बुधवार, 20 जुलाई 2011

कलियुग की महाभारत

कौन कौरव, पांडव कौन, टूटा सवाल है।
क्योंकि दोनो ओर शकुनी का कूट जाल है।
धर्मराज ने छोड़ी नही, जुए की लत
हर पंचायत में पांचाली अपमानित है
आज बिना श्रीकृष्ण के महाभारत होना है
कोई राजा बने, रंक को तो रोना है,
रंक को तो रोना है

किसान और खेती की सुध कौन लेगा

किसान देश की आत्मा है। वह राजनीति करने का विषय नही है। क्योंकि उसकी समृद्धि देश के विकास का मूलाधार है। मूल प्रश्न यह है कि जहां 60 फीसदी आबादी खेती पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है। जो किसान 1 अरब से ज्यादा की आबादी और 50 करोड़ पशुधन के भूख का इंतजाम करते हैं, उनके प्रति राजनीति कितनी संवेदनशील है। आज वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ी हुई है। हमारा देश खाद्य सुरक्षा कानून पारित करने की ओर अग्रसर है। मगर किसान और खेत किस दौर से गुजर रहे है इस पर गंभीरता कहां है। अगर गंभीरता होती तो दो फसली जमीन का अधिग्रहण नही होता। अहम सवाल यह है कि हम भविष्य से छिपे खतरे से अनजान है या जानते हुए भी उसके प्रति सजक नही। वह भी तब जब एनएसएसओ के सर्वेक्षण के मुताबिक 41 फीसदी किसान विकल्प मिलने पर किसानी छोड़ना चाहते हैं। 1981 से 2001 के बीच 84 लाख किसान खेती छोड़ चुके हंै। आखिर यह परिस्थिति क्यों पैदा हुई। आखिर क्यों 1997 से लेकर 2007 तक 2 लाख से ज्यादा किसानों को मौत को गले लगाना पड़ा और यह सिलसिला अब भी बरकरार है। क्या इसके लिए हमारी नीति निधार्रक जिम्मेदार नही हैं। भारत में विष्व की 4 फीसदी जल उपल्ब्धता है, 2.3 फीसदी जमीन है मगर जनसंख्या के मामले में हमारी हिस्सेादारी 16 फीसदी के आसपास है। यानि हमारे पास सीमित मात्रा में संसाधान उपलब्ध हैं और इसी पर हमारी खाद्य सुरक्षा निर्भर है। आज जिस तरह सार्वजनिक उददेष्यों के नाम पर जमीन का अधिग्रहण हो रहा है वह हमारे भविष्य पर ग्रहण लगा रहा है। क्योंकि हमारे देष में करोड़ों उपाय करने का बावजूद कृषि का रकबा पिछले तीन दशकों में घटा है। 1980-81 में 185 मिलीयन हेक्टेयर खेती योग्य भूमि आज घटकर 183 हेक्टेयर मीलियन हेक्टेयर हो गई है। भूजल का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है। देश में 60 फीसदी सिंचाई और 80 फीसदी पीने के लिए हम भूजल का उपयोग करते है। पंजाब के दक्षिण पश्चिम प्रांत में जहां भूजल स्तर 80 फुट था अब वह 30 फुट तक नीचे आ गया है। इतना ही नही उवर्रकों के अंधाुधंध प्रयोग से पानी में आसेर्निक की मात्रा के बढ़ने से न सिर्फ जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित हुई है बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है। भारत सरकार प्रथम हरित क्रांति का विस्तार पूर्वी क्षेत्रों मसलन बिहार, छत्तीसगढ़, पूर्वी उत्तर प्रदेश, ओडीसा और पष्चिम बंगाल में बात कर रही है। मगर इन क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए महज 400 करोड़ के आवंटन से कुछ नही होगा। हमारे देश में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता विकसित देशों के मुकाबले में काफी कम है। मसलन भारत में गेहॅंू की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 1127 किलोग्राम है जबकि अमेरिका में 2825 और  चीन 4455 किलोग्राम है। जबकि चावल के प्रति हेक्टयर उत्पादकता भारत में 3124 किलोग्राम जबकि अमेरिका और चीन में यह 7694 और 6265 किलोग्राम है। इससे जाहिर होता है कि उत्पादकता बढ़ाने की संभावनाऐं बड़े पैमाने में हमारे यहां मौजूद हैं। उवर्रकों के इस्तेमाल में भी हम बहुत पीछे है। भारत में प्रति हेक्टेयर