Friday, December 11, 2009

आदिवासी भारत

भारत की विशाल आबादी का एक हिस्सा जो बरसों से विकास की जगमगाहट का नजदीकी से अहसास करने के लिए झटपटा रहा है। सच्चाई इतनी कड़वी है कि पीने से मानों जायका बिगड़ जाये। जिम्मेदार कौन। न बाबा ना! ऐसा सवाल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मत पूछिए, वरना नेताओं को तू तू मैं मैं करने का एक और मौका मिल जायेगा। भारत में अनुसूचित जनजाति की आबादी 8.5 करोड़ के आसपास है। संविधान में इनके समााजिक, राजनीतिक और आर्थिक हितों को लेकर प्रावधान है। मगर यह हिस्सा विकास से आज भी कोसों दूर है। मानव विकास सूचकांक यानि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मामले में आज भी डइनकी हालत पतली है। इतना ही नही औघोगिकरण और खनन के नाम पर इनहें कई बार अपना घरबार छोडना पडा। हद तो तब हो गई जब कुछ बेपैंदी कारणों के चलते जंगलों से इन्हें दूर रखने की साजिश की गई। एक बुनियादी सवाल यहां उठता है कि एक व्यक्ति, परिवार और समाज को उसकी आजीविका यानि जल, जंगल और जमीन से दूर करते है तो आप उनके मन में व्यवस्था के खिलाफ खुद ज़हर भर रहे है। इसके लिए जिम्मेदार आप है। ऐसे में उसके पास रास्ता क्या। असहाय स्थिति में वह भोला भाला समाज, बंदूक उठाने को मजबूर हो जाता है। अब जरा इनके शिक्षा स्वास्थ्य और बाकी मानकों पर एक नजर डाल ली जाए। शिक्षा में हमारी साक्षरता दर जहां 64.84 प्रतिशत है वही आदिवासी समाज में यह दर 47.10 प्रतिशत है। महिलाओं के मामले में यहां हालात और ज्यादा बुरे है। आदिवासी महिलाओें की साक्षरता दर 34.76 प्रतिशत है जबकि देश में महिला साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। सर्वशिक्षा अभियान और मीड़ डे मील जैसी योजनाओं का भी यहां बहुत बड़ा असर नही पड़ा। जर्जर भवन, पानी बिजली की तंगी मास्टरों का स्कूल न आना यहां की पहचान है। स्वास्थ्य के मामले में भी हालत खराब है। जहां शिशु मृत्यु दर देश में 57 प्रति हजार है वही इन क्षेत्रों में 66.4 प्रति हजार है। कम वजन के बच्चे यहां 35.8 प्रतिशत है जबकि राश्ट्रीय औसत 18.47 प्रतिशत है। बावजूद इसके की 70 के दशक से हम एकीकृत बाल विकास योजना चला रहे है। आज राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का ज्यादा से ज्यादा फायदा इस क्षेत्र में कैसे पहुंचे इसके लिए विचार करना जरूरी है। आदिवासी समाज में 44.7 प्रतिशत लोग किसान है तथा 36.9 प्रतिशत लोग कृशक मजदूर है यानि 81 प्रतिशत से ज्यादा लोग खेती मतलब जमीन से जुडे है। इससे यह अनुमान लगाना असान है कि जल, जंगल और जमीन के प्रति इनका अगाध प्रेम क्यों है। अगर इनकी आजीविका पर ही हमला हो जायेगा तो जवाब में नक्सलवाद जैसी समस्याऐं कम नही होंगी बल्कि उनमें तेजी आयेगी। आज जरूरत है कि आदिवासी समुदाय तक कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच बनाई जाए। नरेगा जैसे कार्यक्रमों को यहां बेहतर ढंग से लागू किया जाए। वन अधिकार अधिनियम 2006 में कही हुई बातों को जल्द से जल्द जमीन पर उतारा जाए। इन इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे को कैसे मजबूत किया जा सकता है इस पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील मुददे पर सोच समझकर आगे बड़ना होगा। आज जनजातिय मंत्रालय जिसे 1999 में बनाया गया था, राश्ट्रीय आदिवासी नीति पर विचार कर रहा है। ऐसा में एक मौका है की सालों से वंचित इस समुदाय को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए इमानदार प्रयास किये जाए। जैसी समस्या कम नही बल्कि दिन पर दिन उसमें तेजी आयेगी। आज जरूरत है कि आदिवासियों तक कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच बनाई जाए। नरेगा जैसे कार्यक्रमों को यहां बेहतर ढंग से लागू किय जाए

Tuesday, December 8, 2009

इस देश में कितने गरीब है?

