रविवार, 11 अप्रैल 2010

नक्सलवाद का नर्क

नक्सलवाद या कहें माओवाद सही मायने में व्यवस्था के खिलाफ एक जंग का ऐलान था। 1967 में कानू सान्याल और चारू माजूमदार के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आन्दोलन एक बडा परिवर्तन था। आन्दोलन शुरू करने के पीछे की विचारधारा इतनी प्रबल थी कि कई लोग जो उस समय आईएएस और पीसीएस जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रह थे वह भी इस आन्दोलन के साथ जुडे। और नक्सलाबारी से शुरू हुआ यह आन्दोलन धीरे धीरे बड़ता चला गया। मगर तब किसी ने यह नही सोचा था कि एक नये परिवर्तन के आगाज के लिए शुरू हुई यह विचारधारा इस कदर हिंसक गतिविधयों में तब्दील हो जायेगी की देश के प्रधानमन्त्री को बार बार सार्वजनिक मंच से कहना पडेगा कि नक्सलवाद इस देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए सबसे बडा खतरा है। यह सही है कि यह सामाजिक और आर्थिक असुन्तलन के चलते उपजी समस्या है मगर वर्तमान में इसका रूप इतना कुरूप है जिसे खत्म करने की नितान्त आवश्यकता है।भारत जैसा देश जो अहिंस परमों धर्मो के सूत्र मे बंधा है वहां हिंसा को जायज ठहराना किसी भी लिहाज से न्यायोचित नही। मगर जब हिंसा बेकाबू हो जाए और निर्दोश लोग उसकी बलि चडने लगे तो उसका एक ही जवाब है प्रतिहिंसा। यहां बात राजधर्म की भी आती है कि राजा उन्हे दण्डित न करे जो दन्ड के पात्र हो तो इस तरह की गतिविधयां पर विराम लगाना आसान नही। मनृस्मृति में कहा गया है कि जस प्रकार घोडे को लगाम से तथा हाथी को कटार से नियन्त्रण में किया जाता है ठीक उसी तरह असामाजिक तत्वों को कानून का भय होना चाहिए। तुलसी रामायण में स्पश्ट लिखा है कि
विनय न मानत जलधि जर:, गए तीन दिन बीत
बोले राम सकोप तब:, भय बिनू होय न प्रीत।

यहां अच्छी बात है कि सरकार प्रतिहिंसा के साथ उन कारणों के निवारण की ओर भी ध्यान देगी जिस वजह से परिस्थितियां उत्पन्न हुई है। मतलब नक्सल प्रभावित इलाकों में नागरिक प्रशासन बहाल करने के साथ साथ विकास की प्रक्रिया से वहां की आबादी को जोडना और उनमें सरकार और प्रशासन के लिए एक सकारात्मक नज़रियां बनाने के लिए माहौल तैयार करना नितान्त आवश्यक है।नक्सलवाद के जन्म के पीछे का कारण सामाजिक और आर्थिक भेदभाव है और यह सौ आने सही बात है। बिना सामाजिक और आर्थिक भेदभाव के कारणो के चलते किसी विचाधारा के जनमानस का इतना व्यापक समर्थन नही मिल सकता। सोचिए जब आप किसी समुदाय को उसकी आत्मा यानि जल, जंगल और जमीन से अलग कर देंगें तो नतीजा क्या होगा। इस तरह के हालत ही पैदा होगा। मसलन अघौगिकीकरण के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर देना। उनके साथ किया गया कू्ररता पूर्वक व्यवहार उन्हे व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने को मजबूर कर देता है। मगर आज हालात बदले है। यूपीए सरकार सर्वसमावेशी विकास के मूलमन्त्र के साथ सत्ता में आई है। आदिवासी इलाको ंके लिए विशेश योजनाऐ चलाई जा रही है। 2004 से आदिवासी कल्याण के लिए एक अलग मन्त्रालय का गठन किया गया है। सरकार राश्टीय आदिवासी नीति पर जल्द सामने लाने वाली है। मतलब आज यह मुमकिन नही कि लम्बे समय तक आप किसी क्षेत्र या समुदाय को विकास की चकाचौंध से वंचित रख सकते है।यह बात सही है कि नक्सलियों के पास अत्याधुनिका हथियार कहां से आए यह बडा सवाल है। जिसमें गाहे बगाहे यह बात सामने आती है कि इनका सम्बन्ध कछ बडे आतंकी संगठनों के साथ हो सकता है। मगर प्रमाणिक तौर पर यह बात नही कही जा सकती। यह बात सही है कि नक्सलि कई सौर करोड रूपये का सलाना उगाई करते है जिसका इस्तेमाल वो अत्याधुनिक हथियार खरीदने के लिए करते है। यह भी सच है कि आतंकि संगठन हमेश इस फिराक में रहते है की इस तरह के असन्तोश का फायदा उठाया जाए ताकि उसी देश के लोगो का इस्तेमाल उस देश के खिलाफ हो। इस देश में नक्सली समस्या के लिए जिस तरह का वातावरण तैयार करने की जरूरत थी वह आज से पहले कभी नही थी। केन्द्र और राज्य के बीच की दूरियां। राजनीतिक दलों की अलग अलग राय। साथ ही राज्य पुलिस की निकम्मापन यह कहें पुलिस सुधार का अभाव सबकुछ मौजूद था। मगर वर्तमान गृहमन्त्री पी चिदंबरम ने इस समस्या के प्रति सबको आगाह किया और इससेा लडने कि लिए जरूरी माहौल तैयार किया। क्योंकि अभियान के मुताबिक राज्य पुलिस को केन्द्रीय पुलिस बल नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों में नागरिक प्रशासन बहाली में मदद करेंगे। आन्तरिक सुरक्षा को चाकचौबंध करने के लिए सरकार को एक लम्बा रस्ता तय करना होगा। आज हमला जमीन आसमान और समन्दर कहीं से भी हो सकता है। ऐसे में मुल्क को अभेघ सुरक्षा कवज कैसे पहनाय जाए इस विचारणीय प्रश्न है। मेरे हिसाब से इसकी शुरूआत राज्यों से होनी चाहिए। आज इस देश को पुलिस सुधार की महती आवश्यकता है। राज्यों को पुलिस सुधार में तेजी से आगे बड़ना होगा। साथ ही पुलिस आधुनिकीकरण पर तेजी से काम करना होगा। खुफिया तन्त्र को चुस्त दुरस्त करना होगा। ताकि बडी घटनाओ को घटने से रोका जा सके। उससे भी बडी बात केन्द्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल। मजबूत कानून और न्यायिक प्रक्रिया में तेजी जैसे रास्तों में आमूलूचूल परिवर्तन करना होगा।

1 टिप्पणी:

  1. नक्सलवाद पर अच्छी पोस्ट डाली है। हम आपकी बातों से सहमत हैं।

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