जमीन पर 117.07 किलोग्राम उवर्रकेां का इस्तेमाल होता है जबकि चीन में यह मात्रा 289.10, इजिप्ट में 555.10 और बंग्लादेष में 197.6 किलोग्राम है। भारत में खेती की उर्वरा शक्ति लगातार घट रही है। वैज्ञानिक इसकी वजह उवर्रकों के असंतुलित इस्तेमाल को मानते हंै। एनपीके का आदर्श अनुपात 4ः2ः1 है, मगर भारत में यह 6ः2ः1 के अनुपात में इस्तेमाल होता हैं। भारत के उवर्रकों के इस्तेमाल की तस्वीर बताने के लिए यह आंकड़ा पर्याप्त है। इसके मुताबिक भारत में 2001 से 2008 तक उत्पादन 8.37 फीसदी बढ़ा, उत्पादकता 6.92 बढ़ी, मगर उवर्रकों में मिलने वाली सब्सिडी का बिल 214 फीसदी बढ़ गया। इतना ही नही इस क्षेत्र में 2002 के बाद कोई निवेश नहीं हुआ। नाइट्रोजन के क्षेत्र में 1999 से कोई निवेश नही तो फौस्फेट के क्षेत्र में 2002 कोई नया निवेश नही हुआ है। बहरहाल ग्यारवीं योजना में कृषि विकास दर का लक्ष्य 4 फीसदी रखा गया था। जिसे अब 12 योजना में भी जारी रखने की बात कही गयी है। अर्थषाथ्स्त्रयों की अगर मानें तो 10 फीसदी विकास दर पाने का सपना तब तक पूरा नही हो सकता जब तक कृषि में 4 फीसदी की सालाना विकास दर को हासिल नही किया जाता। इसके अलावा किसान को कृषि ऋण आसान शर्तो पर मिले। मौजूदा साल में केन्द्र सरकार ने 475000 करोड़ कृषि ऋण का लक्ष्य रखा है। इसमें उन किसानों को ब्याज में 3 फीसदी सब्सिडी मिलेगी जो समय से अपने ऋण को चुकता कर देगा। यह ऋण 3 लाख तक की राशि के लिए होगा। गौर करने लायक यह है कि कृषि में लगने वाली लागत लगातार बड़ रही है। बीज, डीजल, उवर्रक के दाम बढ़ने से किसान की मुश्किलें बड़ गई है लिहाजा 3 लाख के ऋण सीमा को 5 लाख किया जाना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए की किसान को ऋण लेने में परेषानी का सामना न करना पड़े। गौरतलब है कि कृषि सुधार के लिए बनाया गया राष्टीय किसान आयोग ने भी किसानों को 4 फीसदी ब्याज पर कर्ज देने की सिफारिश की है। किसानों ने बड़े पैमाने में साहूकारों से कर्ज ले रखा है जो भारी रकम गरीब किसानों से वसूलते है। भारत सरकार ने इस पर एक समिति का गठन किया था मगर उसका क्या हुआ किसी को नही मालूम है जबकि किसान की आत्महत्या की बड़ी वजह साहूकारों से लिया गया कर्ज है। कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौति बदलती तकनीक का किसानों तक न पहुंचना है बावजूद इसके जब हर जिले में कृषि विज्ञान केन्द्र मौजूद है। इन केन्द्रों ने अपनी स्थापना के बाद इन विज्ञान केन्द्रों ने क्या नए अनुसंधान किए है, इसकी समीक्षा की जानी चाहिए। क्योंकि जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक द्धारा किये गए अनुसंधान का फायदा किसान तक पहॅंुचे। साथ ही कृषि अनुसंधान के लिए ज्यादा धन खर्च किये जाने की जरूरत है। वर्तमान में हम महज .70 फीसदी इस कार्य में खर्च कर रहे है जबकि संसद की स्थाई समिति ने इसे जीडीपी के 3 फीसदी तक करने का सुझाव दिया है। कृषि मंत्रालय के अग्रिम अनुमान के मुताबिक इस बार रिकार्ड तोड़ उत्पादन होगा मगर भंडारण की हमारे देश में क्या व्यवस्था है यह बात किसी से छिपी नही है। केन्द्र और राज्य सभी इसके लिए दोषी है। विडम्बना देखिए हमारे देश में बड़ी आबादी दो वक्त की रोटी के प्रबंध में मारी- मारी फिरती है और किसान की मेहनत से उगाया गया खाद्यान्न खुले आसामान के नीचे सड़ता है। आज भंडारण के क्षेत्र में कुछ बड़ी पहल किये जाने की जरूरत है। बहरहाल किसी भी देश में लिए उसकी खाद्यान्न सुरक्षा सर्वोच्च होती चाहिए। यह सिर्फ कागजों और बयानों में ही नही बल्कि इसकी झलक जमीन पर भी दिखनी चाहिए।

