सोमवार, 5 अगस्त 2013

शर्म करें सांसद

संसद में सांसदों का रवैया अत्यंत शर्मनाक है। चंद सांसद अपने मुददों को लेकर पूरे संसद को हंगामें का मैदान बना देते हैं। किसी को तेलांगाना चाहिए, कोई बोडोलेंड के लिए बेताब है तो कोई गोरखालैंड का दिवाना है। क्या वाकई मुददों को लेकर सांसद गंभीर है या सिर्फ मीडिया में सूर्खिया बटोरने का यह सबसे आसान तरीका है। क्योंकि खबरों के अकाल में मीडिया के लिए यह भी बे्रकिंग न्यूज है। मगर बड़े मुददे हमेशा इस आवाज़ में दब जाते है। कई बार तो हंगामा सरकार प्रायोजित होता है। कभी संबंधित मंत्री के कहने पर सांसद प्रश्नकाल में पहुंचते नही हैं। क्योकिं मंत्रीजी जवाब के साथ तैयार नही हैं। हर साल बैठकों में संसद 100 दिन चलाने के लिए खूब चर्चा होती है। सत्र से पहले आल पार्टी मीटिंग इसी कड़ी का हिस्सा है। संसद चले या न चले माननीयों का वेतन भत्ता उनके खातों में जरूर पहुंच जाता है। फिर कहते है की सुप्रीम कोर्ट संसद की सर्वोच्चता को कमजोर कर रहा है। मेरा सवाल यह है की राजनीतिक दल सूचना के अधिकार दायरे के बाहर रहने पर एकमत हो सकते है। राजनीति में अपराधीकरण रोकने के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए तैयार हैं। इन सबसे ज्यादा अपना वेतन और भत्तें बढ़ाने के लिए इनके बीच में मधुर संबंध बन जाते हैं। मगर संसद चलाने को लेकर इनके बीच में आमराय नही बन पाती। इनके हाथ में देश की बागडौर कितनी सुरक्षित है फैसला आप कर लीजिए।

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