मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

आखिर कब तक?

पटना में हुए बम धमाकों ने एक बार फिर हमारे सुरक्षा तंत्र की पोल खोल दी है। आज हर कोई सवाल पूछ रहा है कि आतंकवाद जो पूरी दुनिया के लिए एक नासूर बन चुका है उससे लड़ने के लिए हम कितने प्रतिबद्ध हैं। हर बार जब हमला होता है। घटना की निंदा कर दी जाती है। मुआवजे का ऐलान होता है। सरकार का बयान आता है कि गुनेहगारों को कानून की जद में लाया जाएगा। आखिर देश  इन आश्वासनों पर कब तक भरोसा करे। कब तक आतंकवादी हमारे निर्दोष नागरिकों को अपना निशाना बनाऐंगे। आज देश  की आवाम भय में जी रही है। बस, ट्रेन, मंदिर मस्जिद, अस्पताल, बस स्टैंड, पार्क, कोर्ट यहां तक की देश की संसद तक में आंतकी घुस जाते है। सरकार बताए आखिर इस देश के लोग कहां सुरक्षित हैं। 26/11 के बाद इस देश की आवाम को सुरक्षा तंत्र को लेकर सब्जबाग दिखाए गए वो क्या सब झूठे थे। बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या इस तरह के हमलों से निपटने के लिए हमारी तैयार है। क्या हमारे खुफिया तंत्र में वह चैकन्ना पन है जो हमलों से पहले ही हमलावरों को धर दबोचे। क्या हमारी पुलिसिया तंत्र मजबूत है। आखिर क्यों बीते 15 सालों में 21 बार आतंकवादी देश की राजधानी को आसानी से निशाना बना लेते हैं। कैसे बीते 8 सालों में देश की आर्थिक राजधानी 11 बार आतंकियों के नापाक मंसूबों का शिकार हो जाती है। मुंबई हमलों के बाद गृहमंत्रियों ने सुरक्षा तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए क्या कुछ नही कहा। इसमें राष्ट्रीय  आतंकवाद प्रतिरोध केन्द्र,( एनसीटीसी)  बहु अभिकरण केन्द्र,(एमएसी)  राष्ट्रीय  अभिसूचना संजाल,(नैटग्रिड)  राष्ट्रीय जांच एजेंसी, विदेशियों के पंजीकरण तथा तलाश, राष्ट्रीय  सुरक्षा दस्ता, सामुद्रिक सुरक्षा सलाहाकार, समुद्री नौकाओं का पंजीकरण, मछुवारों के लिए पंजीकरण, संयुक्त आपरेशन केन्द्र की स्थापना, सागर प्रहरी बल, तटीय दस्तों का आधुनिकीकरण, आतंक निरोधी दस्ते और गुप्तचर व्यवस्था में सुधार जैसे अहम बदलावों की घोषणा की गई। इनमें से कुछ में काम हुआ और कुछ सरकारी फाइलों की शोभा बड़ा रहे है। इसका उदाहरण दिल्ली हाइकोर्ट परिसर से ही मिल जाएगा। तीन साल पहले सीसीटीवी लगाने की योजना बनाई गई मगर मसला फाइलों से आगे नही बड़ पाया। यहां तक की 25 मई को हुए धमाके से भी हम नही सीखे। यह है आतंकवाद से लड़ने का हमारा रवैया। और हमारी सरकारें हर हमले के बाद आतंकवाद को परास्त करने का दंभ भरती हैं। सच्चाई यह है की कुछ महिने की शांति व्यवस्था हमारे सुरक्षा तंत्र को निश्चिंत कर देती है। आज हमें बिना देरी किये यह सच्चाई कबूल कर लेनी चाहिए कि आतंकवादी हमारी सुरक्षा एजेंसियों की चैकस नजरों से ज्यादा शातिर हैं। इसलिए वह हर बार कामयाब हो रहे हैं। हमारे देश में आइबी सबसे बड़ी गुप्तचर संस्था है। लेकिन इस संस्था में 9443 पद रिक्त पड़ें हैं। जरूरत तो थी कि मानव संसाधन बढ़ाने की मगर यहां पहले के ही रिक्त पद नही भरे गए हैं। आज देष में 1327 आइपीएस अफसरों की कमी है। पुलिस में निचले स्तर के हालात और ज्यादा खराब हैं। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक प्रत्येक 1 लाख की आबादी में न्यूनतम 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए, मगर हमारे देश में यह संख्या 160 के आसपास है। यह राष्ट्रीय औसत है। राज्यवार आंकड़े  तो और भी चैंकाने वाले हैं। प्रति लाख आबदी के हिसाब से बिहार में यह आंकड़ा 75 है, उत्तरप्रदेश में 115, आंध्रप्रदेश में 125, ओडिसा में 135, छत्तीसगढ़ में 205, और झारखंड में 205। इसकी सबसे बड़ी वजह है की देष में तकरीबन 560000 पुलिसकर्मियों के पद रिक्त पड़े है। पुलिस सुधार को लेकर बने राष्ट्रीय  पुलिस आयोग की सिफारिशों पर राज्य सरकारें नाक भौं सिुकोड़ने लगती है। यही कारण है की हमारे देश का 1861 का कानून आज सुधारों की बाट जोह रहा है। सोली सोराबजी की अध्यक्षता में एक माडल पुलिस एक्ट 2006 राज्य सरकारों के भेजा जा चुका है मगर ज्यादातर सिफारिशों को लागू करने में राज्यों की दिलचस्पी नही। यह भी तब जब सितंबर 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने तक राज्यों को पुलिस सुधार को लेकर निर्देश दे चुका है। केन्द्र सरकार कानून व्यवस्था को राज्यों सरकारों के अधिन बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती है मगर इस माॅडल पुलिस एक्ट को वह दिल्ली में तक लागू नही करा पायी है। क्या इसी रवैये के सहारे हम आतंकवाद को हर कीमत पर परास्त करने की बात करते हैं। सवाल यह भी है कि जब राजधानी में सुरक्षा का यह हाल है तो बाकि राज्यों में क्या स्थिति होगी। आज समय की मांग है कि राज्यों को बिना देरी किए पुलिस आधुनिकीकरण पर तेजी से काम करना चाहिए। न सिर्फ हमारे पुलिसकर्मी आधुनिक हत्यारों से लैस हो बल्कि उनके प्रशिक्षण की ओर खास ध्यान देना होगा। साथ ही आतंकी वारदातों से निपटने के लिए राज्यों को विशेष दस्तों की स्थापना करनी चाहिए जो केन्द्र सरकार की एनएसजी की तर्ज पर हो। इसके अलावा थानों के स्तर में एलआइयू जैसे यूनिट को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। दूसरा मसला आता है कि आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे में हम कितना खर्च करते हंै। यह आंकड़ा जीडीपी यानि सकल घरेलू उत्पाद का 1 फीसदी है। जबकि रक्षा क्षेत्र में हम जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च करते हैं। लिहाजा इसका खास ख्याल रखा जाए की धन की कमी राष्ट्रीय  सुरक्षा के र्मोचे पर आड़े न आए। आज देश को जरूरत है एक कठोर कानून की। जो उन असमाजिक तत्वों के मन में भय पैदा करे जो विदेशी ताकतों के इशारों पर काम करते हैं। क्योंकि आतंक के इस नए चेहरे में घरेलू समर्थन को नकारा नही जा सकता। साथ ही ऐसे मामलों को  एक तय समयसीमा के तहत निपटाने की व्यवस्था कायम की जाए। भारत को एक नरम राष्ट्र की छवि से बाहर निकलकर कठोर बनना होगा। आखिर क्या वजह है कि अमेरिका ने 9/11 जैसे हमलों को दुबारा नही होने दिया। पहला वहां के सुरक्षा तंत्र में वह सारी विशेेषताऐं हैं जो किसी भी हमले से निपटने के लिए तैयार हैं। दूसरा वहां आतंकवादियों के लेकर राजनीति नही होती है और न ही आतंकी जेलों में सालों तक रोटी तोड़ते है। वो तो घर में घुसकर अपने दुश्मन को मारने का माद्दा रखते हंै और ओसामा को मारकर उन्होंने यह साबित भी कर दिया। आज हमें अमेरिका के सुरक्षा तंत्र की बारीकियों से सीखने की जरूरत है। यह बात सही है कि हमारी भौगोलिक परिस्थितियां अलग है। मगर हमें नागरिक सुरक्षा को हर कीमत पर सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जरा सोचिए जिस देश में आतंकवादियों को फांसी की सजा से बचाने पर राजनीति होती है। आतंकवादियों को फांसी देने में सालों लग जाते है। जहां की न्याय व्यवस्था में कई छेद हो वहां का सुरक्षा तंत्र क्या भय पैदा कर पायेगा। आज जमीन आसमान और समंदर तीनों जगह हमें पैनी निगाह रखनी होगी  और इसके लिए जरूरत है ठोस राजनीति प्रतिबद्धता की जो अकसर नदारद सी दिखती है।
कर रहा साजिश अंधेरा, सीढ़ियों में बैठकर
रोषनी के चेहरे पर क्यों कोई हरकत नहीं