मंगलवार, 28 जून 2011

तेल का खेल

बीते सप्ताह सरकार ने डीजल के दाम 3 रूपये, रसोई गैस के पचास रूपये और किरोसीन के दाम में 2 रूपये की बढ़ोत्तरी की। इसके पीछे वजह अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ते कच्चे तेल को बताया गया है। भारत सरकार अपनी जरूरत का 84 फीसदी तेल आयात बाहर से करती है। ऐसे में ग्लोबल स्तर में किसी भी तरह के बदलाव का सीधा असर हमारे देश में पड़ता है। इसी को आधार बताकर सरकार अपने कदम को जायज ठहराया है। सरकार के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 115 रूपये प्रति डाॅलर के आसपास है। ऐसे में घरेलू दामों को बढ़ाने के अलावा उसके पास कोई चारा नही है। अच्छी बात यह है कि सरकार ने इस बार करों में कुछ कमी जरूर की है, जिसकी मांग पिछले कई महिनों से की जा रही है। मसलन कच्चे तेल में सीमा शुल्क पांच फीसदी कम कर दिया है। डीजल में सीमा शुल्क 7.5 फीसदी से घटाकर 2.5 फीसदी कर दिया गया ह,ै जबकि डीजल पर ही उत्पाद शुल्क 4.60 रूपये से घटाकर कर 2 रूपये लीटर कर दिया। सरकार के मुताबिक इससे उसे सालाना 49000 करोड़ का नुकसान होगा। तेल उत्पादों के दामों में बड़ा हिस्सा करों का होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली को ही ले लीजिए। मार्च 2010 के पहले सप्ताह में दिल्ली में बिना शुल्क लगाए पेट्रोल की कीमत 23.02 रूपये थी। इसके उपर 3.56 फीसदी सीमा शुल्क् , 31.16 फीसदी उत्पाद शुल्क और 16.6 फीसदी वैट। यानि कुल शुल्क हुआ 51.47 प्रतिषत। इससे पेट्रोल की कीमत 23.02 से बड़कर 47.43 रूपये हो जाती है। जो दिल्ली में आज 63.37 रूपये प्रति लीटर से ज्यादा है। इसी तरह बिना कर के डीजल की कीमत दिल्ली में 24.74 रूपये थी। जैसे ही इसमें सीमा शुल्क 5.07 प्रतिषत, उत्पाद शुल्क 13.36 फीसदी और वैट या ब्रिक्री कर 11.81 प्रतिषत लगता है तो डीजल के दाम 24.74 रूपये से बड़कर 35.47 रूपये तक पहंुच जाते हैं। यानि तेल उत्पादों के महंगे होन के पीछे का एक बड़ा कारण करों की मार है। सरकार किरीट पारिख समिति  के सुझाव के मुताबिक पेट्रोल के दामों को बाजार के हवाले कर चुकी है। जबकि इस समिति ने डीजल के दामों को भी बाजार के हवाले करने की सिफारिश की थी। मगर सरकार इतना बड़ा राजनीतिक जोखिम नही उठा सकती। यूपीए सरकार अपने दूसरे अवतार यानि 2009 में सत्ता में आने के बाद पेट्रोल के दाम 50 फीसदी तक बढ़ा चुकी है। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले 21 सालों में पेट्रोल के दाम 8 रूपये से बढ़कर 63 रूपये तक पहंुच गए हैं। आखिरी बढ़ोत्तरी जून में 5 रूपये प्रति लीटर की गई थी। शायद यह पहला मौका होगा जब एक साथ पांच रूपये की बढोत्तरी की गई। मगर यहां भी सरकार ने अपनी मजबूरी का रोना रोया। आज पड़ोसी देशों के मुकाबले सबसे ज्यादा महंगा पेट्रोल और डीजल भारत में बिकता है जबकि रसोई गैस और किरोसीन बाकी देशों के मुकाबले यहां काफी सस्ता है। इसलिए भारत सरकार अपने इश्तेहारों में हमेशा किरोसीन और रसोईगैस का ही जिक्र करती है। दूसरे देशों की बात की जाए तो श्रीलंका में पेट्रोल पर 37 फीसदी, थाइलैंड में 24 फीसदी, पाकिस्तान में 30 फीसदी, जबकि भारत में  51 फीसदी कर लगाया जाता है। इसी तरह डीजल में श्रीलंका में 20 फीसदी, थाईलैंड में 15 फीसदी, पाकिस्तान में 15 फीसदी, जबकि भारत में  30 फीसदी से ज्यादा कर लगाया जाता है। सरकार यह आंकड़ा अपने इश्तेहारों में कभी नही छापती। वर्तमान