस्वीर और तकदीर बदलने की उसकी जिद का पूरा दरोमदार बीजेपी के ऊपर है।  दिसंबर 2000 में बना यह राज्य 16 वें साल में प्रवेश कर चुका है मगर राजनीतिक अस्थिरता , व्यक्तिगत महत्वकांक्षा और बढ़ते भ्रष्टाचार ने राज्य की विकास गति को न सिर्फ धीमा किया बल्कि विकास की यात्रा में बहुत पीछे कर दिया।  चुनाव के वक्त मुझे राज्य में भ्रमण करने का मौका मिला। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं की यह जनादेश न बीजेपी के लिए है न स्थानीय नेताओं के लिए। यह जनादेश सिर्फ और सिर्फ मोदी के नाम पर मिला है। लोग मानते हैं की मोदी इस राज्य को एक नई गति दे सकते हैं। बहरहाल नई सरकार के सामने चुनौतियां पुरानी है। मगर उसे इसका हल नई सोच के साथ निकालना होगा। 16 साल के इस राज्य के सामने 16 चुनौतियां हैं।
1----पलायन - एक रिपोर्ट के मुताबिक गांव में  2 लाख 80 हजार घर खाली हैं। 32 लाख आबादी आजिविका की तलाश में पलायन कर चुकी है। ऐसे में नेता बात तो रिवर्स पलायन की करते हैं अगर वर्तमान दर को भी थाम लें को बड़ी बात होगी।  गांव से पलायन लगातार जारी, हर साल आने वाली आपदा के बाद पलायन की दर बढ़ी, सुरक्षा की दृष्टि से अहम मुद्दा, सैकेंड डिफेंस लाइन मानी जाती है सीमावर्ती गांव की आबादी । ऐसे में इस मुददे का समाधान निकालना जरूरी है।
2----रोज़गार - बहुगुणा सरकार ने बेरोज़गारों के लिए भत्ता देने की योजना चलाई थी....लेकिन रावत सरकार ने बेरोज़गारी भत्ता देना बंद किया....हर साल 1 लाख नौकरी देने का वादा किया गया था, लेकिन रोजगार पंजीकरण कार्यालय में रजिस्ट्रेशन करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ती गई। जरूरत के मुताबिक रोजगार नही मिला।
3----उद्योग - एनडी तिवारी सरकार में जिन सिडकुल की स्थापना हुई थी, रावत सरकार सिडकुल की संख्या बढ़ाने में नाकाम रही, पहाड़ में स्वरोज़गार के माध्यम बढ़ाने का दावा भी हवाई निकला, कोल्ड स्टोरेज नहीं होने से पहाड़ों में फलों के रखरखाव की व्यवस्था नहीं, पेड़ों में फल सड़ जाते हैं।
4----आपदा - आपदा को लेकर सरकार हर मोर्चे पर नाकाम, उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही है दैवीय आपदा की घटनाएं, पीड़ितों को नहीं मिल पा रहा है मुआवजा, भारी बारिश की सूचना देने वाले डॉपलर रडार अभी तक नहीं लगाए गए, 2013 की आपदा के बाद केंद्र से मिले थे 2 डॉपलर रडार, नैनीताल और मसूरी में लगने थे, लेकिन जगह चिन्हित नहीं होने से ये रडार हिमाचल और जम्मू कश्मीर में लगाए गए।
5---विस्थापन - दैवीय आपदा और भूकंप की दृष्टि से चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी ज़िले के 350 से ज़्यादा गांव का होना है विस्थापन, एनडी तिवारी सरकार में इन गांव का हुआ था चिन्हीकरण, लेकिन अब तक एक भी गांव का नहीं हुआ पुनर्वास, बल्कि अब विस्थापित होने वाले गांव की संख्या 50 और बढ़ गई है ।
6----शराब नीति - आबकारी नीति को लेकर हर सरकार विपक्ष के निशाने पर होती है, पारदर्शी नीति नहीं बनाने का आरोप, उत्तराखंड में बिकने वाली डेनिस शराब को लेकर सीएम रावत पर गंभीर आरोप, विपक्ष डेनिस ब्रांड की शराब को सीएम के बेटे की फैक्ट्री मेड बताता है। जरूरत है शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की।
7----खनन नीति - 16 साल बाद भी खनन नीति पर सरकार एक राय नहीं बना पाई है, खनन नीति को लेकर सरकार पर सवाल खड़े होते आए हैं, हर साल सरकार को अवैध खनन के चलते हज़ारों करोड़ के राजस्व का लगता है चूना, हरीश रावत ने हाल ही में नव प्रभात की अध्यक्षता में मंत्रियों की एक कमिटी बनाई है, जो खनन नहीं, बल्कि चुगान नीति बनाएगी।
8-----ऊर्जा नीति - उत्तराखंड में ऊर्जा की अपार संभावना होने के बावजूद ऊर्जा उत्पादन के मामले में उत्तराखंड बहुत पीछे है, जो बांध बनाए भी गए हैं, उन पर सवाल उठते आए हैं, पर्यावरण विद् इन बांध को लगातार आ रही आपदा के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, सरकार इस पर भी स्पष्ट नीति नहीं बना पाई है।
