रविवार, 14 अगस्त 2011

आज जीत के रात पहरूए सावधान रहना


आजादी के 65वें वर्ष में यह देष प्रवेश कर रहा है। ऐसे में प्रसिद्ध कवि गिरिजाकुमार माथुर की ये पंक्तियां अनायास ही मेरे स्मृति पटल में हिलोरे मारने लगीं हैं।

आज जीत के रात पहरूए सावधान रहना
खुले देश के द्धार अचल दीपक समान रहना।
प्रथम चरण है नए स्वर्ग का, है मंजिल का छोर
इस जन- मंथन से उठ आई, पहली रत्न हिलोर
अभी षेष है पूरी होना, जीवन मुक्ता डोर
क्यांकि नहीं मिट पाई दुख की विगत सांवली कोर
ले युग की पतवार बने, अंबुधि महान रहना
आज जीत के रात पहरूए सावधान रहना।

विषम श्रंखलाएं टूटी है, खुल समस्त दिशाएं
आज प्रभंजन बनकर चलती, युग बंदिनी हवाएं
प्रश्नचिन्ह बन खड़ी हो गई, यह सिमटी सिमाएं
आज पुराने सिंहासन की, टूट रही प्रतिमाएं
उठता है तूफान इंदु, तुम दिप्तिमान रहना
आज जीत के रात पहरूए सावधान रहना।

उंची हुई मशाल हमारी, आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया लेकिन, उसकी छायाओं का डर है
शोषण से मृत है समाज, कमजोर हमारा घर है
किंतु आ रही नई जिंदगी, यह विश्वास अमर है
जनगंगा में ज्वार लहर, तुम प्रवहमान रहना
आज जीत के रात पहरूए सावधान रहना।


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