में हमारा तेल का प्रबन्धन जिस तरह चल रहा है उसको देखकर इस बात के पूरे आसार है की जल्द ही पेट्रोल 100 रूपये लीटर तक पहुंच जायेगा। बहरहाल केन्द्र सरकार ने राज्यों के पाले में गेंद डाल दी है। क्योंकि तेल उत्पादों से मिलने वाला करों का एक बड़ा हिस्सा राज्यों के खजाने में जाता है जो उसके अप्रत्क्ष कर का सबसे बड़ा हिस्सा है। यह आंध्र प्रदेश में 33 फीसदी और उड़ीसा में 30 फीसदी के आसपास है। बहरहाल ममता बनर्जी ने रसोई गैस में ब्रिकी कर को खत्म करके इसकी शुरूआत कर दी है। अब जरा समझने की कोशिष करते हैं तेल के खेल को। इस समय कच्चे तेल के दाम अंर्तराष्ट्रीय बाजार में 115 डाॅलर प्रति बैरल है। एक डाॅलर की कीमत 45.03 रूपये। जबकि एक बैरल का मतलब तकरीबन 160 लीटर। अब हिसाब लगाते हैं कि कितना दाम वाकई बड़ा है। इस हिसाब से कच्चे तेल का दाम प्रति लीटर 32.37 रूपये हुआ। भारत में आयात कर इसका शोधन किया जाता है। इसके बाद इसे पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और किरोसीन के तौर पर बाजार में उतारा जाता है। आज पेट्रोल की कीमत बाजार में 63.37 रूपये प्रति लीटर है। यानि बाकि का सारा पैसा विभिन्न करों के रूप में हमारी जेब से सरकार के खजाने में जाता है। हमारे देश में तेल शोधन की पर्याप्त व्यवस्था है। बल्कि कंपनियां देश की मांग के बाद इसका निर्यात भी करती हैं। डीजल, पेट्रोल, नाफता और एटीएफ इत्यादी का घरेलू मांग पूरी करने के बाद निर्यात किया जाता है। जहां घरेलू उत्पादन में ज्यादा जोर देने की जरूरत है वही उत्पादक कंपनियों अनुसंधान में एक फीसदी से ज्यादा खर्च नही करती। इधर महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल किया हुआ है। सरकार अपने बयानों में तो इसे सबसे प्राथमिकता में बताती है मगर सही मायने में उसका इशारा साफ है। जनता को इस महंगाई के साथ जीना सीख लेना चाहिए। क्योंकि सरकार के इस कदम के बाद महंगाई में आग लगेगी और इसके फिर से दहाई में पहुंचने की संभावना है। दूसरी बात जो सरकार इन सार्वजनिक उपक्रमों मसलन आइओसी, बीपीसी और एचपीसी के बारे में कहती है कि इनकी माली हालत बिगड़ती जा रही है। लेकिन सरकार के बयान और पेट्रोलियम मंत्रालय की 2008- 09 की सालाना रिपोर्ट पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो कहानी कुछ और दिखाई देती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2008-09 में आइओसी का शुद्ध लाभ 2950 करोड़ का था। साथ ही यह दुनिया की 18वीं सबसे बड़ी कंपनी है। इसी तरह 2009-10 दिसंबर तक लाभ कर देने के बाद 4663.78 रहा जबकि कुल कारोबार 208289.46 रहा। इसके अलावा लाभांश के तौर पर 2007-08 में 656 करोड़, 2008-09 में 910 करोड़ केन्द सरकार को दिया गया। इसी तरह अन्य उपक्रम मसलन एचपीसी और बीपीसी का लाभ अप्रैल से दिसंबर 2009 के बीच 544 करोड़ और 834 करोड रूपये रहा। फिर कहां से इन कंपनियों के दीवालिया होने का सवाल उठता है। सवाल असली यह है कि पिछले एक साल के ज्यादा के समय से महंगाई की मार झेल रही जनता को राहत देने के लिए सरकार के पास क्या नीति है। आखिर कब तक जनता सरकार के कुप्रबंधन की मार झेलेगी। क्योंकि महंगाई रोकने के रिजर्व बैंक के उपायों का भी असर उसी के बजट को बिगाड़ रहा है। इस बात की भी पूरी संभावना है की जुलाई में भी रिजर्व बैंक रेपो और रिवर्स रेपो दर बड़ाने जा रहा है। मतलब साफ है की आम आदमी की मुश्किलें और बड़ने वाली है।