9---पर्यटन नीति - उत्तराखंड में ऊर्जा के बाद पर्यटन ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है, जो उत्तराखंड की आर्थिकी का मुख्य आधार है, पर्यटन व्यवसाय से सूबे के लाखों लोग परोक्ष और अपरोक्ष रुप से जुड़े हुए हैं, लेकिन सरकार अभी तक तीर्थाटन और पर्यटन में अंतर नहीं कर पाई है, जो पुराने पर्यटक केंद्र हैं, वहां रखरखाव का अभाव है, जबकि तीर्थाटन को ही सरकार पर्यटन के रुप में बढ़ावा देने में जुटी है,  मॉनसून के दौरान सड़कें बंद होने के चलते यात्रा चौपट हो जाती है ।
10---चारधाम यात्रा - रावत सरकार ने 12 महीने चारधाम यात्रा चलाने का ऐलान तो किया, लेकिन चारधाम यात्रा ही सुचारु रुप से चलाना सरकार के लिए टेढी खीर है, उत्तराखंड में तीर्थाटन की दृष्टि से कई धार्मिक स्थल है, जिनका सरकार प्रचार प्रसार तक नहीं कर पाई है, इसके अलावा हिमालय दर्शन और कुमाऊं दर्शन की योजना भी टांय-टांय फिस्स हो गई ।
11---स्वास्थ्य सुविधा - उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतरी हुई हैं, डॉक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं हैं, तो मैदान के हॉस्पिटल में भी डॉक्टरों का टोटा है, दवाइयां और दूसरी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हैं, कुमाऊं के सबसे बड़े हॉस्पिटल सुशीला तिवारी में आए दिन लापरवाही के चलते मरीज़ों की मौत हो रही है, जिसको लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब भी मांगा है।
12---ट्रांसफर नीति - उत्तराखंड में तबादला नीति हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है, खंड़ूडी सरकार में बनाई गई ट्रांसफर नीति को अब तक सबसे अच्छा बताया गया है, लेकिन कांग्रेस सरकार ने ट्रांसफर नीति को बदल दिया, ट्रांसफर नीति का सबसे बड़ा असर शिक्षा महकमे में होता है ।
12----ज़मीन नीति - उत्तराखंड बनने के बाद से भूमाफिया लगातार बढ़ते जा रहे हैं, मैदानी इलाकों में लैंड से जुड़े हुए आपराधिक मुकदमों का ग्राफ़ बढ़ता जा रहा है, बेनामी संपतियों के खुर्दबुर्द होने का सिलसिला जारी है, खंडूडी ने बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीद नीति बनाई थी, जिसके बाद भूमाफिया पर काफी हद तक लगाम लगी थी, लेकिन कांग्रेस सरकार में उस नीति को बदल दिया गया ।
13----स्मार्ट सिटी - देहरादून को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने में सरकार नाकाम रही, सरकार अभी तक ये भी तय नहीं कर पा रही है कि स्मार्ट सिटी के लिए कितने एकड़ ज़मीन की ज़रुरत पड़ेगी, पहले सरकार ने देहरादून विकासनगर के चाय बागान में स्मार्ट सिटी बनाने का फैसला लियख, और हज़ारों एकड़ भूमि में स्मार्ट सिटी बनाने का प्रपोजल रखा, लेकिन लोगों के विरोध के बाद सरकार ने उस फैसले को वापस ले लिया और बाद में स्मार्ट सिटी को 300 एकड़ भूमि पर ही बनाने की बात कही गई।
14----स्थायी राजधानी - 16 साल बाद भी कोई सरकार स्थायी राजधानी को लेकर अपना रुख साफ नहीं कर पाई है, गैरसैंण को लेकर पहाड़ के लोगों को गुमराह किया जा रहा है, जबकि देहरादून के रायपुर में केंद्र से मिले 100 करोड़ रुपये की मदद से नए विधानसभा भवन का निर्माण कराया जा रहा है।
15----परिसंपत्ति बंटवारा - 16 साल बाद भी उत्तराखंड और यूपी के बीच परिसंपत्तियों का बटवारा नहीं हो पाया है, आज भी उत्तराखंड की कई अहम संपत्तियों पर यूपी का कब्जा है, टिहरी डैम से उत्पादित होने वाली बिजली पर राज्य सरकार 25 फीसदी हिस्सेदारी चाहती है, लेकिन यूपी का स्टेग होने के चलते उत्तराखंड के हिस्से महज 12 फीसदी बिजली ही आ पाती है।
16---परिसीमन से बढ़ती परेशानी - जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन से मैदानी इलाकों में विधानसभा सीटों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे मैदान और पहाड़ में खाई लगातार बढ़ती जा रही है, पहाड़ पहले से ही विकास से कोसो दूर हैं, अब मैदान में सीटों की संख्या बढ़ने के बाद सभी सियासी दलों का रुझान मैदानी सीटों को लेकर ही होता है, यही स्थिति रही तो 2050 तक मैदान में 70 में से 50 सीटे होंगी, जबकि पहाड़ में महज 20 सीटें रह जाएंगी, ऐसे में एक और आंदोलन होने की ज़मीन तैयार हो रही है।

