गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

शिक्षा का अधिकार

1 अप्रेल से लागू हुए इस कानून से इस देश को बडी उम्मीदें है। दुनिया में अपने ही तरह का यह एक अनोखा कानून है जो 6 से 14 साल के उम्र के बच्चे का शिक्षा का अधिकार देता है। क्या माना जाए जो बच्चे सर्व शिक्षा अभियान के दौरान विद्यालयों का मुंह ही नही देख पाए क्या वह अब स्कूल में दाखिला पा जायेगें। कानून जरूर अपने आप में नायाब है। मगर बिना जमीन में उतरे नायाबी की भी कोई कद्र नही। शिक्षा का कानून का बेहतर क्रियान्यवयन केन्द्र और राज्य सरकारों का संयुक्त जिम्मेदारी है। लिहाजा दोनों मिलकर इस खर्च का बोझ 55:45 के अनुपात में बाटेंगी। वही पूर्वात्तर के 8 राज्यों के मामले में यह अनुपात 90:10 का होगा। मौजूदा समय में तकरीबन 84 लाख बच्चे स्कूल से बहार है। जिसमें से अकेले पिश्चम बंगाल से 22 लाख बच्चे है। इस समया शिश्य और शिक्षक अनुपात में भारी अन्तर है।  सरकार 1:42 से इस अनुपात को 30:1 करना चाहती है। कई राज्य मसलन यूपी, बिहार और झारखण्ड में हालात और भी खराब है। बहरहाल 12 लाख और शिक्षकों की आवश्यता का अनुमान लगाया गया है।सरकारी आंकडों के मुताबिक अगले पांच सालों में शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए 34000 करोड़ की सालाना आवश्यता पड़ेगी। सर्व शिक्षा अभियान को 2010-11 के लिए 15100 करोड़ का आवंटन किया है। यानि सरकार को 19100 करोड़ का इन्तजाम करना है। बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है। अच्छे शिक्षकों की नियुक्ति करनी है। कानून के मुताबिक निजि स्कूलों  को भी अपनी 25 प्रतिशत सीट गरीब बच्चों के लिए आरक्षित करनी होगी। मगर उनके रूख से लगता नही कि वह इसके लिए आसानी से तैयार हो जाऐंगे। अगर देखा जाए प्राथमिक शिक्षा पर सही ध्यान एनडीए की सरकार ने दिया। सर्व शिक्षा अभियान में देश के कोने में स्कूल बने । 11वीं पंचवशीZय योजना के लिए 71000 करोड़ का आवंटन किया है। जबकि 10वीं पंचवशीZय योजना के दौरान यह राशि 17000 करोड़ थी। इस कानून की बहुत हद तक इसपर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें अपनी भूमिका कितनी संजीदगी से निभाती है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे भी इससे बहुत आशाएँ हैं -

    १) प्राथमिक कक्षाओं में विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा मे पढ़ने का सुख मिल सकेगा। रटने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। अंग्रेजी के पीछे दौड़ने की अंधी दौड़ खत्म होगी।

    २) कम से कम प्राथमिक स्तर पर समान-शिक्षा के लिये भूमि तैयार हुई है।

    ३) कुछ गरीब लोगों के बच्चे भी मंहंगे स्कूलों मेपढ़ सकेंगे। थोड़ा-बहुत समानता का अवसर बढ़ेगा।

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  2. दीक्षांत चौहान18 सितंबर 2010 को 2:05 am

    सच में सरकार का यह प्रयास सराहनीय है........

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