मंगलवार, 20 सितंबर 2011

राजनीति का अपराधीकरण।


जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 के अंतर्गत कानून की निम्नलिखित धाराओं के तहत दोषी पाए गए व्यक्ति सजा पूरा करने के 6 साल बाद तक संसदीय चुनाव लडने के लिए पात्र नही है।
धारा 153ए, जाति धर्म आदि के नाम पर दो समुदायों में वैमनस्य पैदा करना, या समाज में अशांति फेलाना।
धारा 17 1 ई रिश्वत का आरोप।
धारा 17 एफ चुनाव में बांधा डालने का आरेाप।
धारा 376ए, 376बी, 376सी, 376डी बलात्कार से संबंधित आरोप।
धारा 498 ए महिला पर अत्याचार का आरोप।
धारा 505 दो समुदाय में शत्रुता फैलाने वाला वक्तव्य।
छुआ- छूत मानने वाला व्यक्ति। सिविल राइटस एक्ट 1955।
कस्टम एक्ट 1962 की धारा 11- प्रतिबंधित माल का आयात और निर्यात।
गैरकानूनी गतिविधि कानून 1967 की धारा।
10 से 12 गैरकानूनी संस्था से ताल्लूकात।
फारेन एक्सचेंज रेगुलशन एक्ट 1973।

                   ये नही लड सकते चुनाव।
नारकोटिक एक्ट डरग्स एंड साइकोटरापिक सस्ब्टैंसेज एक्ट 1985।
टाडा एक्ट 1987 की धारा 3 या 4।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 125 
चुनाव के दौरान देा समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाना।
धारा 135ए मतदान केन्द्र पर कब्जा।
धारा 135 मतदान केन्द्र लूटना।
धारा 136 उम्मीदवार के नामांकन पत्र फाड़ना।
प्लेसेज आफ वर्शिफ। स्पेशल प्रोविजन एक्ट 1991 की धारा 6।
प्रिवेंशन आफ इंसल्टस टू नेशनल आनर एक्ट 1971 की धारा 2 या धारा 3।
कमीशन आफ सती प्रिवेंशन एक्ट 1987।
प्रिवेंशन आफ करप्शन एक्ट 1988
इसके अलावा कैदी चुनाव तो लड सकते है लेकिन वोट नही डाल सकते।

जैव विविधता को तार तार करता मानव


जैव विविधता आज अपने अस्तित्व की लडाई लड रही है। जल जंगल, जानवर, जमीन आज सब कोई परेशान है। कारण मनुष्य ने अपने ऐसो आराम के लिए उसका सुख-चैन छीन लिया है। बढती जनसंख्या के चलते मानव ने उसके जीवन में दखल दिया। आज दखल इस कदर बढ गया है कि जंगल में अपने आपको सुखी मानने वाले जानवर शहरों में आतंक मचा रहे हैं। जंगल कंक्रीट के मैदान में बदलते जा रहे हैं। जनसख्ंया विस्फोट, जंगलों का कटना, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैव विविधता को नष्ट करने पर तुले हैं। भारत में 81 हजार जानवरों की और 46 हजार पौंधों की प्रजातियां हैं। इंटर गर्वमेन्टल पैनल फार क्लायमेट चेंज यानी आइपीसीसी ने भी अपनी रिपोर्ट में इस ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन के कारण भारत की 50 प्रतिशत जैव विविधता पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। अगर तापमान 1.5 से 2.5 डीग्री सेंटीग्रेड तक बडा तो 25 फीसदी पौंधों की प्रजातियां विलुप्त हेा जाएंगी। पृथ्वी पर लाखों प्रजाति की जीव व वनस्पति उपलब्ध है। इनकी विशेषता और रहन सहन अलग अलग है। पर्यायवरण में रहे बदलाव क चलते इनकी कड़िया टूट रही है। आज इन्हें बचाने की जरूरत है।

