सोमवार, 23 दिसंबर 2013

युवाः बदलाव के वाहक

आप कहेंगे 2014 में समाज और देश में क्या बदलाव आना चाहिए? दरअसल हर नूतन वर्ष के साथ लोग कुछ बदलाव की आकांक्षा लिए प्रयासरत रहते हैं। ऐसे में समाज के हर वर्ग के जेहन में एक सवाल कौंध रहा है। दिल्ली में 16 दिसंबर को गैंगरेप का शिकार निर्भया की मौत को आज एक साल से ज्यादा बीत गया है। हम सबको सिस्टम बदलने की प्रेरणा देकर वह हमेशा के लिए चली गई।क्या निर्भया और भ्रष्टाचार के लिए
दिल्ली की सड़कों में उभरा आक्रोश क्या अंजाम तक पहुंचेगा? क्या एक अभूतपूर्ण युवा का्रंति बदलाव की वाहक बनेगी? क्या बदलाव की आवाज बनकर उभरा भारत का युवा वर्ग सुधारों के लिए जमीन तैयार करवा पाएगा? 23 वर्षिय निर्भया जीवन संघर्ष तो हार गई मगर देश के युवाओं के संघर्ष क एक नई दिशा देने में वह कामयाब रही। जिसने निष्क्रिय पड़ी राजनीतिक मशीनरी को डरा कर रख दिया। यह संघर्ष वही है जिसकी हम सब जरूरत महसूस कर रहे थे। भारत के इतिहास में कभी ऐसा नही हुआ जब आम और अनाम लड़की के लिए देश का हर नागरिक इतना द्रवित हुआ हो। हर हाथ उसके जीवन के दुआ के लिए उठा हो। हर आवाज़ उसकी न्याय की मांग को लेकर उठी हो। किसी घटनाक्रम में जनाक्रोश का यह रूप शायद ही किसी ने पहले कभी देखा हो। युवाओं का जो रूप दिल्ली केराजपथ पर दिखा वह ऐतिहासिक ही नही अभूतपूर्व था। कमसे कम आजाद भारत में युवाओं के इस उग्र रूप के इससे पहले दर्शन कभी नही हुए। मगर इस घटना ने मानो
मरणासन्न पड़ी राजनीतिक चेतना कोे जगा दिया। असर, ऐसा की सरकार की पानी की बौछारें, आसू गैस के गोले, यहां तक की लाठियां भी उनके जोश को ठंडी नही कर पाई। सरकार के साथ पूरा तंत्र युवाओं की इस रूप को देखकर हैरत में पड़ गया। क्या करें किससे बात करें, क्योंकि इस भीड़ का कोई नेता नही था। भीड़ का एकमात्र लक्ष्य इंसाफ और सिर्फ इंसाफ था। और इंसाफ के लिए जरूरी परिवर्तन के लिए सोती सरकार को नींद से जगाना था। सोचिए युवाओं के जोश से लबरेज यह आंदोलन सरकार से रोजगार की मांग नही कर रहा था जबकी बेरोजगारी से वह त्रस्त है। महंगाई से राहत नही मांग रहा था जबकि उसे आवश्यक पदार्थो के उपभोग के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है और आगे आने वाले समय के लिए भी इस मोर्चे पर उसे राहत मिलेगी उसे ऐसा लगता नही। वह तो सिर्फ इंसाफ की अलख जगाने का काम कर रहा था। दिशाहीन सरकार को कानून व्यवस्था दुरूस्त करने के लिए कह रहा था। युवाओं का यह क्रांति कई मायनों में अलग थी । वह इंसाफ की तख्ती हाथ में लिए बदलाव की मांग कर रही थी। ऐस ऐसा समाज के निर्माण की मांग कर रही थी
जहां आधी आबादी के लिए सम्मान हो। मगर बदलाव की इस बयार ने उस तस्वीर को देश के सामने रखा जिसने आधी आबादी पर हो रहे अत्याचार को समाज के सामने रखा। महिलाओं के खिलाफ अपराध की फेहरिस्त ऐसी की मानों रूह कांप जाए। फिर किसी और को इस देश में दामिनी न बनान पड़े। इस आंदोलन का सबसे रोचक तथ्य यह था इस भीड़ का कोई नेता नही था। भीड़ किसी के कहने बुलाने पर सड़को पर उतरी । और न ही इन्हें किराये पर लाया गया जो की अक्सर राजनीति में होता है। यह पूरा आंदोलन लोगों के भीतर पैदा हो चुकी अन्याय के खिलाफ सिहरन का आगाज़ था। जरा सोचिए जिस लड़की का नाम तक नही मालूम मगर उसके साथ हुए अन्याय के खिलाफ करोड़ों हाथ न्याय की मांग करें तो इसे क्या कहेंगे। इसे कहेंगे की देश का नौजवान समाज के अन्याय के खिलाफ आवाज उठायेगा वह चुप बैठने वालों में नही। इस आंदोलन का दुखद पहलू यह रहा की अपने ही देश का नेतृत्व अपने ही लोगों के भावनात्मक ज्वार का सामना करने में सक्षम नही रहा। ऐसे में उससे बदलाव की उम्मीद पालना कितना सही। आज जो देश के सामने परिस्थिति उठ खड़ी हुई है उसमें देश के युवावर्ग के लिए यह आवश्यक हो जाता है की शोक और क्षोभ की इस घड़ी में बड़ी सूझबूझ का परिचय देते हुए शासन और सरकार के सामने अपनी बात रखे। इस बात का स्मरण रखना जरूरी है की हालात ने उन्हें इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि उनकी एकजुटता  समाज में मौजूद बुराइयों का अंत कर राष्ट निर्माण में सहायक बन सकती है। आज जरूरत किस बात की है। आज समय की मांग है कि इस घटना ने जो अभूतपूर्व ज्वार लोगों के मन मस्तिष्क में पैदा कर दिया है उसे सही दिश देने की। काबिलेगौर यह भी है की भारतवर्ष का शान उसकी युवा पीड़ी किसी भी तरह के अन्याय को होता देख हाथ पर हाथ धरकर नही बैठने वाली। वह समाज में फैली बुराइयों के समाप्त करके ही दम लेगी और यह ललक इस देश के लिए बहुत संकेत है। वैसे युवाओं के इस रूप को हम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को धार देते भी देख चुके हैं। मगर उसकी तुलना इस का्रंति से करना उचित नही। लेकिन सच्चाई यह है की उस आंदोलन में भी जान देश के
युवावर्ग ने ही डाली थी। आज राजनीतिक एजेंड और युवा समाज के आकांक्षाओं के बीच फासला इस कदर बड़ गया है की कौन क्या चाहता है, इस बात का इल्म भी सरकारों को नही है। भारत युवा देश है। इसकी असली बुनियाद भी यह युवा वर्ग ही है। जाहिर है वह एक अन्याय मुक्त पारदर्शी समाज की स्थापना को बेचैन है। बेचैनी का आलम का दृश्य राजपथ की सियासतदान देख चुकें है। सवाल यह है कि सियासतदानों के पास इस बेचैनी का उपचार है