मुश्किल में माया


कानून व्यवस्था दुरूस्त करने और विकासकार्यो में तेजी लाने के लिए मायावती ने सूबे को तीन भागों में बांट दिया है। हर जोन में 6 मंडल होंगे और इसमें तैनात अधिकारियों को कानून व्यवस्था और विकास कार्यो से जुड़ी रिपोर्ट सरकार को भेेजनी होगी। ऐसा विपक्ष के दबाव में आकर मायावती ने किया है। लगातर बिगड़ती कानून व्यवस्था और बलात्कार की बढ़ती घटनाओं से मायावती सरकार चैतरफा दबाव में दिखाई दे रही है। साथ ही विपक्षी पार्टीया सपा भाजपा और कांगे्रस इस माहौल को 2010 के चुनाव तक बनाए रखना चाहती है। बहरहाल मायावती ने कुछ सख्त संकेत जरूर दिये है। मसलन महिलाओं के खिलाफ अपराध में गिरफ्तारी 10 दिन में की जाएगी। अगर ऐसा नही होता तो आरोपी की कुर्की के आदेश दिए जाऐंगे। उत्तरप्रदेश में बीते दो सप्ताह में 14 बलात्कार के मामले सामने आए हैं। साथ ही पुलिस और डाॅक्टरों की मिलीभगत को भी गंभीरता से लेने की बात कही है। सूबे में चुनाव को अब ज्यादा समय नही बचा है। ऐसे में हर राजनीतिक दल सरकार के खिलाफ निर्णायक माहौल तैयार करना चाहता है। दरअसल 2007 में कानून व्यवस्था के चलते मुलायम सिंह को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। अकेला एक निठारी कांड उनकी सरकार पर भारी पड़ा। यही कारण था कि 2007 में यूपी की जनता ने मुलायम के खिलाफ वोट डाला था जिसका सीधा फायदा बसपा को मिला। मायावती इस बात से बेखबर नही इसलिए नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े का हवाला दिया जा रहा है। कि बाकि राज्यों के मुकाबले दिल्ली में बलात्कार की घटनाऐं कम है। मसलन असम, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के मुकाबले यूपी में यह घटनाऐं कम हुई है। राजनीति का मिजाज़ देखिए की बलात्कार जैसी घटनाओं में भी आंकड़ेबाजी के सहारे एक दूसरे को गिरेबान में झांकने की नरीहत दी जाती है। पीड़ित लड़की पर क्या बीत रही होगी इसकी चिन्ता कसी को नही। वह रे राजनीति तू जो न दिखाए वो कम है।