विकास बनाम भ्रष्टाचार

मेरा भारत महान। सौ में से नब्बे बेइमान। फिल्मों में बोले इस डायलाग से किसी को ताज्जूब नही हुआ। क्योंकि यह आज के भारत की एक कड़वी सच्चाई है। भारत आर्थिक तरक्की की राह में निरन्तर आगे बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था 8 फीसदी की तेज रफतार से दौड रही है। सेंसेक्स की 17 हजार की जबरदस्त  छलांग। उपर से लबालब भरा हमारी विदेशी कोष। ये सब गवाह है भारत की गुलाबी तस्वीर के। सारे बिन्दू बयां कर रहे है कि भारत विकसित देशों की कतार में शमिल होने जा रहा है। पल भर के लिए आप और हम यह सब जानकर खुशी से फूले नही समा रहे हैं। मगर क्या कहे बात निकली है तो दूर तलक जायेगी। बात साफ है कि भ्रष्टाचार आज हमारी तरक्की का सबसे बड़ा रोड़ा है। इससे निजात पाये बिना विकसित भारत की सपना कही कपोर कल्पना बनकर न रह जायें। ट्रांसपैरेन्सी इंटरनेशनल की हाल में आई रिपोर्ट में भ्रष्टतम देशों की गिनती में भारत का 120 पायेदान में पहुंचना थोड़ी राहत जरूर देता है। मगर नतीजों में अगर गौर किया जाये तो कुछ मुद्दे किसी डरावने सपने से कम नही। मसलन केवल 11 महकमे ही हमें सेाचने पर मजबूर कर देते है। पुलिस, निचली अदालतें, सरकारी अस्पताल,  निकाय, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, बिजली विभाग में भ्रष्टाचार कोई नई बात नही है। रिपोर्ट कहती है कि इन 11 महकमों में सालाना 21068 करेाड रूपये घूस के तौर पर दिये जाते हैं। पुलिस सबसे ज्यादा भ्रष्ट है। निचली अदालत दूसरे नम्बर पर तो जमीन से जुडे मामले में भी जमकर लूटघसूट होती है। बिहार को एक बार फिर माहाभ्रष्ट राज्य का तोहफा मिला है। वहीं उम्मीद के मुताबिक केरल शान से कह सकता है। से नो टू करप्सन। संसद, न्यायपालिका, नौकरशाही, भ्रष्टाचार के बड़े अड्डे बन गये हंै। प्रशासनिक पारदर्शिता और परिणाम परेासने की जिम्मेदारी के आभाव में भ्रष्टाचार निरंकुश हुआ है। मौजूदा हालात में विजन 20- 20 जैसे दावे को झूठलाता है। उपर से प्रबल राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी दाद में खाज का काम कर रही है।
लोकपाल विधेयक।
सूचना का अधिकार।
माडल पुलिस एक्ट।
निगरानी समिति।
प्रशासनिक आयोग की सिफारिशें।
जनप्रतिनीधि को वापस बुलाने का अधिकार।
जजेस इनक्वारी बिल।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

आतंकवाद से निपटने के लिए हमारी तैयारी कहां है ?


बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायलय के गेट पर हुए धमाके से क्या इस देश के सुरक्षा रणनीतिकार सबक लेंगे। क्या यह धमका एक गंभीर चूक का नतीजा नही है। महज 3 महिने 13 दिन बाद दिल्ली हाइकोर्ट को दुबारा निशाना बनाना क्या दिखाता है। यह दिखाता है की आतंकवाद जो पूरी दुनिया के लिए एक नासूर बन चुका है उससे लड़ने के लिए हम कितने प्रतिबद्ध हैं। हर बार जब हमला होता है। घटना की निंदा कर दी जाती है। मुआवजे का ऐलान होता है। सरकार का बयान आता है कि गुनेहगारों को कानून की जद में लाया जाएगा। आखिर देश  इन आश्वासनों पर कब तक भरोसा करे। कब तक आतंकवादी हमारे निर्दोष नागरिकों को अपना निशाना बनाऐंगे। आज देश  की आवाम भय में जी रही है। बस, ट्रेन, मंदिर मस्जिद, अस्पताल, बस स्टैंड, पार्क, कोर्ट यहां तक की देष की संसद तक में आंतकी घुस जाते है। सरकार बताए आखिर इस देश के लोग कहां सुरक्षित हैं। 26/11 के बाद इस देश की आवाम को सुरक्षा तंत्र को लेकर सब्जबाग दिखाए गए वो क्या सब झूठे थे। बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या इस तरह के हमलों से निपटने के लिए हमारी तैयार है। क्या हमारे खुफिया तंत्र में वह चैकन्ना पन है जो हमलों से पहले ही हमलावरों को धर दबोचे। क्या हमारी पुलिसिया तंत्र मजबूत है। आखिर क्यों बीते 15 सालों में 21 बार आतंकवादी देश की राजधानी को आसानी से निशाना बना लेते हैं। कैसे बीते 8 सालों में देश की आर्थिक राजधानी 11 बार आतंकियों के नापाक मंसूबों का शिकार हो जाती है। मुंबई हमलों के बाद गृहमंत्रियों ने सुरक्षा तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए क्या कुछ नही कहा। इसमें राष्ट्रीय  आतंकवाद प्रतिरोध केन्द्र,( एनसीटीसी)  बहु अभिकरण केन्द्र,(एमएसी)  राष्ट्रीय  अभिसूचना संजाल,(नैटग्रिड)  राष्ट्रीय जांच एजेंसी, विदेशियों के पंजीकरण तथा तलाश, राष्ट्रीय  सुरक्षा दस्ता, सामुद्रिक सुरक्षा सलाहाकार, समुद्री नौकाओं का पंजीकरण, मछुवारों के लिए पंजीकरण, संयुक्त आपरेशन केन्द्र की स्थापना, सागर प्रहरी बल, तटीय दस्तों का आधुनिकीकरण, आतंक निरोधी दस्ते और गुप्तचर व्यवस्था में सुधार जैसे अहम बदलावों की घोषणा की गई। इनमें से कुछ में काम हुआ और कुछ सरकारी फाइलों की शोभा बड़ा रहे है। इसका उदाहरण दिल्ली हाइकोर्ट परिसर से ही मिल जाएगा। तीन साल पहले सीसीटीवी लगाने की योजना बनाई गई मगर मसला फाइलों से आगे नही बड़ पाया। यहां तक की 25 मई को हुए धमाके से भी हम नही सीखे। यह है आतंकवाद से लड़ने का हमारा रवैया। और हमारी सरकारें हर हमले के बाद आतंकवाद को परास्त करने का दंभ भरती हैं। सच्चाई यह है की कुछ महिने की शांति व्यवस्था हमारे सुरक्षा तंत्र को निश्चिंत कर देती है। आज हमें बिना देरी किये यह सच्चाई कबूल कर लेनी चाहिए कि आतंकवादी हमारी सुरक्षा एजेंसियों की चैकस नजरों से ज्यादा शातिर हैं। इसलिए वह हर बार कामयाब हो रहे हैं। हमारे देश में आइबी सबसे बड़ी गुप्तचर संस्था है। लेकिन इस संस्था में 9443 पद रिक्त पड़ें हैं। जरूरत तो थी कि मानव संसाधन बढ़ाने की मगर यहां पहले के ही रिक्त पद नही भरे गए हैं। आज देष में 1327 आइपीएस अफसरों की कमी है। पुलिस में निचले स्तर के हालात और ज्यादा खराब हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक प्रत्येक 1 लाख की आबादी में न्यूनतम 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए, मगर हमारे देश में यह संख्या 160 के आसपास है। यह राष्ट्रीय औसत है। राज्यवार आंकड़े  तो और भी चैंकाने वाले हैं। प्रति लाख आबदी के हिसाब से बिहार में यह आंकड़ा 75 है, उत्तरप्रदेश में 