2 टिप्‍पणियां:

  1. त्यौहार मे! सियासत
    ये खिचडी स!क्रान्त,निमन्त्रण है खिचडी सरकारो! की
    भभक रही है आग लोहडी मे!, सत्ता गलियारो! की
    आज अमेठी, बनी अ!गेठी, षीत लहर सरदारो! की
    बा!ट रहे है!, सभी रेवडी, नारो! मे! मक्कारो! की

    चैराहो! मे! बैनर, पोस्टर, सभी बधायी ,खायी मे!
    ये न!गे, भूखे नेता घूमे! कोट, पेन्ट और टाई मे!
    राजनीति के दुष्मन आपस मे! आलि!गन करते है!
    वाह रे, खिचडी, तेरे कारण, कितने टुच्चे तरते है!

    अच्छा होता, प्रजातन्त्र की सोच प्रजा मे! आ जाती
    आज भेडियो! की नष्ले,जनमत की खिचडी ना खाती
    आग मे!लोहडी की तप कर,कुछ चि!तन,म!थन भी होता
    प्रजातन्त्र का मालिक, सडको पर लावारिस ना रोता

    त्योहार मनाये जाते है!, सम्पन्न, समर स!सारो! मे!
    नेता जी खिचडी, ढू!ढ रहे,भारत मे! भूख के मारो! मे!
    कई करोड़ के खर्चे है!, चुनाव, चरण परचारो! मे!
    षाम को दारू, अय्यासी, होती है , मिलकर यारो! मे!

    त्यौहार बने थे ,सम्प्रदाय सब मिलकर खुषी मनाये!गे
    ये राजनीति के नरभक्षी, ना कौम , कबीले खाये!गे
    त्यौहार, तालाबो! के डबरे, घुट-घुट के मनाये जाते है
    कुछ हिन्दू है!,कुछ मुस्लिम है!, कौमो से गिनाये जाते है

    त्यौहार मे! बोटो! की गिनती,नेता की आ!ख से होती है
    सम्प्रभुता मेरे भारत की, क्यो! उत्सव से मे! भी रोती है
    त्यौहार हमे! भी भाता है,आडम्बर से कुछ हटकर हो
    कवि‘आग ’के छन्द पढो, बस,भाव हृदय मे! डटकर हो!!
    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
    ऋशिकेष
    मो09897399815

    उत्तर देंहटाएं
  2. साहित्य का उपहास
    अब गधे साहित्य का बोझा सडक पर ढायेगे!
    विस्वास जैसे भाट ही साहित्य को स!जायेगे
    तुकबन्दगी के म!च पर अब भाण्ड,चारण रोये!गे
    भटियार ही अब गन्दगी से सरस्वति को धोयेगे

    क्या सियासी, सरस्वति के चीर का कारण बनेगे
    सल्तनत के षव, सपोले, द!ष, उदाहरण बनेगे!
    क्या म!च के प्रप!च से सरप!च चुनकर आये!गे
    अब राश्ट्रगीतो! की जगह ,विस्वास कविता गायेगे

    हर्श मे! स!घर्श मे! कलमे! कभी रूकती नही है!
    मान हो,अपमान हो,कलमे! कभी झुकती नही है!
    पद के मद की हर हदो!मे!कद कभी खोती नही है!
    साहित्य की षैली, समर की सूर है,सोती नही है

    साहित्य को जि!दादिली के कुछ कवि ही पालते हे!
    मा! षारदा के ही इषारे से कविता ढालते है!
    जिन्दा कवि तारीफ की तुकबन्दगी गाता नही हेै
    षेर भूखा भी रहे, पर घास को खाता नही है

    साहित्य की गहरायी,गरिमा,मद के हद म!ेभार है
    मा!षारदा की,सरकटि, कलमो! मे! कितनी धार है
    उसकी कृपा इन चारणो की भी पहु!च से पार हैे
    चक्रधर जैसे कवि, इस देष मे! दो-चार है!

    मै! नमन करता हू! ,ऐसे राश्ट्र के अवतार को
    मै! नमन करता हू!,श्री मुख कलम के करतार को
    मै! नमन करता हू! , ऐसे षारदा के प्यार को
    आज षक्ति मिल गयी है ‘आग’ के हथियार को!!
    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
    ऋशिकेष
    मो09897399815

    उत्तर देंहटाएं