2 टिप्‍पणियां:

  1. आत!क -नक्षल वाद
    कही! नक्सल, कही! जाति , कही! आत!कवादी है!
    ,हम इस मौत की खेती के षदियो! से ही आदि है!
    यहाॅं तो राजनेता ही मौतो! को बुलाते है! ,
    मरघट के दरिन्दे! क्यों! अमन के गीत गाते है!

    यहाॅं हर कत्ल के पीछे, सियासत खेल होता है ,
    बष, भीडो! के जमघट मे! निषाना रेल होता है
    यहाॅं का न्याय बन्दूको! के साये मे! ही पलता है
    ,इस नाटक के पीछे भी तो नेता की सफलता है

    लानत है! मेरे घर का ये खाकर ही तो पलते है!
    मेरे घर के दिये से आसियाने रोज जलते हैं
    हमें दहषत दिखाकर के ये क्या परिणाम चाहते है!
    ,यहाॅं आत!क मजहब की सुरक्षा से ही आते हैं

    हर मुजरिम की करते है! हम दामाद सी खातिर ,
    तभी तो राजनीति मे! दरिेन्दे है! यहाॅं षातिर
    जेलों म!े पनाह मिलती है हर आतंकवादी को
    ,मुजरिम के लिबासो! म!े तडफती, देख खादी को

    यहाॅं फाॅंसी भी रूकती है हूकूमत की अपीलो! से,
    लफ!गे बच निकलते है! यहाॅं म!हगे! वकीलो! से
    कुचलता है! सभी आर्दष हमारे कारनामो! से,
    यहाॅं आत!क झडते! है! ,नेता के पजामो! से

    यहाॅं हर तर्क मंे कूतर्क , ये चैनल दिखाता हैैै ,
    बे-सिर पैर की बाते! ,यहाॅं हर षख्स गाता है
    इन्हे! सुविधा दिलाने की षियासत बात करती है ,
    ये कैसी राजनीति है जो सबको अखरती है

    सुनो दिल्ली, सुनो मुम्बई ये हम से रोज कहता है,
    यहाॅं तो न्याय के मन्दिर मे! भी आत!क रहता है
    यहाॅ! हर षख्स विस्फो!टो! के साये मे! ही जीता है,
    ये आलम है सभी घर का निकलना भी फजीता हेै

    मुटठी भर मुगल आये ये इतिहास गाता है
    ,यहाॅं स!स्कार अ!ग्रेजी , सभी कौमो को भाता है
    यहाॅं दुष्मन नहीं कोई , अपने ही बनाते है!,
    मेरे घर मे! ही रहकर के यवन के गीत गाते है!