रविवार, 26 जून 2011

लोकपाल पर होगी संसद की अग्निपरीक्षा

संसद का मानसून सत्र 1 अगस्त से 7 सितंबर तक चलेगा। ऐसा कम ही मौकों में देखने को मिलता है कि मानसून सत्र की शुरूआत अगस्त में हो। वह भी तब जब इस मानसून सत्र का इंतजार बेसब्री से हो रहा हो। बहरहाल सरकार इस बीच में लोकपाल विधेयक पर राजनीतिक दलों की नब्ज टटोलने की कवायद पूरा कर लेना चाहती है। मगर नागरिक समाज द्धारा उठाये गए मुददों पर उसका नजरिया समझ से परे है। मसलन संयुक्त मसौदा समिति, दो महिने में 9 बैठकों के बावजूद आम सहमति नही बना पाई। इसलिए अब अन्ना हजारे और उनके साथी सरकार की नियत पर सवाल उठा रहे हैं। दरअसल वर्तमान में आए दिन हो रहे नए- नए घोटालों के खुलासे और इसमें राजनीतिज्ञों की भूमिका ने मौजूदा माहौल में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। देष की जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है। लोगों के मन में सरकार का कार्यशैली को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ सवाल क्या संसद के मानसून सत्र में लोकपाल कानून का रूप ले पायेगा। क्या राजनीतिक दल वर्तमान में आवाम में मौजूद बेचैनी को दूर करने में कामयाब रहेंगे। क्या सरकार सिविल सोसइटी की मांग के अनुरूप जन लोकपाल लाएगी। ये वह ज्वलंत प्रश्न है जिसका इंतजार भारत की आवम को है। सबसे बड़ी चुनौति इस बात की है वर्तमान में मौजूद इस निराशावादी माहौल को दूर करने की आखिरी आष देश की सर्वोच्च नीति निधार्रक संस्था के कंधों पर है। बहरहाल सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच कुछ मुददों आम राय नही बन पाई। नागरिक समाज का मसौदा कहता है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। मगर सरकार इस पर राजी नही। जबकि 2001 में विधि मंत्रालय की स्थाई समिति प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने की सिफारिष कर चुकी है। यहां तक की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और खुद डाॅ मनमोहन सिंह लोकपाल के दायरे में आने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। इसके अलावा सरकार सांसदों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीष को भी लोकपाल के दायरे में लाने के लिए तैयार नही।  लोकपाल की नियुक्ति और इसमें  कितने और कौन लोग षामिल होंगे तथा लोकपाल समिति को हटाने की ताकत किसके पास होगी। इस पर भी दोनों का नजरिया अलग अलग है। सीबीआइ और सीवीसी केा लोकपाल संस्था से जोड़ने जैसे मुददों पर सरकार और नागरिक समाज अलग अलग रास्ते पर है। नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के मुताबिक सीबीआई और सीवीसी को लेकपाल के साथ जोड़ दिया जाए। मगर सरकार ऐसा कुछ भी करने के पक्ष में नही है। अब सरकार राजनीतिक दलों के बीच आम राय बनाने की बात कह रही है। आखिर एसे जरूरी मुददों पर सरकार आमराय की बात कहकर जनता को अंधेरे में रखेगी। आखिर और कितना इंतजार इसके लिए करना होगा। वैसे पिछले चार दशकों से जनता इस विधेयक की बाट ही जोह रही है। 1966 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने केन्द्र के स्तर पर लोकपाल और राज्य के स्तर पर लोकायुक्त को नियुक्त करने की अनुशंसा की थी। चैथी लोकसभा में 1969 में इस विधेयक हो हरी झंडी मिल गई। मगर यह राज्यसभा में पारित नही हो सका। इसके बाद 1971, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998 और 2001 इसे पारित कराने के प्रयास हुए मगर सफलता नही मिल पाई। पिछले तीन विधेयकों को संसद की स्थाई समिति को सौंपा गया। इसके अलावा 2002 में संविधान के कामकाज के आंकलन के लिए बनाये गय राष्ट्रीय आयोग ने भी लोकपाल के जल्द गठन की सिफारिश  की थी। 