115, आंध्रप्रदेश में 125, ओडिसा में 135, छत्तीसगढ़ में 205, और झारखंड में 205। इसकी सबसे बड़ी वजह है की देष में तकरीबन 560000 पुलिसकर्मियों के पद रिक्त पड़े है। पुलिस सुधार को लेकर बने राष्ट्रीय  पुलिस आयोग की सिफारिशों पर राज्य सरकारें नाक भौं सिुकोड़ने लगती है। यही कारण है की हमारे देश का 1861 का कानून आज सुधारों की बाट जोह रहा है। सोली सोराबजी की अध्यक्षता में एक माडल पुलिस एक्ट 2006 राज्य सरकारों के भेजा जा चुका है मगर ज्यादातर सिफारिशों को लागू करने में राज्यों की दिलचस्पी नही। यह भी तब जब सितंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने तक राज्यों को पुलिस सुधार को लेकर निर्देश दे चुका है। केन्द्र सरकार कानून व्यवस्था को राज्यों सरकारों के अधिन बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती है मगर इस माडल पुलिस एक्ट को वह दिल्ली में तक लागू नही करा पायी है। क्या इसी रवैये के सहारे हम आतंकवाद को हर कीमत पर परास्त करने की बात करते हैं। सवाल यह भी है कि जब राजधानी में सुरक्षा का यह हाल है तो बाकि राज्यों में क्या स्थिति होगी। आज समय की मांग है कि राज्यों को बिना देरी किए पुलिस आधुनिकीकरण पर तेजी से काम करना चाहिए। न सिर्फ हमारे पुलिसकर्मी आधुनिक हत्यारों से लैस हो बल्कि उनके प्रशिक्षण की ओर खास ध्यान देना होगा। साथ ही आतंकी वारदातों से निपटने के लिए राज्यों को विशेष दस्तों की स्थापना करनी चाहिए जो केन्द्र सरकार की एनएसजी की तर्ज पर हो। इसके अलावा थानों के स्तर में एलआइयू जैसे यूनिट को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। दूसरा मसला आता है कि आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे में हम कितना खर्च करते हंै। यह आंकड़ा जीडीपी यानि सकल घरेलू उत्पाद का 1 फीसदी है। जबकि रक्षा क्षेत्र में हम जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च करते हैं। लिहाजा इसका खास ख्याल रखा जाए की धन की कमी राष्ट्रीय  सुरक्षा के र्मोचे पर आड़े न आए। आज देश को जरूरत है एक कठोर कानून की। जो उन असमाजिक तत्वों के मन में भय पैदा करे जो विदेशी ताकतों के इशारों पर काम करते हैं। क्योंकि आतंक के इस नए चेहरे में घरेलू समर्थन को नकारा नही जा सकता। साथ ही ऐसे मामलों को  एक तय समयसीमा के तहत निपटाने की व्यवस्था कायम की जाए। भारत को एक नरम राष्ट्र की छवि से बाहर निकलकर कठोर बनना होगा। आखिर क्या वजह है कि अमेरिका ने 9/11 जैसे हमलों को दुबारा नही होने दिया। पहला वहां के सुरक्षा तंत्र में वह सारी विषेषाऐं हैं जो किसी भी हमले से निपटने के लिए तैयार हैं। दूसरा वहां आतंकवादियों के लेकर राजनीति नही होती है और न ही आतंकी जेलों में सालों तक रोटी तोड़ते है। वो तो घर में घुसकर अपने दुश्मन को मारने का माद्दा रखते है और ओसामा को मारकर उन्होंने यह साबित भी कर दिया। आज हमें अमेरिका के सुरक्षा तंत्र की बारीकियों से सीखने की जरूरत है। यह बात सही है कि हमारी भौगोलिक परिस्थितियां अलग है। मगर हमें नागरिक सुरक्षा को हर कीमत पर सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जरा सोचिए जिस देश में  आतंकवादियों को फांसी की सजा से बचाने पर राजनीति होती है। आतंकवादियों को फांसी देने में सालों लग जाते है। जहां की न्याय व्यवस्था में कई छेद हो वहां का सुरक्षा तंत्र क्या भय पैदा कर पायेगा। आज जमीन आसमान और समंदर तीनों जगह हमें पैनी निगाह रखनी होगी  और इसके लिए जरूरत है ठोस राजनीति प्रतिबद्धता की जो अकसर नदारद सी दिखती है।
कर रहा साजिश अंधेरा, सीढ़ियों में बैठकर 
रोशनी के चेहरे पर क्यों कोई हरकत नहीं