    ये पाकिस्तान का दरिया मेरे घर मे! क्यो! बहता है,ये
    फितरत है मेरे घर की,जो हरकत रोज सहता है!
    हम तो हर पडोसी की नवाजी रोज करते है! ,
    सियासत मे! पले पागल मेरे घर मे! क्यो! मरते है!

    पाकिस्तान से कह दो कि हिजबुल कितने पालोगे ,
    कब तक मौत के मुॅ!ह सेे वतन अपना सॅ!भालोगे
    अगर हम भी करे! प!गा तू नक्षे मे! न रह पाये ,
    सरहद मे! अगर मूते! तो पाकिस्तान बह जाये

    नये आत!क की षक्लो! मे! सत्याग्रह चलाओगे,
    अहि!सा के उदाहरण से क्या हिन्दुस्तान खाओगे
    अहि!सा भी तो हि!सा के नये रस्ते बनाती है,
    ये कैसी बेवकूफी है जो आजादी से आती है

    यहाॅ! आदर्ष गाॅ!धी के गाॅ!धीवाद गाता है!,
    बापू की हकीकत को मेरे नेता बताता है!
    यहाॅ! उपवास होता है तो भ्रश्टाचार चलते है,
    खादी के लिबाषो! मे! ही नक्सलवाद पलते है!

    सपोलो! के कपोलो! मे! कितना दूध डालोगे ,
    इन आतंक की नष्लो! को कितना और पालोगे
    उठाओ अस्त्र अपने अब जहाॅं आत!क दिखता है,
    नेता को कुचल डालो जो इनका भाग्य लिखता है

    मुटठी भर दरिन्दो! का क्यों इतिहास गाते हो ,
    महाभारत को पढकर भी इतना खो!प खाते हो
    यहाॅं स!हार करने को खुद अवतार आता है ,
    ये हि!सा भी अहि!सा है ये मुरलीधर बताता है ।।

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  2. असुरक्षा
    कौन सुरक्षा करता है इस प्रजातन्त्र मे! देष की
    देष मे! पूजा होती है बष,खद्दर धारी भेश की
    मिल जाती है,पनाह य!हा पर आत!की विस्फोटो! को
    नेता जी को चिन्ता है बष, सत्ता के परकोटो! की

    आत!की पहचान पत्र और वीजा कौन बनाता हेै
    होटल और स!रायो! मे! भी ,कौन इन्हे ठहराता है
    विस्फोटो! की सभी योजना,किस के घर से चलती है
    नक्सल और आत!की नष्ले! किस के घर मे! पलती है!

    सीमा औेर समाजो! मे! ये कैसी राश्ट्र सुरक्षा हेै
    घटनाए! घट जाती है,फिर होती आज समीक्षा है
    सभी सियासी व्यक्त दुखो! को करने मे! जुट जाते है!
    कुछ बोट बेै!क की राजनीति मे! नये नमूने आते है!

    किस पर करे! भरोसा हम, इस प्रजातन्त्र प!चायत मे!
    परिधी को हम नाप रहे है! गुणा- भाग के आयत मे!
    प्रष्न करो उस जन,गण से,जो राश्ट्र गीत को गाते हे!ै
    स!विधान की कस्मो से जो खलनायक बन जाते है!

    बिना स!रक्षण के चिडिया,पर मार नही सकती घर मे!
    तकनीकी खोजे! खोज रही है!, हर खतरे को अम्बर मे!
    फिर कैसे घुसती है! घर मे!, ये बिना बाप की औलादे!
    डेढ़अरब मे! प्रष्नचिह्न से ,क्यो! होती है फरियादे!

    कौन सुरक्षित है घर मे!,अब किस के आगे हम रोए!
    हमे! बतादो नेता जी,जनमत से तुमको क्यो! ढोए!
    यक्ष -प्रष्न के उत्तर मे! अब मै! भी तो मत-वाला हू!
    इस नौकर साही, नेता मे!, मै! आग लगाने वाला हू! ।।

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