2007 में गठित दूसरे प्रशासनिक आयोग ने भी एक मजबूत लोकपाल की वकालत की। मगर सरकार आम सहमति के नाम पर इस कानून को अब तक लटकाने में सफल रही। मगर जन्तर मन्तर में अन्ना हजारे के अनशन को मिले जनता के अपार समर्थन ने सत्ता में बैठे हुक्मरानों के नींद उड़ा दी है। इसलिए सरकार खुद भी इस मामले को लटकाने के पक्ष मे नही दिखाई देती। समग्र विकास का नारा बुलंद करने वाली मनमोहन सरकार आज चारों तरफ ओर से घोटालों से घिरी हुई है। 2जी, राष्ट्रमंडल खेल, आदर्ष सोसइटी और न जाने अभी तो आने वाले समय में और कितने घोटलों से पर्दा उठेगा। देष में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए 1988 में प्रिवेन्सन और करप्शन एक्ट बनाया गया। मगर कितने नेता, कितने अफसर और कितने उद्योगपति आज जेल में है। यह सब जानते हुए की नेता, अफसर और उद्योगपतियों की तिकड़ी खुलेआम कैसे राष्ट्रीय संसाधनों की लूट खसूट रही है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि कानून को लागू करने वाली एजेंसिया सरकार के अधीन काम करती है। यही कारण है कि सरकार इसका इस्तेमाल हाईप्रोफाइल मामलों में राजनीतिक नफा नुकसान के हिसाब से करती है। आज 2जी और राष्ट्रमंडल खेलों के मामलों में जो गिरफतारी हुई हैं वह मीडिया, जनसमुदाय के दबाव और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के चलते हुई है। वरना इनका भी कुछ होन वाला नही था। आज देष के तकरीबन 18 राज्यों में लोकायुक्त मौजूद है। मगर ज्यादातर लोकायुक्तों का हमने नाम तक नही सुना होगा। कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने जब व्यवस्था से लड़ने का जज्बा दिखाया तो नौबत उनके इस्तीफा देने तक पहंुच गई। बाकी राज्यों में भी यह महज सिफारिशी संस्थान बन कर रह गए हैं। कई राज्यों में तो सालों से विधानसभा के पटल पर इसकी रिपोर्ट तक नही रखी गई। जबकि सालाना इसकी रिपोर्ट रखने का प्रावधान है। इससे सरकारों की कार्यषौली का अंदाजा लगाया जा सकता है। आज भ्रष्टाचार भारत के विकास में सबसे बड़ी बांधा है। आने वाले समय में हमें 10 फीसदी विकास दर का सपना दिखाया जा रहा है। 2020 में हम भारत को विकसित राष्ट के तौर पर देखने का सपना संजोये है। मगर जिसे पैमाने पर भ्रष्टाचार चल रहा है उसे देखकर यह मुमकिन नही लगता। आज देष में भ्रष्टचार से लड़ने के लिए केन्द्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई है। सीबीआई राजनीतिक इस्तेमाल के लिए बदनाम है और सीवीसी महज एक सिफारिशी संस्थान बनकर रह गया है। संयुक्त सचिव के स्तर के उपर के अधिकारियों की जांच तक के लिए उसे सरकार का मुंह ताकना पड़ता है। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि यह एजेंसियां गंभीर मामलों में कितनी न्याय कर पाती होंगी। अगर इन संस्थानों को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा गया होता तो बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता था। इसीलिए आशंका सरकारी मसौदे का लोकपाल महज एक सिफारिशी संस्थान बनाकर न रख दे। आज भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सषक्त लोकपाल बनाने का ऐतिहासिक मौका संसद के पास है। अगर सियासतदान फिर भी नही समझे  तो आने वाले समय में जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि जनता के सब्र का बांध अब टूट चुका है और इसकी बानगी है जन्तर मन्तर में उमड़ा जनसैलाब है। 

