रविवार, 19 दिसंबर 2010

उच्च शिक्षा के लिए बड़े निवेश की जरूरत

करीब चार साल के लंबे इंतजार के बाद विदेशी शैक्षणिक संस्थान विधेयक 2010 लोकसभा में पेश हो चुका है। इस विधेयक के कानून बनने के बाद विदेशी शैक्षणिक संस्थाओं को भारत में प्रवेश की इजाजत मिल जायेगी। मतलब अब भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालय में पढाई करने का सपना भारत में ही रहकर पूरा कर सकेंगे। एसोचैम की मानें तो इससे भारत को करीब 34500 करोड़ रूपए की सालाना बचत हो सकेगी। अनुमान है कि इतनी रकम भारतीय छात्र विदेश में पढ़ाई पर हर साल खर्च करते हैं। जानकार सरकार के इस कदम को एक अच्छी पहल मान रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालय भारत में खुलेंगे तो भारतीय प्रतिभाओं को शिक्षा का बेहतर मंच मिलेगा। ब्रेन डेन की कथित समस्या से काफी हद तक राहत मिलेगी। शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी ढांचा मजबूत होगा। लेकिन कुछ सवाल अभी बाकी हैं। मसलन अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के छात्रों को क्या आरक्षण की राहत मिलेगी। प्रवेश प्रकिया किस तरह की होगी। साथ ही प्रवेश शुल्क पर क्या कोई सरकारी नियंत्रण होगा। एक सवाल प्रशिक्षित शिक्षकों की वर्तमान कमी का भी है। वैसे सवाल कुछ और भी हैं। लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को इस विधेयक से काफी उम्मीदें हैं। बीते 6 दशकों से देष में उच्च शिक्षा की तस्वीर बेहतर नहीं है। हर 100 छात्रों में से महज 12 ही उच्च षिक्षा ग्रहण कर पाते हैं। नैक के मुताबिक देशभर के सिर्फ 10 फीसदी कालेज ही ए श्रेणी में जगह बना पाए हैं। विष्वविद्यालयों में अध्यापकों के 25 फीसदी पद खाली पड़े हैं। शिक्षा की गुणवत्ता आज भी बड़ी समस्या है। देश के 58 फीसदी स्नातक महीने का 6 हजार रूपए ही कमा पाते हैं। जिस तरह की शिक्षा मुहैया कराई जाती है क्या बदलते वक्त में बाजार में उस शिक्षा की मांग है या नहीं। ऐसे में कपिल सिब्बल को उच्च शिक्षा से जुड़े इन आंकड़ों को भी बदलना होगा। जिसके लिए भारी निवेश और बेहतर निगरानी तंत्र की दरकार है।

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