सोमवार, 23 दिसंबर 2013

दर्द- ए- किसान

मैं किसान हूं। मझे अर्थव्यवस्था की रीढ की हड़डी कहा जाता है। मेर कंधे पर 1 अरब 21 करोड़ आबादी के लिए अनाज उगाने का जिम्मा है। देश के पचास करोड़ पशुधन के लिए चारे का प्रबंध भी मुझे ही करना हेाता है। उद्योग जगत की निर्भरता मेरे पर कम नही है।  भले ही जीडीपी में मेरी भागीदारी 13 फीसदी हो मगर मैं आज भी 60 फीसदी आबादी के रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत हूूं। मेरी मेहनत के चलते ही इस देश ने पहली हरित का्रति का सपना बुना उसे साकार किया। मैने वह सबकुछ किया जो मेरा कर्म था। जो मेरा कर्तव्य था। मगर यह करते करते मैं आज टूटता जा रहा हूं। दूसरे को पेट भरने वाला मैं आज अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने में असहाय हूं।  मैं न चिलचिलाती धूप की चिंता करता हूॅं, न हाड़ कपा देने  वाले ठंड की, न बाढ़ की न सूखाड़ की। मेरा कर्म और धर्म एक ही है। धरती का सीना फाड़ कर देश की खाद्य सुरक्षा को बनाए रखना। मेरी इस बात के गवाह है यह आंकड़े जो मेरी मेहनत की चीख चीखकर गवाही दे रहे हंै। मेरा मेहनत का सफरमनाम 1951 में 51 मिलियन टन अनाज से आज 255 मिलियन टन का रिकार्ड तोड़ उत्पादन तक पहुंच गया है। मगर मेरी मेहनत का मुझे मिलता क्या है। जब मैं खुले आसमान के नीचे सड़ते अनाज को देखता हूं तो खून के आंसू रोता हूं। जब मेरी मेहनत का उचित दाम मुझे नही मिलता तो मैं रोता है। प्रकृति, सरकार और बिचैलियों की बेरूखी का शिकार आखिर मैं ही क्यों। मैं पूछना चाहता हॅं सियासतदानों से । मेरे उत्पाद का मुझे सही मूल्य क्यों नही मिलता। मुझे समय पर बीज पानी उवर्रक और कर्ज क्यों नही मिलता। क्यों आप लोग मुझे अकेला आत्महत्या जैसा महापाप करने के लिए छोड़ देते है। क्यों आप मेरे नाम पर आपनी राजनीतिक रोटियों सेकते हैं। कभी आपने सोचा है कि क्यों इस देश का 41 फीसदी किसान  किसानी छोड़ना चाहता है। कभी आपने सोचा कि 1981 से लेकर 2001 के बीच 84 लाख किसानों ने खेती क्यों छोड़ी। । 2007 से अब तक 4 लाख किसानों को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी। मैं देश की सबसे बड़ी पंचायत से चंद सवाल करना चाहता हूं। मेर दम पर तुम भोजन के अधिकार देने का सपना देख रहे हो। मेरे और मेरे परिवारो की सुध तुम कब लोगो? क्या संसद में चंद लच्छेदार भाषणों से मेरा संताप मिट जाएगा? मेरे मुश्किलों का हल दिल्ली में बैठकर नही मेरे खेतों में आकर करो। मेरी दुर्दशा का असली चेहरा दिल्ली से आपकेा नही दिखेगा। मेरा परिवार भी समाज में सम्मान से जीने का हकदार है। मेरे बच्चे भी अच्छी शिक्षा का ख्वाब देखते है। मै अपने बच्चों के पैसे को अभाव में मरते तड़पते नही देख सकता। मुझे मेरे सवाल का जवाब दो? मुझे जवाब दो? मुझे जवाब दो?