रविवार, 4 सितंबर 2011

डाक्टर जनसंख्या अनुपात



भारत में जनसंख्या के हिसाब से डाक्टरों का खासा टोटा है। शहरों में डाक्टर जरूर मौजूद हैं मगर राज्यों और खासकर ग्रामीण इलाकों में यह हालत चिन्ताजनक हैं। आज विश्व मानदंडों से हम कहीं मेल नही खाते। हाल की में प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक डाक्टर प्रति मरीज सिर्फ 60 सेकेंड ही दे पाते है। आईये एक नजर डालते हैं विश्व को डाक्टर जनसंख्या अनुपात पर।
देश                    डाक्टर जनसंख्या अनुपात        
भारत                       1ः1667
अमेरिका                     1ः375
ब्रिटेन                       1ः365
जर्मनी                       1ः283
इंडोनेशिया                   1ः3449
फ्रांस                        1ः286
ईजिप्ट                       1ः353
इराक                        1ः1449
पाकिस्तान                    1ः1235
श्रीलंका                      1ः2041
इसके अलावा भारत में राज्य वार डाक्टर जनसंख्या अनुपात पर नजर डाली जाए तो
प्रदेष                      डाक्टर जनसंख्या अनुपात 
झारखंड                     1ः16000  
छत्तीसगढ़                   1ः10000
बिहार                       1ः4761  
उत्तरप्रदेश                   1ः3125
मध्यप्रदेश                     1ः2439
कर्नाटक                     1ः666
महाराष्ट                     1ः872
तमिलनाडू                    1ः769
पशिचम बंगाल                 1ः1408
आंध्रप्रदेश                     1ः315
राजस्थान                     1ः2173
इसके अलावा विदेषों में काम करने वाले डाक्टरों पर नजर डाली जाए तो पिछले तीन सालों में 3660 स्पेशलिस्ट और सुपर स्पेशलिस्ट
विदेशों में जाकर अपनी सेवाऐं दे रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका में 80000 डाक्टर जिसमें 61000 रजिस्टर्ड और 21000 अनरजिस्टर्ड डाक्टर हैं। इस तरह यूरोप में तकरीबन 40000 और 30000 के आसपास खाड़ी देशों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

सांसदों की जिलास्तरीय निगरानी व्यवस्था से हुआ मोहभंग


लगता है हमारे परम आदरणीय सांसदों का जिला स्तर निगरानी समिति के कामकाज से मोहभंग हो गया है। सरकार ने उन्हें इस समिति का अध्यक्ष जरूर बनाया है मगर सांसदों की मानें तो उन्हें नाममात्र का अध्यक्ष बनाया गया जबकि उनकी सुनवाई कहीं नही होती। निम्नलिखित योजनाओं की निगरानी के लिए सरकार ने राज्य स्तर और जिला स्तर पर निगरानी तंत्र बनाया है। राज्य स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में और केन्द्र स्तर पर सांसदों के स्तर पर निगरानी तंत्र का गठन किया गया है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत त्रीस्तरीय निगरानी व्यवस्था का गठन किया गया है। इसमें एक केन्द्र के स्तर पर नेशनल लेवल मानीटर और 2 तंत्र राज्य के स्तर पर बनाए गए हैं। इसके अलावा नेषलन रूरल हेल्थ मिशन, संपूर्ण स्वच्छता अभियान, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण जैसे योजनाओं का निगरानी का जिम्मा सांसदों को दिया गया है। बकायदा सालाना आधार पर प्रत्येक राज्यों और जिलों में कितनी बैठकें होनी है इसके दिशानिर्देश केन्द्र ने जारी कर रखें हैं। मसलन सालान आधार में 28 राज्यों में 112 बैठकें होनी चाहिए मगर 2006-07 में 35, 2007-08 में 36 और 2008-09 में 35 बैठकें भी हो पायी। हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, मिजोरम ,दादर और नागर हवेली में पिछले 2 सालों में एक भी बैठक नही हुई। वही 619 जिलों में कुल 2476 बैठकें होनी चाहिए। मगर 2006-07 में 619, 2007-08 में 912 और 2008-09 में 579 बैठकें ही हुई। महात्मा गांधी नरेगा में सोशल आडिट का प्रावधान है। बकायदा हर जिले पर एक लोकपाल नियुक्त करने के दिशानिर्देश जारी किये गए हैं। समाज के जागरूक लोगों का एक पैनल गठित करने की बात कही गई है। खासकर निगरानी को लेकर पंचायतों की भूमिका को काफी अहम बना दिया गया है। आज बजट की एक बडी राषि ग्रामीण विकास के कार्यक्रमों के लिए खर्च की जा रही है। जरूरत है इन योजनाओं का जरूरतमंदों तक पहुंचाने की।