गरीबी हटाओं का नारा इस देश में नया नही है। बहस इस बात पर हो सकती है कि राजनीति में इस मुददे की वैलीडीटि रह गयी है या नही। इतना ही नही गरीबी हटाओं योजनाओं का तो अंबार है। मगर इतने सालों में न तो गरीबी हटी न ही गरीब कम हुए। हां एक वर्ग की कमाई में खास इजाफा हुआ। आजादी के 62 सालों बाद इस सवाल का ही जवाब नही ढूंढ पाये। कि सही मायने में इस देश में कितने गरीब है। कभी कभी तो मेरा भी माथा ठनक जाता है। । दरअसल दिन रात हमारा पाला इन्ही योजनाओं से पड़ता है। कितना पैसा मिला, कितना खर्च हुआ। क्या कमियां है। इन सब के अंकगणित में हमारा ज्यादा समय बितता है। मगर यह समझ से परे है कि इतनी योजनाओ के बाद भी आज बडी आबादी दो जून की रोटी के लिए संघशZ क्यों करती नजर आ रही है। अर्जुन सेना गुप्ता की रिपोर्ट कहती है कि 77 फीसदी आबादी की हैसियत प्रतिदिन 20 रूपये से ज्यादा खर्च करने की नही है। एन सी सक्सेना कमिटि कहती है 50 फीसदी लोग गरीबी के दायरे के नीचे आते है। एनएसएसओ का सर्वे कहता है कि 27 करोड 50 लाख लोग ही गरीब है। तेंदुलकर कमिटि का अध्यन है कि 38 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रही है। सबसे विचित्र बात यह है कि यह सारी कमेटियां सरकार की ही है। मगर सबके सुर अलग अलग है। मगर इतनी तो समझ आप हम भी रखते है कि गरीबों की तादाद 27 करोड़ से उपर है। इतना ही नही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बजट भाशण के दौरान जोर शोर से ऐलान कर दिया कि 2014 तक हमारे देश में गरीबों का संख्या मौजूदा संख्या से आधी यानी 14 करोड से भी नीचे आ जायेगी। मगर गप्रणव बाबू को क्या मालूम था कि यह कमेटिया उनकी सरकार के इनक्लूसिव ग्रोथ की हवा निकाल देंगी। अब हो यह रहा है हर कोई सरकार से एक ही सवाल पूछ रहा है कि श्रीमान यह तो बताइये कि इस देश में गरीब कितने है। यह सब भी तब हो रहा है, जब सरकार घर बनाने से लेकर पीने का पानी मुहैया कराने, बिजली पहुंचाने से लेकर सस्ता राशन उपलब्ध कराने के लिए, पैस पानी की तरह बहा रही है। योजना आयोग के मुताबिक एक रूपया गरीब तक पहुंचाने के लिए सरकार को 3 रूपये 65 पैसे खर्च करने पड़ते है। इन सब के बावजूद हालात इस तरह है क्यों है तो जवाब केन्द्र के पास रटा रटाया ही रहता है। हमारा काम है योजना बनाकर राज्यों को आार्थक सहायता उपलब्ध कराना। राज्य कामयाब नही तो हम क्या करें। दुर्भाग्य देखिए की 62 साल बात बहस इस बात पर चल रही है कि गरीब कौन है कौन नही । दरअसल गरीबी तय करने का फार्मूला योजना आयेगा ने बनाया था। जो 1993 94 को अधार पर तय