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन सर... बहुत ही इंफोर्मेटिव.. अच्छी भाषा.. पढ़कर मजा आया.... कल ही आपने बताया था इस ब्लाग के बारे में तो आज पढ़ कर अच्छा लग रहा है.. ख़बरों का नया नज़रिया मुझे यहां दिख रहा खैर अभी बहुत पोस्ट पढ़ने हैं फीडबैक देता रहूंगा...
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  2. राश्ट्र-कवि श्री अषोक चक्रधर जी को समर्पित

    कवि और नेता
    नेता में और कविता में बष,फर्क यही है
    आत्मसात् होता है कवि,मस्तिश्क नही है
    जनता , नेता की सत्ता है ,जोत बही है
    कविता ने तो सतत सत्य की बात कही है

    कवि,ओर नेता दोनो को भीडें ही भाती हैं
    कवि सूक्ष्म जीव है,नेता तो तस्कर हाथी है
    इनको तो बष लंच ,मंच ,प्रपंच चाहिये
    प्रजातंत्र की भीडों के सरपंच चाहिये

    राजनीति और कविता जनता से पलती है
    कवि श्रेश्ठ है ,नेता जनता की गलती है
    जनता कविताओं से खुष है,खेल रही है
    राजनीति के दंष दषक से झेल रही है

    राजनीति के दल में दल-दल गन्ध भरा है
    नेताओं में भ्रश्ट आचरण, आज खरा है
    अलंकार,रस,छन्द चरण कवि अर्पण करता
    श्रृश्टि स!रचना कैसी हो,छवि दर्पण धरता

    तुलसी सूर,कबीर राश्ट्र की अमुल्य निधि है
    धर्म मजहब निर्पेक्ष बने, बष एक विधि है
    राजनीति मजहब के डबरे खोल रही है
    जा!ति-पा!ति का जहर जगत मे! घोल रही है

    आजादी का गीत कवि ने ही गाया था
    स्वाभिमान का पथ भारत को दिखलाया था
    भीडो में बष नेता षक्लें दिखलाते है
    फसल हमारी, काट- काट कर ये खाते है

    सूर्यकान्त त्रिपाठी , दिनकर और निराला
    राश्ट्र-गीत को बकिंम,रविन्द्रनाथ ने पाला
    श्रृंगार ,रोद्र को,वीर रसों में ढाल रहे थे
    आजाद हिन्द को हम कविता से पाल रहे थे

    अखण्डराश्ट्र की परिभाशा कविता गाती है
    राजनीति तो खण्ड-खण्ड को समझाती है
    ये मान चित्र खादी की व्याधि बतलाता है
    राजनीति का भाट कविता क्यो! गाता है

    अब तो ये वेतन भत्तों पर भी जीते हैं
    हम सींचते लहु वतन पर , ये पीते हैे
    आदर्ष कवि है ,मंचो पर मन भावन,सावन
    ये राजनीति मारीच, कहीं लंकापति रावन

    नेता जी! तुम राश्ट्र -गीत को भूल गये हो
    सत्ता और षियासत ,मद में फूल गये हो
    आत्म ग्लानि की पीडा से ,कविता रोती है
    क्यो! राजनीति और कविता म!चो से होती है?

    जनता को कवि कविता में रस दिख जाता है
    राजनीति में नेता बातों की खाता है
    राश्ट्र सृजन श्रृंगार नियन्ता कवि होता है
    इतिहास गवाह है नेता से भारत रोता है

    कुछ तथाकथित कवि भाट चारणो!की भाशा मे!
    वैभवता के भ्रूण छिपे है! अभिलाषा मे!
    साहित्य सतत् इनके कर्मो से षर्मिन्दा है
    इस राजनीति मे! केवल चारण ही जिन्दा है

    षेर त्रास मे! घास कभी भी नही खाता है
    दुर्गन्ध, छन्द की वैभवता को नही गाता है
    कवि षिल्पकार है जिसने ये पाशाण तरासा
    षोला,षबनम,आग,लपट, षब्दो! की भाशा

    षब्द अस्त्र है कविता से जो भेद रहा है
    नेता की नौका मे! हरदम छेद रहा है
    कटुताऔर पटुता से कवि हृदय धोता है
    ये कवि आग है बुझी आग से ही रोता है।।

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