शनिवार, 3 सितंबर 2011

स्वास्थ्य क्षेत्र में है व्यापक सुधार की दरकार


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने योजना आयोग की हालिया बैठक में 12वीं पंचवर्षिय योजना में स्वास्थ्य क्षेत्र पर विशेष जोर देने की बात दोहराई है। इसके लिए बकायदा जो खाका तैयार किया गया है उसमें स्वास्थ्य क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी का 2.5 फीसदी 12वीं पंचवर्षिय योजना के अन्त तक खर्च करने की बात कही है। योजना आयोग ने 11वीं पंचवर्षिय योजना में मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, अस्पताल में प्रसव कराने और सम्पूर्ण टीकाकरण को लेकर जो लक्ष्य निर्धारित किए थे उससे हम काफी दूर है। मगर 2005 में लागू की गई महत्वकांक्षी योजना राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अस्तित्व में आने के बाद हालात जरूर बदले हैं। मगर सफर अभी बहुत लंबा है। भारत में अगर स्वास्थ्य क्षेत्र पर नजर दौड़ाई जाए तो कई चैकाने वालें आंकड़ों से हमें दो चार होना पड़ेगा। मसलन इस क्षेत्र का 80 फीसदी हिस्सा निजी हाथों में है। महज 20 फीसदी हिस्सा सरकार के जिम्मे है। इस 20 फीसदी में भी 80 फीसदी राज्य सरकार के अधीन आता है। चंूकि स्वास्थ्य क्षेत्र राज्यों का विषय है लिहाजा लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाऐं पहुंचाना राज्य सरकार का प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है। मगर राज्यों ने अपने सालाना बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटन में कुछ खास दरियादिली नही दिखाई। यही कारण है कि केन्द्र सरकार के बजट आवंटन बढ़ाने के बावजूद हम जरूरत के मुताबिक समुचित राशि का प्रबंध नही कर पा रहे हैं। आज दुनिया की आबादी में हमारी हिस्सेदारी 16 फीसदी के आसपास है, मगर बीमारी में हमारा योगदान 20 फीसदी से ज्यादा है। यूपीए सरकार जब 2004 में सर्वसमावेशी विकास के नारे का साथ सत्ता में आसीन हुई तो उसने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में इस बात की घोषणा की कि स्वास्थ्य क्षेत्र की तस्वीर को बदलने के लिए सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी का 2 से 3 फीसदी इस क्षेत्र में दिया जायेगा। मगर अभी तक गाड़ी 1.04 फीसदी के आसपास है। अगर षुद्ध जल मुहैया कराने और स्वच्छता को दिए गए बजट को भी जोड़ लिया जाए तब भी यह आंकड़ा 1.08 फीसदी तक ही पहुंचता है। क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र का 59 फीसदी बजट दूषित पानी से पैदा होने वाली बीमारियों पर खर्च हो जाता है। इसलिए पानी और स्वच्छता को मिलने वाले बजट पर भी नजर रखना आवष्यक है। विष्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि विकासषील देषों को जीडीपी का 5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च करना चाहिए। मगर हम अभी इससे काफी दूर हैं। जरूर 11 पंचवर्षिय योजना में 140135 करोड की राशि का निर्धारण किया गया है,जो 10वी पंचवर्षिय योजना के मुकाबले 227 फीसदी ज्यादा है। इसमें से अकेले 90558 करोड़ की राशि केवल केन्द्र सरकार का महत्वकांक्षी कार्यक्रम राष्टीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए रखे गए थे। स्वास्थ्य क्षेत्र के सामने आज सबसे बड़ी चुनौति मानव संसाधन की कमी को पूरा करने की है। इसमें सबसे ज्यादा खराब तस्वीर ग्रामीण क्षेत्रों की है। भौतिक सुविधाओं को मुहैया कराने में सरकार कुछ हद तक जरूर सफल रही है, जिसमें प्रमुख है उपकेन्द, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र और जिला अस्पताल । मगर डाक्टर और नर्सो की भारी टोटा सरकार के माथे में बल ला देता है।  