शनिवार, 25 मार्च 2017

योगीजी! ये राह नही आसान

वो सिरफिरी हवा थी संभलना पड़ा मुझे
आखिरी चिराग हू यारो जलना पड़ा मुझे
इस चिराग से सब रोशनी की उम्मीद पाल रहें है पर क्या योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश को उत्तम प्रदेश बना पाएंगे।  एक प्रचंड बहुमत को देखकर लोगों की उम्मीदें भी हिलोरे मार रही है। योगी भी सब कुछ बदल डालूंगा की तर्ज पर काम कर रहें है। उनका आगाज़ लोगों में भरोसा जगा रहा है।  सफाई अभियान की कसमें, पुलिसिया शैली को बदलने की जिद, एंटी रोमियों स्क्वॉड, बूचड़खानों में ताला जैसे शुरूआती कदम बदलाव की आहट के तौर पर दिख रहे है । सबको साथ लेकर सबका विकास करने की वो बात कर रहें है। मगर जो यूपी को जानते हैं, समझते हैं, वो ही बता सकतें है  कि क्रांतिकारी होने या दिखने से सूबा नही बदलने वाला। ये देश का सबसे बड़ा राज्य है। आने से पहले ही वो जनता के बीच अपने लोक संकल्प पत्र को लागू करने का भरोसा दिला चुके हैं। मगर यूपी को बदलने में योगी को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
पहला उन्हे जिन अधिकारियों से काम लेना है उनमें ज्यादातर राजनीतिक निष्ठा के लिए जाने जाते हैं । कोई एसपी का खास है तो कोई बीएसपी का। जाहिर है निष्ठा टूटने मे वक्त लगता है। साथ ही ज्यादातर बाबूओं के खर्चे अनाप शनाप है। उस आदत से बाहर आने में भी समय लगेगा।
दूसरा पुलिसिया व्यवस्था को लाइन में लाना। यह काम भी हाथी को कटार से काबू करने जैसा है। सिफारिश और पुलिस पर दबाव जैसी समस्याओं से निपटने के लिए वो पहले ही अपना दांव चल चुके है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांसदों को साफ साफ कह दिया है न सिफारिश करें न पुलिस पर अनावश्यक दबाव बनायें। यानि योगी बिना किसी दबाव के आगे बढ़ेंगे। क्योंकि जिस कानून व्यवस्था को जंगलराज का तमगा लगाकर वो सत्तासीन हुए है उसे संभालने की जिम्मेदारी अब उनके ही कंधों पर है।
तीसरा किसानों के हालात सुधारना भी उनके लिए  किसी चुनौती से कम नहीं। देश के साथ साथ यूपी का किसान बेहाल है। खासकार पूर्वांचल और बुंदेलखंड के किसान बदहाल हैं। पश्चिमी यूपी के गन्ना किसान समय से भुगतान ना मिलने से परेशान हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत बैंक का समय  से कर्ज न चुका पाने के लेकर है। आस सरकार से है कि वो किसान का कर्जा माफ कर देगी।  मगर कर्ज माफी तत्कालिक समाधान है। खेती और किसान के लिए कारगर योजना और उपज का उचित मूल्य देने की व्यवस्था करना जरूरी है।
चौथा शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर करना। बच्चों के दाखिले स्कूलों में बढ़ गए । मगर शिक्षा की गुणवत्ता आज भी एक बड़ी चुनौती है। साथ ही शिक्षकों को समय के साथ ट्रेनिंग और डिजीटल तौर तरीकों में महारत दिलाना जरूरी है। दूसरा ड्राप आउट अनुपात को भी काबू में करना है। सवास्थ्य के लिहाज से भी प्रदेश बदहाल है। खुद मुख्यमंत्री का गढ़ गोरखपुर जापानी बुखार के लेकर बदनाम है। वो सांसद को तौर पर इस मुददे पर कई बार संसद में आवाज उठा चुके हैं। अब जिम्मेदारी खुद के कंधों पर है। सब सेंटर प्राइमरी हेल्थ सेंटर, कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर और जिला अस्पतालों को दुरूस्त करना है। कहीं डाक्टर नहीं, कहीं बेड उपलब्ध नही, तो कहीं दवाइयां नही मिलती। सबसे ज्यादा जांच के लिए लोगों को सबसे ज्यादा पैसा देना पड़ता है। वैसे तो शिक्षा समवर्ती सूची में आता है इसलिए केन्द्र भी आर्थिक मदद करता है मगर सेहत सुधारने का जिम्मा योगी का ही होगा। उनके पहले बजट से ही साफ हो जाएगा कि उनकी आगे की रहा क्या होने जा रही है।
पांचवा रोजगार के अवसर पैदा करना। रोजी रोटी की तलाश के लिए सूबे का युवा पलायन करता है। बीजेपी 5 साल में 70 लाख रोजगार देने का वादा कर चुकी है। मगर रोजगार कैसे मिलेंगे। योगी को निवेशकों को साधना जरूरी है। मगर कैसे। बिजली की कमी, कानून व्यव्स्था, करों का सरलीकरण जैसे मुद्दों पर उन्हें तेजी से काम करना होगा। उनके पक्ष में जो बात जाती है वह है केन्द्र में भी उनकी सरकार होना।  यानि डबल इंजन वाली सरकार के पास बहाने का कोई रास्ता नही बचेगा। इतिहास उठा के देख लिजिए जनता जितनी तेजी से उठाती है उससे कही ज्यादा तेजी से गिरा देती है। बाकि परीक्षा 2019 में तय है।