बुधवार, 18 मई 2011

बाघ की कथा-व्यथा

बाघों का नरभक्षी होना कोई नई बात नहीं है। आदमी को देखकर ही रास्ता बदल लेने वाला बाघ जो उसके सामने भी नहीं पड़ना चाहता। वह आखिर आदमी का जानी दुश्मन कैसे हो गया। इस गुत्थी को सुलझाने हम पहुंचे सुंदरखाल। स्थानीय लोग बताते हैं कि पिछले महीने यहां एक आदमखोर बाघिन ने बहुत कहर ढाया था। सुंदरखाल में पिछले छह महीने में आदमखोर बाघिन चार से अधिक महिलाओं को अपना शिकार बना चुकी थी। उनमें से एक पीड़ित परिवार के घर हम पहुंचे। यह घर शांति देवी का है। वह अब इस दुनिया में नहीं है। शांति देवी भी उसी आदमखोर बाघिन की भेंट चढ़ी थी। पिछले साल नवम्बर में सुबह 11.30 बजे बाघिन उसे पास के ही जंगल से अपने खूनी पंजे में दबोच कर ले गई थी। उसके बाद वह घर नहीं लौटी। वह अपने पीछे छह छोटे-छोटे मासूम बच्चों को छोड़ गई। पति मजदूरी करता है। घर में बूढ़ी बीमार मां है। ये भी उस आदमखोर के खौफ के साए में जी रहे हैं। इनके दर्द की दास्तान पड़ोस में रहने वाले केशव इस तरह सुनाते हैंµ आदमखोर के खूनी पंजों से जिंदा बच जाने वाले एक भाग्यशाली हैं हरिदत्त पोखरीयाल। पांच साल पहले इन पर बाघ ने हमला बोला था। इनकी जान तो बच गई, मगर जख्म पांच साल बाद भी हरे हैं। पूरे डेढ़ साल के उपचार के बाद ही वे पैरों पर खड़े हो सके थे। अब यह लाठी ही इनका सहारा है। 2005 में ढिकाला में कार्यरत मदन पांडे पर भी आदमखोर ने इसी साल हमला किया था। इनका पैर और कंधा बुरी तरह से नोच डाला था। ऐसा नहीं कि आज सिर्फ आदमी ही बाघ से बचता फिर रहा है। बल्कि बाघ भी आदमी के हाथों लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। आदमी के ‘खूनी पंजों’ से बाघों को बचाने की मुहिम तीन दशक पहले प्रोजेक्ट टाइगर के नाम से शुरू हुई थी। काॅर्वेट नेशनल पार्क इस परियोजना से सबसे पहले जुड़ा था। 2010 की गणना में जिन अभ्यारण्यों में बाघों की तादाद बढ़ी है, उनमें काॅर्वेट नेशनल पार्क भी शामिल है। 2200 स्कवायर किलोमीटर में फैले इस अभ्यारण्य में 2003 में कुल 164 बाघ विचरते थे, आज इनकी तादाद बढ़कर 214 हो चुकी है। यहां मौजूद आला अधिकारियों की एक ही राय है कि चाहे बाघों का सरंक्षण हो या फिर दूसरे वन्य जीवों का संरक्षण इसमें आम सहभागिता जरूरी है। देश के बाघों के संरक्षण के लिए और उन्हें आदमखोर होने से बचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सबसे जरूरी बात है कि जंगलों को इंसानी दखल और चोर शिकारियों से बचाया जाए। आदमी जब बाघ का चित्रा बनाता है, तो बाघ को आदमी द्वारा जबड़ों से पकड़कर फाड़ते हुए बनाता है। क्या हमने कभी सोचा है कि यदि बाघों के हाथ में कलम होती और वे आदमी का चित्रा बनाते तो निश्चित ही आदमी के शरीर की बोटी-बोटी करके बनाते।हमारी बाघ की कथा-व्यथा का यह अध्याय तो खत्म हो चुका है, लेकिन हम कामना करते हैं कि हमारे देश के जंगलों की शान बाघ कभी खत्म न होने पाए।

बाघ की कथा-व्यथा

आदमी की बाघ के इलाकों में बढ़ती घुसपैठ से बाघ आदमी के प्रति आक्रामक हुआ है। चाहे घास काटने वाले घसियारे हों, चाहे लकड़ी बीनने वाले लक्कड़हारे, चाहे पशु चराने वाले मालधारी हों, चाहे शहद बीनने वाले, चाहे जड़ी-बूटी बटोरने वाले हों, चाहे वन्य जीवों के अवैध तस्कर बड़े पैमाने पर बाघ के इलाकों में आदमी की घुसपैठ हुई है। इसके अतिरिक्त पर्यटकों की आवाजाही कोई कम चिंताजनक नहीं है। एक बाघ के पीछे पर्यटकों की 50.50 गाड़ियां पड़ी रहती हैं। ऐसे में बाघ का आक्रामक होना बाजिव है। वह अब दो पैर के जानवर को अपना दुश्मन नम्बर एक मानकर चल रहा है और उस पर ताबड़तोड़ हमले कर रहा है। इस तरह से कहा जा सकता है कि बाघों के आदमखोर बनने की मुख्य वजह आदमी ही है। ढिकाला प्रवास के दौरान हमारी मुलाकात हुई याकूब से। यह पिछले तीन साल से इसी इलाके में रह रहा है। पेशे से महावत है, लेकिन समय के साथ-साथ उसके पेशे में भी बदलाव आया है। आज वह महावती नहीं करता, बल्कि यहां आने वाले पर्यटकों की जरूरतों का ध्यान रखता है। वह इस इलाके से जुड़ी हर खट्टी-मीठी यादों का गवाह है। याकूब उस सनसनीखेज घटना का भी गवाह है, जब वह किसी तरह आदमखोर बाघ से जान बचाकर भागने में कामयाब रहा था। लेकिन याकूब का साथी इतना भाग्यशाली नहीं था। उसका साथी आदमखोर बाघ ने हमेशा के लिए उससे छिन लिया। दूसरे कुछ महावत जो पिछले 25 सालों से यहां पर काम कर रहे हैं। वे भी आदमखोर बाघों के दर्जनों सनसनीखेज किस्से सुनाते हैं।