हमारे देष में डाक्टर जनसंख्या अनुपात 1ः1667 है। यानि 1667 आबादी पर 1 डाक्टर। जबकि अमेरिका में यह अनुपात 1ः375 और ब्रिटेन में 1ः365 है। डब्लयूएचओं के मुताबिक डाक्टर जनसंख्या अनुपात 1ः250 होना चाहिए। मगर ग्रामीण भारत में यह अनुपात डराने वाला है। ग्रामीण भारत में  34000 की आबादी में 1 डाक्टर है। योजना आयोग के मुताबिक भारत में 8 लाख डाक्टर और 20 लाख नर्सो की कमी है। इस मुष्किल से निपटने के लिए सरकार अब इस कमी को पूरा करने के लिए बैचुलर आफ रूरल हेल्थ केयर मसलन रूरल एमबीबीएस कोर्स पर विचार कर रहा है। यह पाठ्यक्रम चार साल का होगा जिसमें  6 माह की इंटरनशिप शामिल है। अहम सवाल उठता है कि आज हालात ऐसे क्यों बने। आखिर क्या वजह है की दक्षिणी राज्यों स्वास्थ्य में मामले में उत्तरी राज्यों से आगे हैं। आइये जरा समझने की कोषिष करते है। आज देश में तकरीबन 300 मेडीकल कालेजों में 190 सिर्फ पांच राज्यों में है। इसमें कर्नाटक, महाराष्ट, तमीलनाडू, आंध्रप्रदेश  और कर्नाटक शामिल है। जबकि बिहार में के पास महज 9 मेडीकल कालेज है जबकि उसकी आबादी 7 करोड़ से ज्यादा है। ऐसे ही कुछ हाल झारखंड का भी है। 3 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में केवल 3 मेडीकल और 1 नर्सिंग कालेज है। आज इस अन्तर को पाटने की भी सख्त दरकार है। दूसरी तरफ सरकार के लिए मिलीनियम डेवलपमेंट गोल के तहत निर्धारित किए गए लक्ष्यों को पाना किसी चुनौति से कम नही होगा। सरकार 2012 तक मातृ मृत्यु दर को प्रति लाख 100 तक लाना चाहती है। जो 2007 में 254 था। इसी तरह शिषु मृत्यु दर को 30 तक जो 2007 मंे 55 था। जननी सुरक्षा योजना के अस्तित्व में आने के बाद जरूर अस्पताल में प्रसव कराने आने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ रही है। वहीं 2012 तक संपूर्ण टीकाकरण की राह लंबी है। फिलहाल यह आंकड़ा 60 से 65 फीसदी के आसपास है। भारत सरकार के लिए आज सबसे बड़ी चुनौति डाक्टरों का गांवों से अलगाव है। आखिर यह स्थिति क्यों। इसमें कोई दो राय नही कि डाक्टरी आज सेवा करने का एक माध्यम नही बल्कि, एक विषद्ध व्यवसाय बन गया है। इंडियन मेडीकल सोसइटी के सर्वे के मुताबिक 75 फीसदी डाक्टर शहरों में काम कर रहे हैं। 23 फीसदी अल्प शहरी इलाकों मे और महज 2 फीसदी डाॅक्टर ग्रामीण इलाकों में अपनी सेवा प्रदान कर रहे है। क्या इसके लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार नही। बहरहाल मेडीकल काउंसिल आॅफ इंडिया ने कुछ बड़े फैसले किए है जिसमें शिक्षक छात्र अनुपात को 1ः1 से बढ़कार 1ः2 कर दिया गया है। साथ ही जमीन की उपलब्धता जैेस मुददों में भी राहत प्रदान की गई हैं। हमारे देश में आज प्राचीन चिकित्सा प्रणाली पर कोई खास ध्यान नही दिया गया। आर्युवेदिक, होमयोपैथिक, सिद्धा और यूनानी जैसी चिकित्सा प्रणाली की तरफ समुचित ध्यान न दिए जाने के कारण ऐसे हालत पैदा हुए हैं। ऐसा नही कि यह चिकित्सा प्रणाली फायदेमंद नही है। दरअसल सवाल यह है कि इसे फायदेमंद बनाने के लिए हम कितने गंभीर है। जरा सोचिए जब देश की 77 फीसदी आबादी की हैसियत एक दिन में 20 रूपये से ज्यादा खर्च करने की नही है। तो वह क्या फाइव स्टार की तर्ज पर बने निजि अस्पतालों में जाकर इलाज करा सकते हैं। इसलिए समय की मांग है कि इन बहुमुखी सुविधाओं से लैस अस्पतालों के उपर एक प्राधिकरण का गठन किया जाए। भारत सरकार का महत्वकांक्षी कार्यक्रम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिषन को लागू हुए पांच साल से ज्यादा बीत चुके हैं। मगर यह अपने उददेष्य के मुताबिक गांवों में कोई आमूलचूल परिवर्तन नही कर पाया है। इसके तहत जारी धनराषि खर्च तक नही हो पा रही है उपर से भ्रष्टाचार ने भी इस योजना को घेर रखा है।हाल में उत्तर प्रदेश में हुए घोटाला इसका ताजा उदाहरण है। आजादी के 64 साल बीत जाने के बात भी हम अपने नागरिकों को जब स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाऐं भी मुहैया नही करा पा रहें हैं तो हम समग्र विकास के दावे का स्वांग क्यों रचते हैं।