शनिवार, 5 नवंबर 2016

समाजवाद पर हावी परिवारवाद

हाथ मिलते ही दिल भी मिल जाते तो बात ही क्या थी...लेकिन ना ऐसा होता है और ना ऐसा हुआ...समाजवादी एकता का नारा बुलंद करने के लिए शिवपाल ने मजमा तो लगा लिया...लेकिन भीड़ का शोर अखिलेश-अखिलेश करने लगा तो मुलायम भी हैरान रह गए और शिवपाल भी। मंच से अखिलेश की शान में कसीदे पढ़ना अखिलेश समर्थक जावेद आब्दी को थोड़ा महंगा पड़ा। उन्हें धक्के देकर हटाया गया। कहा जा रहा है कि आब्दी बिना इजाजत मंच पर बोलने चले आए थे...लेकिन यही तो अखिलेश बढ़ते कद का दर्द है जो रह-रह कर शिवपाल की जुबां पर आ जाता है। कभी नसीहत की शक्ल में और कभी शिकवों के तौर पर टीस इतनी ही भर नहीं है। दर्द कहीं गहरा है। ये जंग तो वर्चस्व की है, जिसे शिवपाल हर हाल में बचाए रखना चाहते हैं...लेकिन अखिलेश के युवा साथी इस वर्तमान को भविष्य बनाने पर तुले हैं इसलिए शिवपाल खफा हैं, और ये बार-बार नजर भी आता है शिवपाल अखिलेश के लिए खून भी देंगे...लेकिन मांगने पर...शिवपाल अखिलेश के लिए कुर्सी भी छोड़ देंगे लेकिन कहने पर...बस यही कहने और मांगने का वो खेल है जिसके टकराव के चलते समाजवादी कुनबा बिखर रहा है..नहीं तो नेताजी की पार्टी में उनके सामने ही शिवपाल इशारों में ही सही लेकिन अखिलेश को विरासत और किस्मत का ताना तो ना मारते। मुलायम माने या ना मानें...कहे या ना कहें लेकिन घर का घमासान थामे नहीं थम रहा...युवा जोश...अखिलेश के होश की वजह है...तो शिवपाल के लिए चुभता तीर...लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या धरतीपुत्र चाचा-भतीजे के इस पावर गेम में सीज़फायर करा पाएंगे

