गुरुवार, 17 जून 2010

भोपाल गैस त्रासदी से सबक



दुनिया की सबसे बडी अद्यौगिक त्रासदी का इंसाफ ऐसा हुआ की शर्म से सर नीचे झुक गया। देश के नज़रों में आ गया कि नेताओं के लिए जनता की जान की कीमत क्या है। अब तय है कि मन्त्रीयों का समूह घावों पर मुआवजे का नमक लगायेगा। मन्त्रीयों के समूह से निकलने वाला फैसला जगजाहिर है। सरकार अपनी तिजोरी का मुंह खोलने को तैयार है। निशाने  पर तत्कालिन नरसिम्माराव सरकार व उससे भी कहीं ज्यादा राजीव गांधी की भूमिका है। केन्द्र और राज्य दोनों में कांग्रेस की सरकार थी। यही कारण है कि एण्डरसन को भगाने को लेकर कांग्रेसी निशाने पर है। इतना ही नही इस त्रासदी ने हमारे न्यायतन्त्र और राजनीति तन्त्र की सही तस्वीर हमारे सामने ला कर रख दी। इतनी भयानक त्रासदी और न्याय बस दो साल की मामूली सजा। फैसला भी 26 साल के लंबे इन्तजार के बाद। जर सोचिए उन पर क्या बीती होगी जिन्होने इस हादसे में अपनों को खोया या जो आज भी एक ज़िन्दा लाश की तरह जीवन जीने को मजबूर है। यह दर्द भी सह लिया जाता मगर इसकी दवा क्या जब देश के सामने यह सच आ गया कि कंपनी के प्रमुख वॉरन ऐण्डरसन को भारत लाने की की कोशिश तो दूर उसे भगाने के पीछे भी हमारा ही हाथ था। बकायदा सराकारी मेहमान बनाकर हजारों मौतों का सौदागर सरकारी मेहमान बनकर भारत से भाग निकला। राजनीति में संवेदनहीनता की पराकाश्टा का इससे बडा उदाहरण नही मिल सकता है। यह सब जानते हुए की यूनियन काबाZइट से निकली जहरीली गैस के रिसाव के पिछे सुरक्षा मानदण्डों की भारी अनदेखी थी।  आज जो परत दर परत खुलासे हो रहे है उससे देश की सबसे बड़े राजनीतिक पार्टी कांग्रेस अपने उपर लगे आरोपों से बच नही सकती। सब कुछ अर्जुन सिंह के मथ्थे मारना उचित नही। क्योंकि बिना केन्द्र सरकार की सहमति के एण्डरसन को भगाना असान ही नही, नामुमकिन था। आखिर सरकार पर उस समय किसका दबाव था। यह सच को देश के सामने जरूर आना चाहिए। दूसरी अहम बात यह है कि इस त्रासदी से हमें क्या सबक मिलता है। क्या इससे सबक लेकर  केन्द्र सरकार  परमाणु दायित्व विधेयक पर जरूरी बदलाव करेगी। आपूर्तिकर्ताओ पर मामूली जिम्मेदारी डालना किसी लिहाज से उचित है। वो भी जब सरकार आने वाले समय में बिजली उत्पादन के लिए कई नाभकिय प्लांट लगाने जा रही है। फिलहाल यह विधेयक उर्जा मन्त्रालय से जुडी स्थायी समिति के समक्ष है जिसकी सिफारिशों का हम सबको इन्तजार है। तीसरा अहम पहलू बिना देरी किये प्रभावित परिवारों के उचित मुआवजे के साथ उनका पुर्नवास किया जाए जो आज भी नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर है। चौथा डाओं केमिकल्स को भोपाल में पड़ा हजारों टन खतरनाक रसायन को हटाने के लिए कहा जाए। इतना ही नही इस कम्पनी से सहानुभूति रखने वाले प्रत्येक राजनीतिज्ञों को जनता को सबक सिखाना चाहिए। पांचवा हमें बिना देरी किये अपनी न्याय प्रणाली को चुस्त दुरूस्त बनाना चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. लेख बहुत अच्छा लिखा गया है मैं उस वक़्त भोपाल मे थी और मैंने वो खतरनाक मंज़र आँखों से देखा है.वही संस्मरण मैंने अपने ब्लॉग वंदनापिलानी ४६ (शीर्षक चिंतन)मैं लिखा है.कृपया वो पढ़ें
    धन्यवाद
    वंदना

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