रविवार, 5 मई 2013

नही होती बहस



संसद में बहस का स्थर गिर रहा है। सत्र घट रहे है। कई जरूरी विधेयक बिना बहस के पास हेा रहे है। सभा की कार्यवाही से कई सांसद अकसर नदारद रहते है। कभी कभी तेा कोरम पूरा न होने के हालात भी सामने आ जाते है। अकसर ऐसे हालात अब देखने केा मिल जाते है। चैदहवी लेाकसभा के संसदीय कामकाज पर ही डाल ली जाए जो तस्वीर के कई पहले निकलकर सामने आ जायेंगे। 14वींलोकसभा में अब तक के चार सालों में  तेरह सत्र बैठ चुके है। साल में बजट सत्र के दो चरण, मानसून सत्र और शीतकालिन  सत्र होते है।नियम तो कहता है कि सालाना संसद की बैठकें सौ दिन होनी चाहिए। मगर अब इसका आॅकडा गिरकर 65 तक पहुच गया है। वही सालाना पेश और पास हेाने वाले विधेयकेा की संख्या में खासी कमी देखने के मिली है। संसदीय कामकाज के प्रति भी सांसद गंभीर नही दिखाई देते। 2002 से अब तक की कार्यवाही पर  नजर डाल ले तो सब कुछ दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। अब जरा आंकडों पर नजर डाल लेते है 2004 से 2007 तक लोकसभा हंगामें के चलते 365 घंटे 39 मिनट बर्बाद हुए। राज्यसभा में यह आंकड़ा 354.50 धंटे का है। सदन की कार्यवाही में प्रति मिनट 26 हजार रूपये खर्च आता है। गुणाभाग करके कुल बर्बाद समय होता है 720.29 घंटे। मतलब चार साल में 1 अरब 12 करोड़ 39 लाख 54 हजार की बर्बादी। जनता के खून पसीने की गाडी कमाई का यह हाल मगर परवाह किसे है।

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