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

राहुल की खाट लुट गई


कोई सिर पर ले उड़ा...
कोई कांधे पर ले भागा..
और सफर शायद लंबा था इसलिए कई तो ट्रैक्टर पर लाद कर ले गए। खाट की ऐसी ठाठ थी...कि लुट कर भी अपने खास होने का उसने देश को अहसास करा दिया। प्रतीकों की राजनीति करना भारतीय नेताओं की आदत है, इसलिए कुछ दिनों पहले तक चायवाले ख़ास थे और अब खाट वाले इतरा रहे हैं..वक्त बदला है पहले चाय पर चर्चा होती थी...अब खाट का बोलबाला है..अब तक लोगों का बोझ-उठाए फिर रही खाट को ये पहली बार पता चला कि उसका रूतबा भी कम सियासी नहीं...खाट की अहमियत कांग्रेस समझ गई लेकिन ये बेचारे तो लाचार हैं वो तो अब भी यही जानते हैं...खाट वोट की नहीं उनकी ज़रूरत की चीज़ है..इसलिए जिसे खाट मिली वो उसे ले उड़ा। कैमरे की नज़रों में लुटते खाट की तस्वीरों ने ज्यादा सुर्खियां बटोरी..लेकिन यहां चर्चा तो सियासी है..खाट पर बैठकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पहले लखनऊ और फिर दिल्ली तक का सफ़र करने निकले हैं..

राहुल गांधी  के लिए सवाल कांग्रेस सिमटती ज़मीन का है...शीला दीक्षित को चेहरा बनाने का दांव कारगर होता नहीं दिख रहा...इसलिए उन्हें इस खाट से ज्यादा आस है...ये अलग बात कि सियासी विरोधियों को इस खाट में भी खोट नज़र आ रहा है। खाट खड़ी करना कहावत पुरानी है लेकिन अहमियत कम नहीं...विपक्षी राहुल गांधी का जमकर मखौल उड़ा रहे है। सपा बसपा और बीजेपी पहले ही उन्हे मिशन यूपी की दौड़ से बाहर मान रही है। मगर राहुल के रणनीतिकारों का क्या करें वो तो सोझ रहे होंगे राहुल से तो चमत्कार की उम्मीद नही क्या जाने ये खाट ही चमत्कार कर जाए?

रविवार, 28 अगस्त 2016

उत्तराखंड। 16 साल, 16 सवाल

उत्तराखंड को राज्य बने 16 साल हो गए हैं। अलग राज्या बनाने के लिए लोगों ने संघर्ष किया। कईयों ने जान की बाजी लगा दी। मगर क्या अलग राज्य बनने से हर उत्तराखंडी का सपना पूरा हुआ। क्या नए राज्य की यही कल्पना लोगों ने की थी। आज कुछ जरूरी सवाल उत्तराखंड से जुड़े मुददों पर। शिक्षा और स्वास्थ जैसे ज्वलंत सवात तो हैं ही इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण पहलू हैं।

1----पलायन - गांवों  से पलायन लगातार जारी है, हर साल आने वाली आपदा के बाद पलायन की दर बढ़ी है।, सुरक्षा की दृष्टि से भी यह अहम मुद्दा है चूंकि उत्तराखंड की सीमा नेपाल और चीन , सैकेंड डिफेंस लाइन मानी जाती है सीमावर्ती गांव की आबादी ।

2----रोज़गार - बहुगुणा सरकार ने बेरोज़गारों के लिए भत्ता देने की योजना चलाई थी....लेकिन रावत सरकार ने बेरोज़गारी भत्ता देना बंद कर किया....हर साल 1 लाख नौकरी देने का वादा किया गया था, लेकिन रोजगार पंजीकरण कार्यालय में रजिस्ट्रेशन करने वाले युवाओं की संख्या तो बढ़ गई मगर रोजगार का वादा भी हवा हवाई निकला। 

3----उद्योग - एनडी तिवारी सरकार में जिस सिडकुल की स्थापना हुई थी, रावत सरकार सिडकुल की संख्या बढ़ाने में नाकाम रही, पहाड़ में स्वरोज़गार के माध्यम बढ़ाने का दावा भी हवाई निकला, कोल्ड स्टोरेज के आभाव में पहाड़ों में फल सड़ रहे हैं। जिन फलों को अंतराष्ट्रीय बाजार की शोभी होना चाहिए था वो पेड़ों में सड़ रहे हैं।