किया गया थ। इसका आज के हालात से लेना देना नही है। अब कहा जा रहा है कि इस पर विचार चल रहा है की नया फार्मूला क्या हो। इधर राज्य सरकारों की बेचैनी का क्या हो। उनके मुताबिक केन्द्र सरकार हमारे गरीब को गरीब नही मान रही है। उदाहरण के तौर पर बिहार सरकार कहती है कि उनके राज्य में गरीब 1.5 करोड़ है, मगर केन्द्र सरकार महज 65 लाख का गरीब मानती है। तमिलनाडू सरकार ने तो सबको बीपीएल कार्ड जारी कर रखे है। इससे उन्हें कोई मतलब नही की केन्द्र किनको गरीब मानता है। ऐसा ही कहना ता कुछ और राज्य सरकारों का भी है। मगर इस बहस में कोई नही पड़ता चाहता कि इस देश में जो गरीब नही है उन्हे गरीबी रेखा के नीचे दिखाने के अपराध के लिए कौन जिम्मेदार है। 1.5 करोड़ फर्जी बीपीएल कार्ड निरस्त किये गए उसके लिए कौन जिम्मेदार है। दिल्ली में अकेली एक महिला के नाम पर 900 से ज्यादा राशन कार्ड जारी किये गए थे इसका जिम्मेदार कौन है। कब वो दिन आयेगा जब हमारे देश में जिम्मेदारी तय होगी। क्या इन दोशियों को कानून के तहत सजा नही मिलनी थी। इतना ही नही अभी तो हमें यह भी नही मालूम कि कितने और करोड़ की तादाद में फर्जी राशन कार्ड इस व्यवस्था में मौजूद है। उनकी तो बात करना छोडिये जो जरूरत मंद है मगर उनके पास यह साबित करने का सर्टीफिकेट नही है कि वो गरीब है। अगर अब भी आंख नही खुली यह सिलसिला निरन्तर चलते रहेगा और हम संसद से सड़क तक एक ऐसी बहस पर पडे होगे जिसमें तकोZ का तो अंबार होगा मगर बीमारी की सही इलाज नही। बीमारी भी ऐसा जिसका का कारण और निवारण दोनो से हम भली भांति परिचित है। मगर इस ओर कोई ध्यान नही दे रहा है। शायद कोई इस व्यवस्था में मौजूद कैंसर का इलाज करना नही चाहता। अखिर बदलेंगे कैसे। हमाम में सभी जो नंगे है। विदेशी बैंको में हमारा खरबों का धन रखा पडा है। मगर उसे लाने को लेकर जुबानी बहस के अलावा क्या हुआ। प्रधानमंत्री बडी मछलीयों को पकडने की बात कहते है। मगर जब उनके अपने मंत्री पर भ्रश्टाचार के आरोप लगते है तो वह उसे तथ्यहीन कह देते है। आज मधु कोडा का चर्चा हर आमो खास में है। मगर यह कोई नही सोच रहा है कि इस कोडा के पीछे कितने राजनीतिक कोडाओं का हाथ होगा, क्या इसपर से पर्दा उठ पायेगा। दरअसल इस देश में इतने कोड़ा है जिन्हे पकडने की फिक्र आज किसी को नही है। राजनेताओं में पोलिटिकल विल की कमी इसका सबसे बडा कारण है। कोई बदलना नही चाहता। वरना ऐसा नही कि यहां बदला नही जा सकता। सब कुछ संभव है, मगर राजनीतिक लोक कुछ करना चाहते ही नही। डरते है, कही किसी मोड पर आकर उनका भी पर्दाफाश न हो जाये।

