शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

अर्थव्यवस्था का गुलाबी सफरनामा

भारतीय अर्थव्यस्था मौजूदा दौर में मुश्किल से गुजर रही है। हालांकि दुनिया के कई देशों से अब भी भारत की विकास दर ज्यादा है। मगर 2008 में आए वैश्विक संकट और यूरोजोन संकट ने दुनिया समेत भारत की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर डाला। हालांकि घरेलू तौर पर भारत ने इससे निपटने के लिए कई उपाय किए मगर बावजूद इसके इस वित्तिय वर्ष में भारत की विकास दर 5 फीसदी या उससे कम रहने की उम्मीद है। भारत को हर लिहाज़ से अपने विकास को आगे बढ़ाने के लिए 9 फीसदी या इससे उपर की विकास दर की जरूरत है मगर अगले 1 या दो सालों में ऐसा होता दिखाई नही देता। मगर भारत ने आर्थिक क्षेत्र में अच्छी खासी तरक्की की है। यही कारण है कि सालाना 3 लाख करोड़ से ज्यादा का खर्च हम सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी
योजनाओं पर करते है। गरीबों के लिए भारी भरकम सब्सिडी देते हैं। अकेले खाद्य सुरक्षा में ही 1 लाख करोड़ से ज्यादा सालाना खर्च होन का अनुमान है। मगर आंकड़े बताते है की आर्थिक क्षेत्र ने कई अच्छे साल भी देखें है जो हम सब के लिए जानना बेहद जरूरी हैं।

सबसे ज्यादा विकास दर वाले साल
2004-08 -  8.7 फीसदी औसतन

सबसे कम महंगाई दर वाले साल कौन से थे?
1999-2003   औसतन 4.7 फीसदी

सबसे ज्यादा निवेश दर वाले साल कौन से रहे?
2009-2013  36 फीसदी औसतन

सबसे ज्यादा बचत किन सालों में हुई?
2004-2008 में औसतन 33.2 फीसदी सालाना रही।

सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किन सालों में आया?
2009-2013 औसतन 39.6 बिलियन डालर

विदेशी संस्थगत निवेशक एफआइआई
2009-2013 20.5 बिलियन डालर औसतन

भारत का निर्यात किन सालों में सबसे अच्छा रहा?
2004-2008- 25.3 फीसदी औसतन

भारत का मुद्रा भंडार किन सालों में लबालब भरा रहा?
2004-2008  औसतन इन सालों में 196.7 बिलियन रहा।

करेंट एकाउंट डैफिसिट किन सालों में सबसे कम रहा?
1999-2003 इन सालों में औसतन यह -0.21 फीसदी रहा।

राजकोषिय घाटे का बेहतर प्रबंधन किन सालों में देखने को मिला?
2004-2008 तक 3.6 फीसदी औसतन रहा।

बेरोजगारी दर किन सालों में सबसे कम रही?
1994-1998 के बीच सालाना 6.1 फीसदी रही।

यानि केवल एक दल यह नही कह सकता की यह सब हमारी सरकार के दौरान हुआ। 1991 में उदारीकरण के बाद
भारत की अर्थव्यवस्था के व्यापक बदलाव आए। जितने तेजी से बदलाव आए उतनी तेजी से असामनता बड़ी इसलिए हर
कोई यही चाहता है कि विकास दर अगर सर्वसमावेशी नही हो तो बेकार है। इसलिए माडल ऐसा चाहिए जो सबके विकास
में सहायक हो केवल चंद लोगों के नही।

1 टिप्पणी:

  1. पर्दा उठ रहा है
    कल तक मै! असम!जस मे! था,आज मुझे विस्वास हो गया
    अरविन्द केजरीवाल सियासी,आम आदमी खास हो गया
    दिल्ली के इस नये राज्य मे,अरबो! -खरबो! के घोटाले
    का!ग्रेस और बी.जे.पी. ने,क्या अब तक अजगर ही पाले

    इसका मतलब पूरा भारत, व्यभिचारो! से भरा पढा है
    आम आदमी ,भूखा, न!गा, सडेको! पर लाचार खडा है
    अनपढ़,भौ!दू,चोर, लुटेरे,अब तक भारत चाट रहे थे
    पागल जनमत ,हिन्दू,मुस्लिम, िसक्ख,इसाई बा!ट रहे थे

    राजनीति की अय्यासी को,देष की जनता ढोती आयी
    अरे,बाप रे,कितना लूटा,नेता जी को षरम ना आयी
    टाटा, बिडला, डालमिया के,साडू भाई चोर चकारो!
    ममता,समता,स.पा,बा.स.पा.,राहुल ,मोदी के अवतारो!

    जाने कब से लूट रहे थे, ये भारत के भाग्य -विधाता
    देष चलाने वाले देखो,जिनको खुद चलना नही आता
    न!गे, भूखे खाद्य -मन्त्री, वित्त -मन्त्री, बन जाते थे
    दाल, रोटिया!, खाने वाले, पाषुओ! का चारा खाते थे

    कोलगेट , क!ही घासलेट क!ही तेल,गैस का घोटाला
    इस धवल -वस्त्र मे! भारत माता डाकू तेरा रखवाला
    न!गे-भूखे, सडक छाप सब,अरब,खरब मे! खेल रहे थे
    उल्टे, सीधे सारे खर्चे , जन - मत के सर पेल रहे थे

    नौकर साही आ!ख मू!द कर,बे-सुमार धन लूट रही थी
    अजगर की नस्ले! भारत को, बिन पानी के घू!ट रही थी
    डालर क्यो! उपर चढता है,नोट धरा मे! क्यो! आता है
    मुख्यम!त्री, आज केजरी , आप पार्टी समझाता है

    राजनीति मे! गिरना पढना,लोक तन्त्र की टू टि कडी है
    क्यो! होते है! घोटाले, क्या सब की आ!खे फुटि पडी है!
    षाबास, केजरी ,न!गा करदो, इन दरवेश, दलालो! को
    कवि ‘आग’ लिखता जायेगा,राजनीति के घोटालो! को!!
    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
    ऋशिकेष
    मो09897399815

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