4----आपदा - आपदा को लेकर सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही। उत्तराखंड में  दैवीय आपदाऐं बढ़ती जा रही हैं। 2013 में केदारनाथ की भयंकर त्रासदी को भला कौन भूल सकता है।
आपदा की मार से परेशान लोग आज भी मुआवजे को इंतजार में है। खबर तो यहां तक आई की इसकी आड़ में धर्मपरिवर्तन जैसे गैराकानूनी कामों को अंजाम दिया जा रहा है। भारी बारिश की सूचना देने वाले डॉपलर रडार लगाए जाने थे जो आज  तक नहीं लगाए गए।  2013 की आपदा के बाद केंद्र ने 2 डॉपलर रडार दिए थे जिने नैनीताल और मसूरी में लगाया जाना था। लेकिन जगह चिन्हित नहीं होने से ये रडार हिमाचल और जम्मू कश्मीर में लगाए गए। 

5---विस्थापन - दैवीय आपदा और भूकंप की दृष्टि से चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी ज़िले के 350 से ज़्यादा गांव का विस्थापन किया जाना है। यहां कभी भी कोई बड़ी आपदा कोई बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। एनडी तिवारी सरकार में इन गांव चिन्हीकरण हुआ था , लेकिन अब तक एक भी गांव का पुनर्वास नहीं हुआ, बल्कि अब विस्थापित होने वाले गांव की संख्या 50 और बढ़ गई है। इससे ज्यादा खतरनाक स्थिति यह है कि एक रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि उत्तराखंड में नेपाल से ज्यादा खतरनाक भूकंप आने की संभावना है। 

6----शराब नीति - आबकारी नीति को लेकर हर सरकार विपक्ष के निशाने पर होती है, पारदर्शी नीति नहीं बनाने का आरोप सरकारों पर हमेश लगते आएें है। उत्तराखंड में बिकने वाली डेनिस शराब को लेकर सीएम रावत पर गंभीर आरोप लगे हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि हर बोतल में हिस्सा फिक्स है। विपक्ष डेनिस ब्रांड की शराब को सीएम के बेटे की फैक्ट्री मेड बताता है। यहां यह बात गौर करने की है कि पहाड़ को शराब ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।

7----खनन नीति - 16 साल बाद भी खनन नीति पर सरकार एक राय नहीं बना पाई है, खनन नीति को लेकर सरकार पर सवाल खड़े होते आए हैं, हर साल सरकार को अवैध खनन के चलते हज़ारों करोड़ के राजस्व का लगता है चूना, हरीश रावत ने हाल ही में नव प्रभात की अध्यक्षता में मंत्रियों की एक कमिटी बनाई है, जो खनन नहीं, बल्कि चुगान नीति बनाएगी।

8-----ऊर्जा नीति - उत्तराखंड में ऊर्जा की अपार संभावना होने के बावजूद ऊर्जा उत्पादन के मामले में उत्तराखंड बहुत पीछे है, जो बांध बनाए भी गए हैं, उन पर सवाल उठते आए हैं, पर्यावरण विद् इन बांध को लगातार आ रही आपदा के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, सरकार इस पर भी स्पष्ट नीति नहीं बना पाई है।

9---पर्यटन नीति - उत्तराखंड में ऊर्जा के बाद पर्यटन ही एक मात्र ऐसा क्षेत्र है, जो उत्तराखंड की आर्थिकी का मुख्य आधार है, पर्यटन व्यवसाय से सूबे के लाखों लोग परोक्ष और अपरोक्ष रुप से जुड़े हुए हैं, लेकिन सरकार अभी तक तीर्थाटन और पर्यटन में अंतर नहीं कर पाई है, जो पुराने पर्यटक केंद्र हैं, वहां रखरखाव का अभाव है, जबकि तीर्थाटन को ही सरकार पर्यटन के रुप में बढ़ावा देने में जुटी है,  मॉनसून के दौरान सड़कें बंद होने के चलते यात्रा चौपट हो जाती है ।

10---चारधाम यात्रा - रावत सरकार ने 12 महीने चारधाम यात्रा चलाने का ऐलान तो किया, लेकिन चारधाम यात्रा ही सुचारु रुप से चलाना सरकार के लिए टेढी खीर है, उत्तराखंड में तीर्थाटन की दृष्टि से कई धार्मिक स्थल है, जिनका सरकार प्रचार प्रसार तक नहीं कर पाई है, इसके अलावा हिमालय दर्शन और कुमाऊं दर्शन की योजना भी टांय-टांय फिस्स हो गई ।