Saturday, November 14, 2009

झारखंड। ए पेनफुल जर्नी

झारखंड राज्य 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। लम्बे समय के संघर्ष के बाद लोगों ने चैन की संास ली। लेकिन 9 साल की उम्र में इस राज्य का हाल ऐसा होगा किसी को नही मालूम था। नेताओं और अफसरों की मिलीभगत ने राज्य को ऐसे दोराहे पर लाकर खडा कर दिया है जहां से सिर्फ अंधेरा ही नजर आता है। राज्य की सकल घरेलू उत्पाद में जंगल और कृषि का 24 फीसदी, उघोग का 42 फीसदी और 34 फीसदी सेवा क्षेत्र का योगदान है। मगर इसकी पहुंच एक सीमित वर्ग तक है। जहां देश का 40 फीसदी खनिज मौजूद ह,ै वह गरीबी सबसे ज्यादा है। जहां 52 फीसदी जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। वहां नेताओं की संपत्ती चंद सालों में करोडो तक पहुंच चुकी है। मुख्यमंत्री से लेकर चपरासी और अफसर से लेकर ठेकदार, वहां सब मालामाल है। 59 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार है जबकि 80 के दशक से हम इसका उपचार कर रहे है। आज इसे आप एकीकृत बाल विकास योजना के रूप में जानते है। 64 फीसदी गांवों में अब भी मौसमी सडकें नही है। जबकि प्रधानमंत्री ग्राम सडक योजना को आज 9 साल पूरे होने को है। 89 फीसदी ग्रामीण घरों में बिजली की कोई व्यवस्था नही है जबकि केन्द्र सरकार का नारा है ´बिजली टू आल ´ 2012 तक। मुझे मालूम है कि इस चुनाव में नेता एक दूसरे के कपडे उतारने में कोई कोर कसर बाकी नही छोडेंगे । हर राजनीतिक दल में, हम अच्छ,े तुम गंदे का खेल होगा। मगर फैसला तो जनता को देना है। बस इतना जान लेना जरूरी है कि यह राज्य अब एक ओर मधु कोडा या उसके जैसों का भार नही सहन कर सकता। पहले ही काफी देर हो चुकी है। इस बार जनता के पास एक मौका है एक स्थिर सरकार देने का। निर्दलियो और भ्रष्ट नेताओं की भ्रष्टाचार की फिल्म का ´दि एण्ड´ करने का। इससे बडा दुर्भाग्य और क्या होगा कि अपने 9 साल की उम्र में यह राज्य 6 मख्यमंत्री देख चुका है। बाबू लाल मरांडी, शिबू सोरेन, अर्जुन मुंडा और मधु कोड़ा सब मुख्यमंत्री बने, मगर 2 साल से ज्यादा कोई नही टिक पाया। क्योंकि राजनीति के इस बाजार में डील परमानेन्ट नही हो पाई। मतलब साफ है नोट कमाने में नो रूकावट। क्या आप समझे नही। महत्वकांक्षाओं की आंधी में गुरूजी यानि शिबू सोरेन ने क्या कुछ नही किया, पूरे तीन एटम्ट। आखिरकार जनता को ही उनकी हवा निकालनी पडी। तमाड़ में ऐसा तमाचा पडा कि राश्ट्रपति शासन के अलावा और कोई चारा ही नही बचा। अच्छा ही हुआ वरना आगे और कितनी बबाZदी होती इसका एस्टीमेट लगा लिजिए। वैसे भी राजनीति में अगेन ट्राई के नैतिक सिद्धान्त की पूजा हर नेता करता है। भ्रष्टाचार का जो गंदा खेल इस राज्य ने देखा वो कोई और न देखे। मगर राजनीति का वो घिनौना खेल जनता के सामने आ गया जिसकी चर्चा अक्सर होती है। आज नेता फिर जनता के दरबार में हैं। झारखंड राज्य एक सबक है राजनीति के उस बदनाम चरीत्र का जिसको सुधारने की चर्चा होने लगे तो नेता चीख चीख कर अपना गला फाड लेंगे। मगर वो कितने पाक साफ है यह तो उनकी आत्मा ही जाने। भ्रष्टाचार इस देश के सामने सबसे बडी चुनौती है। जब तक समाज के इन दुश्मनों को सजा नही मिलेगी, तब तक भारत नही बदल सकता। फिर चाहे आप मनरेगा का रोना पीटे या इन्क्लूसिव ग्रोथ का। सवाल मधु कोडा या उसके सहयोगियों का नही है। सच्चाई तो यह है इस देश में कई मधुकोड़ा है जो अपने रसूक के चलते भारत के संविधान और उसके दण्ड विधान का बार बार बलात्कार करते है मगर उनको सजा देना तो दूर हम उन्हे अपने पलको मे बैठाये रखते है। हमें जागना होगा। इस देश के नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वो इसके खिलाफ एक जुट हो। तभी इस देश के शक्ति बोध और सौन्दर्य बोध को बचाया जा सकेगा। आज यह लेख लिखते हुए मुझे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की वह पंक्तियां याद आ रही है।
कौन कौरव, पांडव कौन, टूटा सवाल है,
क्योंकि दोनो ओर शकुनि का कूट जाल है।
धर्मराज ने छोडी नही जुए की लत,
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है।
आज बिना श्रीकृष्ण के महाभारत होना है,
कोई राजा बने, रंक को तो रोना ह,ै रंक को तो रोना है।

