बुधवार, 28 सितंबर 2011

बंटता समाज

दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में सदभाव क्या आज दूर की कौड़ी है। गंाधी गौतम के अहिंसा और भाइचारे की सीख के आज कोई मायने नही। आज धार्मिक कट्टरपंथ, क्षेत्रीयवाद और जातिवाद  क्यों हवी हो रहा है। समाज आखिर क्यों बंट रहा है। जिस सदभाव को शस्त्र बनाकर पूर्व प्रधानमंत्री स्व राजीव गांधी ने देश में आपसी रिश्तो को मजबूत बनाने की पहल की थी आज वो बिखरता क्यों बिखरता नजर आ रहा है। जम्मू कष्मीर की समस्या महज जमीनी विवाद है या कुछ और। कहां है सदभाव का वह रूप जिसने अशांत पंजाब की रौनक को फिर से लौटा दिया। इतिहास का महत्वपूर्ण समझौता राजीव गांधी और संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच हुआ।कहां है सदभाव का वह रूप जिसने पूर्वोतर की समस्या के समाधान का रास्ता प्रशस्त किया। आज हर देशभक्त को यह सवाल खाए जा रहे है। जवाब मिलता नजर नहीं आ रहा है। जवाब सरकार के पास भी नही है। अगर होता तो जम्मू के हालात इस कदर नही बिगड़ते। भ्रष्टाचार और महंगाई से देश नही कर्राहा रहा होता। ऐसा नहीं की समाधान की कमी है। असली बात यह है कि हर कोई इसके लिए राजनीतिक नफे नुकसान का आंकलन करता है। हर कोई इसी दिशा में सोचता है कि फलां करने से उसकी राजनीतिक चमक बढ़ने की कितनी गुजाइष है।फिर क्यों कोई इसके समाधान की सोचे। आज  सदभाव आपसी भाईचारा सिर्फ किताबी बातें हैं। यह भावना आज भी हमारे बीच में है मगर केवल आदर्शों में। सही मायने में इसकी अहमियत आज कोई नही समझता है।


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