11---स्वास्थ्य सुविधा - उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतरी हुई हैं, डॉक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं हैं, तो मैदान के हॉस्पिटल में भी डॉक्टरों का टोटा है, दवाइयां और दूसरी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हैं, कुमाऊं के सबसे बड़े हॉस्पिटल सुशीला तिवारी में आए दिन लापरवाही के चलते मरीज़ों की मौत हो रही है, जिसको लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब भी मांगा है। 

12---ट्रांसफर नीति - उत्तराखंड में तबादला नीति हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रही है, खंड़ूडी सरकार में बनाई गई ट्रांसफर नीति को अब तक सबसे अच्छा बताया गया है, लेकिन कांग्रेस सरकार ने ट्रांसफर नीति को बदल दिया, ट्रांसफर नीति का सबसे बड़ा असर शिक्षा महकमे में होता है ।

13----ज़मीन नीति - उत्तराखंड बनने के बाद से भूमाफिया लगातार बढ़ते जा रहे हैं, मैदानी इलाकों में लैंड से जुड़े हुए आपराधिक मुकदमों का ग्राफ़ बढ़ता जा रहा है, बेनामी संपतियों के खुर्दबुर्द होने का सिलसिला जारी है, खंडूडी ने बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीद नीति बनाई थी, जिसके बाद भूमाफिया पर काफी हद तक लगाम लगी थी, लेकिन कांग्रेस सरकार में उस नीति को बदल दिया गया ।

14----स्मार्ट सिटी - देहरादून को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने में सरकार नाकाम रही, सरकार अभी तक ये भी तय नहीं कर पा रही है कि स्मार्ट सिटी के लिए कितने एकड़ ज़मीन की ज़रुरत पड़ेगी, पहले सरकार ने देहरादून विकासनगर के चाय बागान में स्मार्ट सिटी बनाने का फैसला लियख, और हज़ारों एकड़ भूमि में स्मार्ट सिटी बनाने का प्रपोजल रखा, लेकिन लोगों के विरोध के बाद सरकार ने उस फैसले को वापस ले लिया और बाद में स्मार्ट सिटी को 300 एकड़ भूमि पर ही बनाने की बात कही गई।

15----स्थायी राजधानी - 16 साल बाद भी कोई सरकार स्थायी राजधानी को लेकर अपना रुख साफ नहीं कर पाई है, गैरसैंण को लेकर पहाड़ के लोगों को गुमराह किया जा रहा है, जबकि देहरादून के रायपुर में केंद्र से मिले 100 करोड़ रुपये की मदद से नए विधानसभा भवन का निर्माण कराया जा रहा है।

16----परिसंपत्ति बंटवारा - 16 साल बाद भी उत्तराखंड और यूपी के बीच परिसंपत्तियों का बटवारा नहीं हो पाया है, आज भी उत्तराखंड की कई अहम संपत्तियों पर यूपी का कब्जा है, टिहरी डैम से उत्पादित होने वाली बिजली पर राज्य सरकार 25 फीसदी हिस्सेदारी चाहती है, लेकिन यूपी का स्टेग होने के चलते उत्तराखंड के हिस्से महज 12 फीसदी बिजली ही आ पाती है।

 सबसे बड़ सवाल है परिसीमन से बढ़ती परेशानी - जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन से मैदानी इलाकों में विधानसभा सीटों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे मैदान और पहाड़ में खाई लगातार बढ़ती जा रही है, पहाड़ पहले से ही विकास से कोसो दूर हैं, अब मैदान में सीटों की संख्या बढ़ने के बाद सभी सियासी दलों का रुझान मैदानी सीटों को लेकर ही होता है, यही स्थिति रही तो 2050 तक मैदान में 70 में से 50 सीटे होंगी, जबकि पहाड़ में महज 20 सीटें रह जाएंगी, ऐसे में एक और आंदोलन होने की ज़मीन तैयार हो रही है।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