Thursday, November 12, 2009

मिशन यूपी

कांग्रेस के लिए मिशन यूपी मुंगेरी लाल के हसीन सपने से कम नही। पहले लोकसभा में जबरदस्त कामयाबी और फिर फिरोजाबाद का उपचुनाव 85000 से ज्यादा वोटों से जीतना इस बात की गारंटी नही कि यह कांग्रेस की वापसी की शुरूआत है। यूपी के संगठन के स्तर में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। फिरोजाबाद सीट तो मुलायम के गलत फैसले के चलते सपा ने गवांई। जनता ने उनके परिवार से पांच लोगों को तो झेल लिया मगर जब 6वें यानि उनकी बहू की बात आई तो जनता ने उन्हें दरवाजा दिखाना ही था। यह उन नेताओं के लिए भी एक सबक है जो राजनीति में परिवारवाद को जमकर बड़वा दे रहे है। कांग्रेस के राजबब्बर के मुकाबले डिंपल यादव कही नही टिकती थी। बस यही बात कांग्रेस के पक्ष में गई। फिर कैसे पूरी तरह इसे राहुल का करिश्मा कह सकते है। दरअसल मुलायम सिंह इस मुगालते में थे कि जनता उनके नाम पर वोट डालती है। इससे कोई फर्क नही पडता कि चुनाव में उम्मीदवार कौन है। बस यह निर्णय आत्मघाती हुआ। कांग्रेसी चाटुकारों को तो बस मौका चाहिए राहुल गांधी या फिर सोनिया गांधी की तारीफ करने का। मौका मिल गया सो हो गई चाटुकारिता शुरू। अच्छी बात यह है राहुल गांधी राजनीति के इस रंग को बखूबी पहचानते है।

Friday, August 14, 2009

आजादी के 63 साल





जलाओं दिये पर रहे ध्यान इतना,
अन्धेरा घना कही रह नही जाए।

गर्व हो रहा है। मै खुशी से फूला नही समा रहा हूं। आज 15 अगस्त की पावन बेला पर देशवासियों को शुभकामनाऐं देना चाहता हूं। मगर कुछ सवाल मन में बिजली की तरह कौंध रहे है। जिसका जवाब कही मिलता नजर नही आ रहा है। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश को सम्बोधित करते सुना। देशवासियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखकर अच्छा लगा। उन्होने कुछ सपने दिखाये। आने वाले पॉच सालों में जनता के वोट का हिसाब किताब जो करना है। बस एक सवाल नीति निर्माताओं से । आजादी के 63 सालों में क्यों आबादी का एक बडा हिस्सा आज भी गरीब है। भूखा है, मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, सडक और आवास से क्यों वंचित है। जवाब है उनके पास। फिर कैसा आजादी का जश्न। ये क्या उन महान देशभक्त सेनानियों का अपमान नही। क्या इसी दिन के लिए उन्होने कुबाZनी दी थी। आजाद भारत की परिकल्पना थी उनकी। जहां 30 करोड जनता आज भी गरीब है । 40 करोड लोग असंगठित क्षेत्र से आते है। 77 फीसदी आबादी की औकात एक दिन में 20 रूपये से अधिक खर्च करने की नही है। 40 फीसदी किसान विकल्प मिलने पर किसानी छोडना चाहते है। लाखों की तादाद में किसान हालात से हार मानकर आत्महत्या कर चुके है। महिलाऐं और बच्चे कुपोश्ण का शिकार है। 1 करोड 12 लाख बाल मजदूर है। बेरोजगारी चरम पर है। आधी से ज्याद आबादी खुले में शौच जाती है। आबादी के बडे हिस्से के पास पीने का साफ पानी नही है। भ्रश्टाचार ने पूरे देश को अपनी गिरफत में ले रखा है। महंगाई आम आदमी के हाथ वे निवाला झीन रहे है। आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद ने हमें डरा के रखा है।फिर भी जश्ने आजादी। झूठे आश्वासन। देश की तकदीर और तस्वीर बदलने का सब्जबाग। विकास का फायदा हर व्यक्ति तक पहुचाने की झूठा वायदा। मगर हालत खशियां मनाने वाले नही। सोचने को विवश करने वाले है। सोचिए आप भी । क्यों आप नही चाहते।
खुद जियें सबको जीना सिखाऐं
अपनी खुशियां चलों बांट आये।