सड़क, हादसे और संवेदनहीनता

भारत में सड़क हादसे एक गंभीर समस्या बनते जा रहे हैं।  कल दिल्ली में बेदर्द दिल्ली की जो तस्वीर सामने आई वो मानवता को शर्मसार करने वाली थी। सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को किसी ने अस्पताल नही पहुंचाया। टक्कर मारने वाले से लेकर वहां से गुजरते राहगीरों ने तक जहमत नही उठाई। एक रिक्शे वाला रूका मगर मोबाइल चुराकर चलता बना। यह सबकुछ एक सीसीटीवी में कैद हो गया। यह भी तब जब सुप्रीम कोर्ट से लेकर सरकार तक सड़क पर पड़े घायलों की मदद के लिए निर्देश दे चुकी है। एक पर के लिए किसी ने नही सोचा का घायल पड़ व्यक्ति किसी का बेटा पति या पिता होगा। आखिरकार ज्यादा खून बहने से उसकी मौत हो गई। इन तस्वीरों ने पूरे भारत को हिला दिया। हाल ही में सरकार ने मोटर वेहिकल एक्ट में संशोधन कर हिट एन रन केस में मुआवजा 25 हजार से बढ़ाकर 2 लाख कर दिया है और सड़क हादसों में जान गंवाने वालों को 10 लाख का मुआवजा देने की बात कही है। भारत में हर साल 5 लाख सड़क हादसों में 1.5 लाख लोग अपनी जान गंवा देते हैं।  भारत में हर 1 मिनट में सड़क हादसा होता है। हर 1 घंटे में 18 मौत हो जाती है।   इस लिहाज़ से दुनिया में सड़क हादसों में सबसे ज्यादा लोग भारत में मारे जाते हैं। जबकि भारत में दुनिया के सिर्फ 1 फीसदी वाहन हैं। 10 फीसदी सड़क हादसे होते है और 6 प्रतिशत मौंते हो जाती हैं। इनमें 78.7 प्रतिशत हादसे ड्राइवर की गलती से होते हैं। भारत में 2011 में 136834 मौतें जबकि 2012 में 139091 मौतें हुई। 2015 में यह आंकड़ा बढ़कर 1.5 लाख तक पहुंच गया। यानि तमाम उपायों के बावजूद भारत में सड़क में होने वाली मौतें कम होने के बजाय बढ़ रही हैं...मसलन जिस दिन सड़क हादसे की वजह से केन्द्रीय  मंत्री गोपीनाथ मुंडे की मौत हुई थी उस दिन सड़क हादसों में कुल 400 लोग मारे गए थे। बीते 10 साल में या तो 55 लाख लोग गंभीर रूप से घायल हो गए या विकलांग हो गए। हादसो पर अगर गौर करें तो सबसे ज्यादा 23.2 प्रतिशत हादसे दुपहिया वाहन से होते हैं।  19.2 प्रतिशत हादसे ट्रकों से होते हैं।  नेशनल हाइवे में  30.1 प्रतिशत हादसे होते हैं जिसमें  37.1 लोगों की मौत हो जाती है।  स्टेट हाइवे   24.6 प्रतिशत हादसे  में 27.4 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है। हादसो में 51.9  पीड़ित 25 से 65 साल के होते हैं जबकि 30.3 प्रतिशत हादसों में पीड़ित 15 से 29 साल के बीच के होते हैं। 15 प्रतिशत हादसों में पीड़ित महिलाऐं होती हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में 5 से 20 प्रतिशत हादसे की वजह शराब पीकर वाहन चलाना है। सड़क दुर्घटना  से केवल जनहानि का नुकसान नही बल्कि सालाना 3 लाख करोड़ का नुकसान या 3 प्रतिशत जीडीपी का सालाना नुकसान होता है। हमारे देश में सड़क हादसों को लेकर आमतौर पर जितनी संवेदनशीलता दिखनी चाहिए उतनी दिखती नहीं..एक अनुमान के मुताबिक सड़क हादसों में 50% लोगों की मौत सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि उन्हें वक्त पर अस्पताल नहीं पहुंचाया गया । सेव लाइफ फांउडेशन के 2013 में हुए सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ कि 74 फीसदी भारतीय  रोड एक्सीडेंट विक्टिम की मदद करने के लिये आगे नहीं आते। इनमें से 88% राहगीर पुलिस की पूछताछ और कोर्ट कचहरी के  चक्कर से बचने के  लिए घायलों को  अस्पताल नहीं ले जाते हैं...सर्वे के मुताबिक दिल्ली में एक्सीडेंट की सूरत में 96% लोग मदद करने आगे नहीं आते...जबकि मुंबई में करीब 90% लोग रोड एक्सीडेंट की मदद करने को तैयार नहीं होते...हैदराबाद में करीब 68% जबकि कोलकाता में करीब 59 फीसदी लोगों के मदद ना करने की बात सामने आई थी...बहरहाल सरकार सड़क हादसों में अगले 5 साल में 50 फीसदी की कमी लाना चाहती है। मगर देखना होगा क्या उसकी सोच जमीन पर उतर पाती है।