Monday, July 27, 2009

बदलेगा भारत।

साफ सुथरा रहना किसकों पसन्द नही। गंदगी से निजात हर कोई पाना चाहता है। मगर भारत में स्वच्छता ज्यादातर आवाम के लिए दूर की कौड़ी है। कारण साफ है जागरूकता और सुविधाओं का आभाव। इसी के चलते 1 से पॉच साल तक के बच्चे काल के गाल में समाते जा रहे है। 10 में से पॉच बडी जान लेवा बीमारी आस पास की गंदगी की देन है। उल्टी दस्त, पीलियॉं मलेरिया डेंगू और पेट में कीड़े की बीमारी रोजाना हजारों मासूमों की आखों को हमेंशा के लिए बन्द कर देती है। अकेले डायरिया हजारें बच्चों को मौंत की नींद सुला रहा है। इनमें से एक तिहाई अभागों को तो इलाज भी नही मिल पाता। यह उस देश की कहानी है जो अपनी आर्थिक तरक्की में इतराता नही थकता। जहॉ सेंसक्स, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को विकास का िशल्पी माना जाता है। जहॉं देश की आधी आबादी को समान अधिकार देने की गाहे बगाहे आवाज़ सुनाई देती है। वही ज्यादातर महिलाऐं खुले में शौच जाने को मजबूर है। 93 फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र से आते है जिनका देश की सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 60 फीसदी से ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर साफ सफाई को ही ले लिजिए। 1986 में सरकार ने केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता अभियान के सहारे इस बदनुमा दाग को धोने की कोिशश जरूर की। मगर हमेशा की ही तरह और योजनाओं की तरह यह योजना भी अधूरे में ही दम तोडती दिखाई दी। तब जाकर 1999 में सरकार ने सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान का नारा छेडा। अभियान के तहत सरकार शौचालय बनाने के लिए सिब्सडी दे रही है। मगर अब भी आधी आबादी शौच के लिए खुले में जाने को मजबूर है। जिनके लिए शौचालय बनाये भी गए वो उसमें जान के बचाये खुले में जा रहे है। इसके जिम्मेदार भी हम ही है। ऐसे कई उदाहरण है जो आज हमारे सामने है। सपने हम 2020 तक विकसित राश्ट्र बनने का देख रहे है। आज 90 करोड जनता के पास पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कि मुताबिक अगर सिर्फ साफ पानी हम लोगो को मयस्सर करा दें तो देश की बीमारियों को हम 15 प्रतिशत नीचे लें आयेगें। आज बहस आउटले बढाये जाने को लेकर हो रही है। मगर असली मुददा आउटकम का है। जिसपर किसी का घ्यान नही जा रहा है। हमपर आज दबाव 2012 तक मिलेनियम डेवलैपमेंट गोल के तहत तय किये गए उदेश्यो को पूरा करने का भी है।। मगर हमारे मुल्क में निर्धारित लक्ष्यों की समयप्रप्ति दूर की कौडी है। भविश्य के लिए भी सिर्फ कयास लगाए जा सकते है। आज सरकार सामाजिक जिम्मेदारियों को प्राथमिकता में लेते हुए अनेक कल्याणकारी योजनाऐं चला रही है। भारत निर्माण, नरेगा, और राश्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन गांवों की तस्वीर बदल रहक है, तो शहरों को मजबूत करने के लिए जवाहर लाल नेहरू राश्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसे कार्यक्रम मौजूद है। मसला सिर्फ एक ही है जिसका हल भारत पिछले 62 सालों में भी नही ढूंढ पाया वह है भ्रश्ट्रचार। यही समस्या सभी उदेश्यों पर पानी फेर रही है। सबकों मालूम है कि केन्द्र का 1 रूपया गांवों तक पहुंचते पहुंचते 15 पैसे रह जाता है। मगर समाधान के प्रति क्यों गंभीरता नही। इस देश में भ्रश्ट्रचार से जुडे मामलों की सुनवाई के लिए अलग से कोर्ट गठित की जाये। क्यों इस देश में भ्रश्टाचारियों को सजा नही मिल रही है। क्यों नही उन्हे फांसी चढाया जाता। जब तक इस तबके पर डर पैदा नही होगा तबतक हर योजना का बंटाधार होता रहेगा और हम गरीबी अशिक्षा और बेरोजगारी जैसे मूलभूत मुददों पर घडियाली आंसू बहाते रहेंगे।

Monday, July 20, 2009

ये दिल मांगे मोर।


शिक्षा के क्षेत्र में आज व्यापक बहस चल रही है। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के 100 दिन के एजेंडे का लोग आंकलन कर रहे है। सबका अपना अपना सोचना है। मगर एक बात तो सच है कि आजादी के 62 सालों के बाद शिक्षा के क्षेत्र में हमारा देश पिछडा हुआ है। चाहे वो प्राथमिक हो माघ्यमिक हो या उच्च शिक्षा। हालात अच्छे नही है। यही कारण है कि शिक्षा के अभाव के चलते समाज में अनेक समस्याऐं पैदा हुई है। शिक्षा समवर्ती सूची में है लिहाजा केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर इस क्षेत्र के लिए काम करना होगा। मगर आज सरकार जागी है। शिक्षा के हर पडाव पर बदलाव के संकेत दिखने लगे है। बुनियादी शिक्षा को मजबूत करने के लिए 2000 में एनडीए सरकार के कार्यकाल में सर्वशिक्षा अभियान की शुरूआत हुई। आज जो नतीजे है वह निश्चित तौर पर उत्साहित करने वाले है। जहां स्कूल से बाहर रहने वालों की संख्या 3.50 करोड थी। वह आज 80 लाख के करीब है। आज इस क्षेत्र पर होन वाला खर्च भी बडा है जेा 13100 करोड है। ग्यारवीं पंचवशीZय योजना में सर्व शिक्षा अभियान को 71000 करोड दिये गए है। 10वीं पंचवशीZय योजना के मुकाबले 54000 करोड ज्यादा। उपर से मीड डे मील कार्यक्रम के तहत 15 करोड बच्चे जुडे है। अब चुनौति इस बात की है कि स्कूल से जुडे बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी करने से पहले स्कूल को न छोडे। साथ ही शिक्षा अच्छी हो जिसका की घोर अभाव दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर 5वीं कक्षा के बच्चे घडी देखना तक नही जानते । जोड घटाना नही जानते। कई स्कूलों में तो शिक्षकेा को सवाल किये गए तो वो बगले झांकने लगे। अब इस कार्यक्रम के दूसरे चरण में सरकार प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर घ्यान दे रही है। इसके बाद बारी है माघ्यमिक शिक्षा की । देश में माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच सिर्फ 100 में से 28 बच्चों की है। यानि 72 बच्चे अब भी स्कूल से बहार। मार्च 2009 से भारत सरकार राश्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान की शुरूआत कर चुकी है। इसे बजट में 1354 करोड दिये गए है। मगर इतनी धनराशि बहुत कम है। उच्च शिक्षा का हाल तो और भी बुरा है। भारत में 100 में से 12 बच्चे ही उच्च शिक्षा ले पाते है। जबकि विदेशो ंमें यह आंकडा 60 का है। ज्ञान आयोग की माने तो अगर इस आंकडे को 15 करना है तो 1500 नए विश्वविघालय बनाने होगे। ऐसा नही है कि कोई पडना नही चाहता। दिक्कत यह है कि विकल्प क्या है। संसाधन कहां है। अब जब बात इसमें व्यापक बदलाव की हो रही है तो इसमें कमियां निकालने से ज्यादा इसको अमल में लाने की होनी चाहिए। क्योंकि पहले ही 62 साल आप निकाल चुके है। युवा शक्ति भारत की ताकत है।उसकी पहचान है। उसको शिक्षित करना हमारा कर्तव्य है जिससे सरकारें मुंह नही मोड सकती। केन्द्र और राज्य सरकारों के मिलकर इस महायज्ञ में अपना योगदान देना होगा। अगर आज विदेशी विश्वविघालयों को भारत में आने दिया जाता है तो हमें घबराने की जरूरत नही है। सरकार को पहले से ही नियम कानून सक्त करनें चाहिए।। यशपाल समिति और ज्ञान आयोग की सिफारिशों पर गहनविचार होना चाहिए। सरकार आज जीडीपी का 3 से 4 फीसदी शिक्षा पर खर्च रही है जिसे बढाकर 6 से सात फीसदी करना होगा। साथ ही निजि क्षेत्र को लाना होगा क्योंकि भारी निवेश के बिना यह संभव नही। एक अनुमान के मुताबिक उच्च िश्क्षा में मौजूद खर्च का 10 गुना भी कर दिया जाए तो भी कम होगा। हमें आज शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत है। अच्छी बात यह है कि इन बदलावों का जिम्मा एक अच्छे राजनेता के कंधे पर है।